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‘दूसरी नजर’ कॉलम में पी. चिदंबरम का लेख: यहां सही मायने में स्वतंत्रता कितनी है

हम राजनीतिक लोकतंत्र को तो समझते हैं, पर आर्थिक लोकतंत्र को नहीं समझते।
Author October 2, 2016 03:47 am
प्रतीकात्मक फोटो। (फाइल) (express Photo)

पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के तहत अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के दौर में प्रवेश करने के पच्चीस साल बाद भी भारत आर्थिक स्वतंत्रता के विचार के साथ मेल नहीं बैठा सका है। यह हताश करने वाली बात है, एक ऐसे देश के लिए, जो सारी दुनिया के लिए राजनीतिक स्वतंत्रता के संघर्ष का पथ-प्रदर्शक था। हम राजनीतिक लोकतंत्र को तो समझते हैं, पर आर्थिक लोकतंत्र को नहीं समझते। मैं कबूल करता हूं कि युवावस्था में मुझ पर समाजवाद का प्रभाव रहा था; बाद में मैं खुली, उदार और प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था के विचार की तरफ उन्मुख हुआ।

स्वतंत्रता अविभाज्य है

राजनीतिक स्वतंत्रता और आर्थिक स्वतंत्रता साथ-साथ चलती हैं। मेरा आग्रह है कि आप संविधान के अनुच्छेद 19 को देखें (जैसा कि वह मूल रूप में संविधान में शामिल किया गया था), वह अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 21 के साथ मिल कर मौलिक अधिकारों की रचना करता है, जो संविधान में वर्णित हैं, जिसे हमने ‘खुद को दिया है’। हमारे संविधान निर्माता बुद्धिमान थे, जिन्होंने राजनीतिक व आर्थिक अधिकारों को समान दर्जा दिया। बोलने तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता [धारा (ए)] को वैसा ही महत्त्व उन्होंने दिया जैसा रोजगार या व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता को [धारा (ग)]। संगठन बनाने के अधिकार को वैसा ही महत्त्व मिला जैसा संपत्ति रखने के अधिकार को [धारा (एफ)]। हमारे संविधान निर्माता जानते थे कि कैसे एक आजादी दूसरी आजादी को बल देती है और कैसे एक के बगैर दूसरी सार्थक नहीं है।

संविधान के 301 से 305 तक के अनुच्छेदों के बारे में कम लोगों को पता है। अगर ठीक से व्याख्या की जाए, तो अनुच्छेद 301 एक राष्ट्र, एक अर्थव्यवस्था के विचार की तरफ ले जाएगा। यह अनुच्छेद कहता है ‘‘वाणिज्य, व्यापार और परस्पर संपर्क पूरे देश में निर्बाध होंगे।’’ गलत व्याख्या और गलत क्रियान्वयन ने उस साहसिक विचार का गला घोंट दिया। राज्य सरकारें और अनुत्पादक तरीके से लाभ चाहने वाले खुश थे- जब तक कि कुछ मामलों में, जो ऊपरी अदालतों में पहुंचे, उन्हें तलब नहीं किया गया।
सरकारें आर्थिक स्वतंत्रता को कई तरीकों से बाधित या सीमित करती हैं। एक समय था जब नियम-कायदे इतने कठोर थे कि भारत के राज-काज के मॉडल को ‘लाइसेंस-परमिट-कोटा राज’ कहा जाता था। कुछ नियम वैध और उचित होते हैं, जैसे कारोबार का पंजीयन या पर्यावरणीय मंजूरी हासिल करने की अनिवार्यता। ये नियम जायज हैं, पर संबंधित प्रमाणपत्र पाने में अत्यधिक विलंब उनके औचित्य पर ग्रहण लगा देता है।

भारत का हाल

हर साल विश्व बैंक एक अध्ययन प्रकाशित करता है जिसे कारोबार सुगमता रिपोर्ट (ईज आॅफ डूइंग बिजनेस रिपोर्ट) कहते हैं। यह कारोबार शुरू करने, बिजली कनेक्शन प्राप्त करने, संपत्ति का पंजीकरण कराने, ऋण प्राप्त करने, करों के भुगतान और अनुबंधों के क्रियान्वयन जैसे दस मानकों पर तमाम देशों का स्थान तय करता है। वर्ष 2015 से 2016 के बीच भारत दस में से सात मानकों पर या तो वहीं का वहीं रहा या और नीचे आ गया। केवल तीन मानकों पर इसका दर्जा सुधरा, पर इनमें कुछ ऐसा नहीं है जिसकी डींग हांकी जाए। कारोबार शुरू करने की सुगमता के मामले में भारत का स्थान 164 से सुधर कर 155 पर आ गया; निर्माण की मंजूरी देने के मामले में 184 से 183 पर, बिजली कनेक्शन हासिल करने में सुधर कर 99 से 70 पर। ऋण-प्राप्ति में इसका दर्जा बिगड़ कर 36 से 42 पर आ गया, करों के भुगतान के मामले में 157 पर और अनुबंधों के पालन में तो और भी नीचे, 178 पर। कुल मिलाकर, 189 देशों में भारत 130वें नंबर पर है। उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में देखें, तो भारत ऐसी तेईस अर्थव्यवस्थाओं में बाईसवें नंबर पर है। केवल मिस्र हमसे नीचे के पायदान पर है।

1960 के दशक से ही हमने ‘आजादी बनाम नियंत्रण’ के मुद्दे को गलत सिरे से पकड़ रखा है। हमने ‘नियंत्रण’ से शुरू किया और फिर हम थोड़ा-थोड़ा करके रियायतें देने लगे। सही नजरिया इसके उलट है। हमें ‘आजादी’ से शुरू करना चाहिए और फिर देखना चाहिए कि समान व्यवहार तथा नियमों के अनुपालन के लिए न्यूनतम नियमन क्या हों। इस दृष्टिकोण को पहली बार लागू करने का प्रयास मैंने 1991-92 में किया, जब हमने भयानक ‘रेड बुक’ (जिससे आयात व निर्यात का नियंत्रण होता था) को आग के हवाले कर दिया, और सीधी-सादी अंग्रेजी में सौ पेजों में आयात-निर्यात नीति का विधान लिखा। उसी नजरिए को मैंने फिर प्रत्यक्ष कर संहिता में लागू किया: संहिता के तीन मसविदे धूल खा रहे हैं, पर यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार ने घोषित किया है कि वह पचपन साल पुराने आय कर अधिनियम को हटाना नहीं चाहती।

दूसरा रास्ता जिससे सरकार आर्थिक स्वतंत्रता में दखल देती है वह है गलतियां करने वालों को दंडित करने के अपने अधिकार का मनमाना इस्तेमाल। मेरे खयाल से, यह सरकार के समय, ऊर्जा और संसाधनों को बेकार में जाया करना है, अगर वह हर गतिविधि में ‘गलतियां’ और ‘गलतियां करने वालों’ की तलाश में लगी रहती है। जब प्रशासनिक या कारोबारी फैसले लिये जाते हैं, भूलें होंगी, पर हरेक गलती, गड़बड़झाला नहीं है जिसकी जांच कराई जाए और दंडित किया जाए। यह संबंधित अर्थव्यवस्था के लिए मायने रखता है कि सरकार केवल भारी गलतियों पर दंडित करे, जो एकदम प्रकट हों और जिनके भयानक नतीजे हों।

आर्थिक स्वतंत्रता के मानकों पर

हेरिटेज फाउंडेशन और वॉल स्ट्रीट जर्नल ‘आर्थिक स्वतंत्रता’ के दस मानकों पर सालाना ‘इंडेक्स आॅफ इकोनॉमिक फ्रीडम’ प्रकाशित करते हैं। इसमें भारत का स्थान 178 देशों में 123वां है, जो कि हमें लगभग आर्थिक स्वतंत्रता से रहित श्रेणी में रखता है। विश्व आर्थिक मंच (वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम) का वैश्विक प्रतिस्पर्धा सूचकांक (ग्लोबल कंपटीटिवनेस इंडेक्स) एक अर्थव्यवस्था के ‘प्रतिस्पर्धात्मक चरित्र’ का आकलन करता है, और कुछ दिन पहले आई रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में 138 देशों में भारत का स्थान 39वां है। लेकिन स्वास्थ्य और प्राथमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा, श्रम बाजार के हिसाब से दक्षता और तकनीकी तैयारी जैसे बुनियादी मानकों पर भारत का स्थान 81 या उससे भी नीचे के पायदान है। यह चेतने का वक्त है। आर्थिक स्वतंत्रता का अभाव, अल्प प्रतिस्पर्धात्मकता और कारोबार करने में आने वाली बाधाएं निवेश, विकास दर, रोजगार सृजन, उपभोक्ताओं और सबसे ज्यादा गरीबों तथा गरीब इलाकों को नुकसान पहुंचाती हैं।

1991 में शुरू हुए आर्थिक सुधार के बावजूद, जिसकी एक शानदार कहानी है, सरकार और उद्योग जगत का मिलन बिंदु क्या हो, यह अब भी एक समस्या है। क्या करने की जरूरत है और क्या किया जा सकता है इस पर एक अलग स्तंभ की दरकार होगी और मैं आशा करता हूं कि वैसा एक स्तंभ मैं शीघ्र लिख सकूंगा।

 

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