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दूसरी नजर- विमुद्रीकरण: एक कड़वी खीर

इसका मतलब है कि काले धन के खात्मे के नाम पर लोगों को जो परेशान किया गया, वह उद्देश्य चिंताजनक रूप से विफल सिद्ध हुआ।
Author September 3, 2017 05:34 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फाइल फोटो)

कहा जाता है कि हर व्यक्ति जैसे चाहे अपने विचार को व्यक्त कर सकता है लेकिन तथ्यों को नहीं मरोड़ सकता। आखिरकार तथ्य निम्नवत हैं:
भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी सालाना रिपोर्ट 30 अगस्त 2017 को जारी की, जो कि कानूनन आखिरी तारीख है। रिपोर्ट ने वही साबित किया, जिसे हममें से बहुत लोग कह रहे थे- विमुद्रीकरण अक्षम नीतिनिर्माण का निकृष्तम उदाहरण था। करीब 15,28,000 करोड़ रुपए की कीमत के विमुद्रीकृत नोट (यानी 15,44,000 रुपए कुल मूल्य का 99 प्रतिशत) भारतीय रिजर्व बैंक में वापस लौट आया है। इसका मतलब है कि काले धन के खात्मे के नाम पर लोगों को जो परेशान किया गया, वह उद्देश्य चिंताजनक रूप से विफल सिद्ध हुआ।

मूल उद्देश्य
हमें हताया गया था कि चार-पांच लाख करोड़ रुपए की नकदी बैंकिंग प्रणाली में दोबारा वापस नहीं आएगी। आरबीआइ अपने बैलेंस शीट से इस देनदारी को हटा देगा और सरकार को यह एक तरह से अलभ्य लाभ मिल जाएगा। और कालेधन के जमाखोरों के अलावा हर व्यक्ति इसके बाद खुशी का जीवन व्यतीत करेगा। अब इस परी कथा का अंत हो गया है। मैंने चेताया था कि आरबीआई को लिखे गए सरकार के 7 नवंबर, 2016 के पत्र और अगले दिन प्रधानमंत्री के भाषण में गिनाए गए तीनों लक्ष्यों में एक भी पूरे नहीं होंगे। जाली मुद्रा बाजारों में मौजूद है, आतंकी गतिविधियां खत्म नहीं हुई हैं और कालेधन का निर्माण और उपयोग लगातार जारी है। उद्देश्य नाकाबिले-एतराज थे लेकिन इसके लिए जो उपकरण चुने गए वे गलत और निरुपयोगी थे। और तथ्याधारित कहानी तो सुनाई ही नहीं गई। बल्कि कहानी को लगातार बदला गया, और दुष्प्रचार तंत्र को दमघोंटने की पूरी छूट दी गई। सच्चाई का एक कतरा भी पेश कर पाने में नाकाम सरकारी दुष्प्रचार हास्यास्पद स्थिति में पहुंच गया है। हालात सत्तापोषित दुष्प्रचार के जरिए चीजों को नियंत्रित करने (आॅरवेलियन) से भी आगे निकल गए हैं।

एक ताजा प्रेस विज्ञप्ति के चुनिंदा अंश :
1) सरकार को उम्मीद थी कि एसबीएन ( विशेषीकृत बैंक नोट) बैंकिंग प्रणाली में मान्य मुद्रा के तौर पर वापस आ जाएंगे?
* क्या पुराने 500 और 1000 रुपए के नोट पहले मान्य मुद्रा नहीं थे?
2) पूर्ण पुनर्मुद्रीकरण के बाद आज की तारीख में 83 प्रतिशत प्रभावी मुद्रा चलन में हैं।
* कम मुद्रा छाप कर कृत्रिम किल्लत पैदा की गई। तमाम एटीम बेकार पड़े हैं और ज्यादातर एटीएम में कुछ घंटे ही नकदी रहती है।
3)भारी मात्रा में एसबीएन ( विशेषीकृत बैंक नोट) का बैंकिंग प्रणाली में आना यह जाहिर करता है कि बैंकिंग प्रणाली और आरबीआई इतने कम समय में विशेषीकृत बैंक नोटों को संग्रह करने की चुनौती से उपजी मुश्किलों से निपटने में सफल रहे हैं।
* यह मनोरंजक है कि इकट्ठी हुई नकदी को उपलब्धि के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। नौ महीने में की गई गणना को अपनी उपलब्धि बताया जा रहा है।
4) नवंबर 2016 से मई 2017 के अंत तक 17,526करोड़ रुपए अघोषित आय के तौर मिले और 1003 करोड़ रुपया जब्त किया किया। तफ्तीश/ जांच-पड़ताल जारी है।
* कितनी आय अघोषित थी और कितना कर राजस्व बनेगा, यह सब मूल्यांकन, निर्णय और अपीलों के निपटारे के बाद तय होगा। सरकार ज्यादातर मामलों में हार सकती है। तब अंत में जो संख्या बचेगी वह बहुत छोटी होगी।
5) सरकार पहले ही 37000 मुखौया कंपनियों की पहचान कर चुकी है, जो कालाधन छिपाने और हवाला लेनदेन में लिप्त थीं।
* सरकार केवल इस तरह का अभियोग लगा सकती है। यह कर-न्यायाधिकरणों और न्यायालयों पर निर्भर करता है कि वे किसे सही मानेंगे।
6) आयकर प्रवर्तन निदेशालय चार सौ से ज्यादा बेनामी लेनदेन 23 मई 2017 तक पकड़ चुका था छह सौ करोड़ रुपए के बाजार मूल्य की संपत्ति अटैच की गई थी।
* इस संख्या पर तरस ही खाया जा सकता है, जो बताती है कि कार्रवाई का स्तर क्या रहा होगा?
7) एसबीएन ( विशेषीकृत बैंक नोट) के विमुद्रीकरण से आतंकियों और नक्सलियों का अधिकांश वित्तपोषण समाप्त हो गया।
* इस बारे में कुछ उदाहरण देखना बेहतर होगा। जम्मू-कश्मीर के आंकड़े बताते हैं कि मौतों और घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है। गृहमंत्री ने कहा है कि सात राज्यों के 35 जिले नक्सलवाद से प्रभावित हैं।
8) अक्तूबर 2016 से 71.27 करोड़ के सापेक्ष मई 2017 के अंत कर 111.45 करोड़ रुपए का डिजिटल भुगतान हुआ यानी इसमें 56 प्रतिशत वृद्धि हुई।
* संख्या में भले ही यह बढ़ोतरी हुई लेकिन यह लेनदेन उतना ही रहा जितना 2016 में था।
9) विमुद्रीकरण की वजह से जीएसटी लागू होने पर कर संग्रह को भी बल मिला।
* मेहरबानी करके बताएं कि अप्रत्यक्ष कर संग्रह पर इसका असर कैसे पड़ा ?

विनाशकारी आघात
कुछ लोगों को उम्मीद थी कि विमुद्रीकरण से आर्थिक विकास को बड़ा भारी झटका लगेगा। वे गलत साबित हुए।
* क्या 3.1 प्रतिशत की घोषणा भारी झटका नहीं है? यूपीए प्रथम की सरकार के दौरान सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी)की विकास दर 8 और 9 प्रतिशत थी। यूपीए-दो तथा राजग सरकार के पहले दो साल में विकास दर 7 और 8 प्रतिशत के बीच थी। जबसे विमुद्रीकरण हुआ, तिमाही विकास दर ( यहां तक सालाना विकास दर भी) 6 और 7 प्रतिशत के बीच ठहर गई। केंद्रीय सांख्यिकी संगठन ( सीएसओ) का पहली तिमाही का 2017-18 का आंकड़ा तो बदतर हालत यानी सकल घरेलू उत्पाद 5.7 प्रतिशत और सकल मूल्यवर्द्धित ( जीवीए) 5.6 प्रतिशत और विनिर्माण जीडीपी 1.2 प्रतिशत है। क्या यह अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी आघात नहीं है?
कुछ लोग हैं जो मानते हैं कि सत्ता अपना औचित्य खोज लेती है। हममें से तमाम लोगों की दिलचस्पी किसी नीति के प्रभाव को समझने की होती है और अगर नीति अर्थव्यवस्था और जनता के हित में है तो वे उसका समर्थन करेंगे।
विमुद्रीकरण से लेकर उत्तर प्रदेश, गोवा और मणिपुर के चुनाव में हुए ध्रुवीकरण, उत्तर प्रदेश और झारखंड में बच्चों की मौत तथा हरियाणा में भीड़-हत्या तक के बारे में हमसे अयोग्यता को बर्दाश्त करने के लिए कहा जा रहा है। राजग सरकार एक कठिन और अतिवादी नीति को लागू कर रही है, जो आखिरकार सामाजिक और आर्थिक सामंजस्य, दोनों को ध्वस्त कर देगी।

 

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