December 03, 2016

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‘दूसरी नजर’ कॉलम: हम देशभक्त हैं, कृपया प्रश्न न करें

सुकरात ने अपने शिष्यों से कहा था कि हरेक चीज पर प्रश्न उठाएं और एक अच्छा शिक्षक आज यही बात अपनी कक्षा को बताएगा।

एनडीटीवी और पीएम मोदी के बीच तनातनी के कई उदाहरण देखने को मिलते हैं।

एक नई सामाजिक और राजनीतिक संहिता बन रही है: सवाल न करें।
यह उस लोकाचार के ठीक उलट है जो लोकतंत्र में नितांत आवश्यक समझा जाता है और जो हमें सूचनाधिकार कानून (आरटीआइ ऐक्ट) के क्रियान्वयन की तरफ ले गया- कि पारदर्शिता और खुलापन एक स्वस्थ लोकतंत्र की निशानी हैं, और कि सूचना, कुछ अपवादों को छोड़ कर, नागरिकों को उपलब्ध कराई जानी चाहिए। आरटीआइ कानून ने निर्णय प्रक्रिया पर जबर्दस्त असर डाला, मनमानेपन पर अंकुश लगाया, भ्रष्टाचार को उजागर किया, और यह नाइंसाफी से लड़ने का एक बड़ा हथियार बन गया। सरकारें पहले साफ झूठ बोल कर बच निकलती थीं, क्योंकि उनके झूठ को पकड़ने का कोई माध्यम नहीं था। (अदालतें समय-समय पर हस्तक्षेप करती थीं, लेकिन जजों की कमी, लंबित मामलों के बोझ और वक्त की तंगी की वजह से उनके हस्तक्षेप की सीमा थी। काम के भयावह बोझ ने न्यायिक व्यवस्था को आक्रांत कर रखा है।) आरटीआइ कानून ने बाजी पलट दी।

प्रश्न करने की परंपरा

वही सिद्धांत संसद के प्रश्न काल के पीछे काम करता है। प्रश्न करें और मंत्री चौदह दिनों के भीतर सही उत्तर देने के लिए बाध्य हैं। सदन के पटल पर मंत्री से पूरक प्रश्न भी किए जा सकते हैं और उन्हें उत्तर देना ही होगा। कई मंत्री प्रश्न काल में घिर जाते हैं। अगर कोई मंत्री गलत जवाब देता है तो उसके खिलाफ विशेषाधिकार हनन का मामला बनता है। अगर एक सतर्क प्रधानमंत्री पूरे सत्र में प्रश्न काल के दौरान मौजूद रहे, तो वह परख सकता है कि उसके मंत्रियों में कौन काम के हैं और कौन निकम्मे। अगर प्रश्न नहीं किए जाते, तो दुनिया बहुत नीरस होती। समलैंगिकता बीमारी मानी जाती, और कोई दंपति नि:संतान होता, तो सारा खोट औरत का ही माना जाता। गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत का आविष्कार नहीं हुआ होता, सापेक्षता के सिद्धांत को एक सनकी आदमी की कपोल कल्पना समझा जाता तथा आकाश की सैर करना परिंदों के अलावा और किसी के लिए संभव न होता।

सुकरात ने अपने शिष्यों से कहा था कि हरेक चीज पर प्रश्न उठाएं और एक अच्छा शिक्षक आज यही बात अपनी कक्षा को बताएगा। थॉमस बेकेट ने, जो बाद में एक कैथोलिक पोप के रूप में जाने गए, अपने राजा से सवाल किए थे; मार्टिन लूथर किंग ने कैथोलिक चर्च के मतवादों पर सवाल उठाए थे। अद्वैत के दर्शन पर प्रश्न उठाने से ही विशिष्टाद्वैतवाद का जन्म हुआ।महात्मा गांधी ने भारत की जनता पर राज करने के गोरों के कथित अधिकार पर सवाल उठाए; पचास साल बाद मार्टिन लूथर किंग ने अश्वेतों पर श्वेतों की श्रेष्ठता पर सवाल उठाए। देंग शियाओं पिंग ने साम्यवाद-माओवाद की कट्टरपंथिता को प्रश्नांकित किया और चीन को आर्थिक उदारीकरण के दौर में ले गए। माओवादी आर्थिक उदारीकरण के चलते बढ़ती विषमता और बढ़ते अन्याय पर सवाल उठा रहे हैं। विएतनाम से लेकर इराक और सीरिया तक, हरयुद्ध की समीक्षा हुई है और सवाल उठाए गए हैं। हेंडरसन-ब्रुक्स रिपोर्ट ने 1962 के भारत-चीन युद्ध के संचालन पर सवाल उठाए थे।

नई संहिता

प्रश्न पूछने की महान परंपरा खतरे में है। नई संहिता के नियम इस प्रकार हैं:
1. प्रश्न न पूछें।
2. अगर आप सवाल उठाते हैं, तो आप राष्ट्र-विरोधी हैं।
3. आपके सवाल को सिर के बल खड़ा कर दिया जाएगा, ताकि उसका अर्थ पूरी तरह बदल जाए।
4. आपके प्रश्नों को अप्रासंगिक प्रश्नों से मिला दिया जाएगा।
5. फिर अप्रासंगिक प्रश्नों के उत्तर दिए जाएंगे, आपके प्रश्नों के नहीं।
और भी कई बातें हैं जो फिलहाल नियम का रूप नहीं ले पाई हैं, पर जल्दी ही ले सकती हैं। मिसाल के लिए यहां दो बयान लें: प्रश्न पूछना अच्छी संस्कृति नहीं है (किरन रिजीजू)। प्रश्न पूछना सस्ती राजनीति है (वेंकैया नायडू)।

पिछले साल हमने देखा कि सवाल न उठने देने और सवाल उठाने वालों का मुंह बंद करने के लिए कैसे सुनियोजित प्रयास किए गए। जब एक भीड़ ने अखलाक को पीट-पीट कर मार डाला, सवाल था कि भीड़ को उसे मार डालने का अधिकार किसने दिया? लेकिन इस सवाल को दबाने के लिए एक दूसरा सवाल खड़ा कर दिया गया, ‘क्या अखलाक के परिवार ने अपने घर में बीफ रखा था?’ सुकरात पूछते कि क्या परिवार का किसी तरह का मांस रखना ऐसा अपराध है कि एक भीड़ जज, अभियोक्ता और जल्लाद, तीनों बन जाए?

रोहित वेमुला ने जब अपने अंतिम पत्र में बताया कि वह खुदकुशी क्यों कर रहा है, तो सारे सवाल दरकिनार कर दिए गए। सिर्फ एक सवाल के लिए गुंजाइश थी: ‘रोहित वेमुला दलित था या गैर-दलित?’ जज ने निष्ठापूर्वक जवाब दिया कि वह दलित नहीं था। सुकरात पूछते कि ‘क्या यह जवाब भेदभाव और उत्पीड़न के उन बुनियादी मुद््दों पर कोई रोशनी डालता है जो युवा शोधार्थी ने अपने अंतिम पत्र में उठाए हैं?’
झूठ का सहारा

सरहद पार कर की गई सेना की कार्रवाई पर वाहवाही लूटने पर सवाल उठाए गए। इन सवालों को सिर के बल खड़ा कर दिया गया, मानो सवाल सेना की क्षमता और प्रामाणिकता पर उठाए जा रहे हों। नए नियम हावी हो गए और सवाल उठाने वाले राष्ट्र-विरोधी करार दे दिए गए। भोपाल जेल की घटना की बाबत अधिकृत बयान (या बयानों) की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठ रहे हैं, जिस घटना में आठ कैदी हेड कांस्टेबल रमाशंकर यादव को बर्बरतापूर्वक जान से मार कर भाग निकले। कुछ घंटों बाद पुलिस ने दावा किया कि सभी आठों कैदी ‘मुठभेड़’ में मार गिराए गए। यह सच्ची मुठभेड़ थी या फर्जी? दुर्भाग्य से, भारत के लोग दोनों तरह की मुठभेड़ों से परिचित हैं।

कानून फर्जी मुठभेड़ की इजाजत नहीं देता। अगर मुठभेड़ प्रामाणिक हो, तो उस सूरत में भी कानूनन सरकार एफआइआर दर्ज करने और पूर्ण व निष्पक्ष जांच कराने के लिए बाध्य है। मध्यप्रदेश सरकार जांच का जोरों से विरोध कर रही है, और जांच न हो पाए, इसके लिए छल व झूठ का सहारा ले रही है, जिसका नमूना यह है: जो आतंकवाद के ‘आरोपी’ हैं वे ‘आतंकवादी’ हैं। विचाराधीन-कैदी सजायाफ्ता-कैदी हैं। जेल में दिया जाने वाला खाना चिकन बिरयानी है।लेकिन मुझे भरोसा है, कानून अपना काम करेगा और जांच होगी। मैं नहीं कह सकता कि जांच से हकीकत सामने आएगी ही, पर हर हाल में सवाल तो पूछे जाएंगे।

 

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First Published on November 6, 2016 4:07 am

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