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दूसरी नजर: एक दूसरे को कगार की तरफ धकेलना

इससे पहले, लड़के सड़कों पर उतर आते थे और पत्थर फेंकते थे; अब लड़कियां भी सड़कों पर उतर रही हैं। पहले, माता-पिता अपने बच्चों को रोकते थे।
Author July 16, 2017 03:57 am
ऐसा माहौल कश्मीर अक्सर देखने को मिलता है।

कई मौकों पर मैंने आगाह किया था कि कश्मीर समस्या या मसला (या इसे जो भी नाम दिया जाए) एक रिसता हुआ घाव होता जा रहा है। पहले जो भी सरकारें रहीं, किसी न किसी हद तक वे मानती थीं कि इस रिसते हुए घाव का उपचार करना है। जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला के बीच हुआ समझौता, ताशकंद समझौता, शिमला समझौता, इंदिरा गांधी और शेख अब्दुल्ला के बीच हुआ समझौता, आगरा शिखर वार्ता और लाहौर घोषणा, अन्य कदमों के साथ-साथ, इस मसले के विभिन्न पहलुओं का ईमानदारी से स्थायी समाधान ढूंढ़ने के प्रयास थे। हालांकि इनमें से कोई भी प्रयास स्थायी समाधान निकालने में सफल नहीं हो सका। सभी का नतीजा यही रहा कि कोई एक या एक से अधिक संबंधित पक्ष असंतुष्ट रहे। घाव लगातार रिसता रहा है। संबंधित पक्षों में सबसे कठिन, अस्थिर और हठी युवा लोग थे जो उग्रवाद की तरफ मुड़ गए। अन्य संबंधित पक्षों ने समय-समय पर किसी न किसी हद तक समझदारी दिखाई।

अतिवादी रुख
केंद्र सरकार- वह किसी भी पार्टी की रही हो या कोई भी प्रधानमंत्री रहा हो- उसने हमेशा संबंधित पक्षों में से किसी एक या कई पक्षों से संवाद करने की कोशिश की। मुझे डर है कि केंद्र सरकार का रुख वर्ष 2015-16 से निर्णायक रूप से बदल गया है। मौजूदा केंद्र सरकार के रवैए के बारे में कुछ कहना जितना अफसोसनाक है उतना ही कठिन भी; इसकी बयानबाजी अनुमान से परे है; और यह वक्त ही बताएगा कि यह अड़ियल भी है।
उग्रवादियों ने अतिवादी रुख अख्तियार कर रखा है, जो पूरी तरह अस्वीकार्य है। दूसरी तरफ सरकार का रुख भी अतिवादी है जिससे समस्या और विकट हुई है। कश्मीर घाटी के लोग दो अतिवादी रुखों के बीच फंस गए हैं। नतीजतन, दिन-ब-दिन जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक तथा सुरक्षा की स्थिति और बिगड़ती जा रही है। आंकड़े हमें मुंह चिढ़ा रहे हैं:
2017 2016
(30 जून तक)
मारे गए सुरक्षाकर्मी 40 30
मारे गए नागरिक 28 5
मारे गए उग्रवादी 92 77
घुसपैठ 124 90

बदला क्या है
इससे पहले, लड़के सड़कों पर उतर आते थे और पत्थर फेंकते थे; अब लड़कियां भी सड़कों पर उतर रही हैं। पहले, माता-पिता अपने बच्चों को रोकते थे। अब एक मां कहती है (जैसा कि सचमुच एक मां ने कहा), ‘मैं अपने बच्चे से यह नहीं कह सकती कि वह विरोध-प्रदर्शन में शामिल न हो, क्योंकि वह मानता है कि वह अपने भविष्य और अपनी आजादी के लिए लड़ रहा है।’ पहले, केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर की सरकार, दोनों की कोशिश रहती थी कि उनका रुख और उनकी भाषा एक जैसी हो। जब उनके बीच गठबंधन का नाता नहीं होता था तब भी यही स्थिति रहती थी। आज, केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर की सरकार का रुख एक दूसरे से बिलकुल उलट है, हालांकि दोनों पार्टियां (भाजपा और पीडीपी) राज्य में साझा सरकार चलाने का दम भरती हैं! पहले, सुरक्षा बलों की तैनाती पर केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर की सरकार का नजरिया समान रहता था। आज, दोनों पार्टियों के बीच, इस मुद््दे पर, तलवारें खिंची हुई हैं। पहले, एकीकृत कमान की बैठक जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में होती थी और अमूमन उनकी राय निर्णायक होती थी। आज, हालांकि एकीकृत कमान की कभी-कभार होने वाली बैठकों की अध्यक्षता मुख्यमंत्री ही करते हैं, पर राय सेना की निर्णायक मानी जाती है, जिसका प्रतिनिधित्व सेना का उत्तरी कमान करता है।
पहले, जब भी किसी संबंधित पक्ष से वार्ता हुई, तो केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर की सरकार, दोनों इसके लिए रजामंद थीं। आज जम्मू-कश्मीर की सरकार कहती है कि सभी संबंधित पक्षों से बातचीत होनी चाहिए, जबकि केंद्र सरकार किसी भी संबंधित पक्ष से बातचीत के सख्त खिलाफ है।

पहले, सिर्फ एक अपवाद को छोड़ कर, अमरनाथ यात्री सुरक्षित थे। ऐसा सोलह वर्षों तक रहा। आज, अमरनाथ यात्री उस सुकून को खो चुके हैं, और सोमवार को जो आतंकवादी घटना हुई उसने यात्रियों की सुरक्षा करने की सरकार की क्षमता पर सवालिया निशान लगा दिया है। राज्य के उपमुख्यमंत्री (एक भाजपा नेता) ने कबूल किया है कि सुरक्षा संबंधी खामी थी।यह याद करना उपयोगी है कि आतंकवादी हमले 2001 में चरम पर थे (4507), 2003 में इनमें कमी आई (2542)। इसके बाद इसमें उल्लेखनीय कमी आई 2012 (117) और 2013 में (181)। वह वृत्तांत लगता है अब बदल गया है। तीव्रतर टकराव की मौजूदा स्थिति में एक तरफ उग्रवादी हैं और दूसरी तरफ भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार। मुझे डर है कि दोनों पक्षों का अतिवादी रुख एक दूसरे को कगार की तरफ जाने तथा अपना रुख पहले से और कठोर करने के लिए विवश कर रहा है। इसमें बलि चढ़ रही है जम्मू-कश्मीर की जनता (खासकर वे लोग जो कश्मीर घाटी में रहते हैं) और बलि चढ़ रहा है राज्य का भविष्य।

स्थायी समाधान या स्थायी व्यवधान

मौजूदा गंभीर संकट की जिम्मेदारी तीन पक्षों पर आयद होती है: (1) उग्रवादी और उनके आका, निस्संदेह जो आतंकवादी हैं और कश्मीर घाटी को भारत से छीनने में कभी सफल नहीं होंगे; (2) भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार, जो सैनिक समाधान में विश्वास करती है और जिसे इतिहास या टकराव खत्म करने के प्रयासों की जटिलताओं की कोई समझ नहीं है; और (3) पीडीपी सरकार, जिसने निर्लज्जता से उन सब सिद्धांतों को तज दिया, जिनका वह मुफ्ती मोहम्मद सईद के रहते पुरजोर पक्ष लेती थी, और भाजपा के एक पिट्ठू की तरह कुर्सी से चिपकी हुई है फिर हमारे विलक्षण गृहमंत्री हैं, जो उलझन में डाल देने वाले बयान देते हैं, जैसे ‘हमने कश्मीर मसले का स्थायी समाधान खोज लिया है।’ क्या वे देश को यह बताने की मेहरबानी करेंगे कि यह स्थायी समाधान क्या है और उस तक पहुंचने के लिए उनकी सरकार ने क्या किया है?हम कुछ भी कहें या लिखें उससे उग्रवादियों का निर्मम (और गलत) रुख नहीं बदलेगा; उनसे फौजी ताकत से ही निपटना होगा। लेकिन हमारे बोलने या लिखने से सरकार के कठोर (और गलत) रुख पर कोई फर्क नहीं पड़ता, तो इससे यही लगता है कि हम स्थायी समाधान के रास्ते पर नहीं, बल्कि स्थायी व्यवधान के रास्ते पर हैं।

 

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