December 05, 2016

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‘दूसरी नजर’ कॉलम में पी. चिदंबरम का लेख: रचनात्मक ध्वंस की जरूरत

1991 में शुरू हुए आर्थिक सुधार के बावजूद, जिसकी एक शानदार कहानी है, सरकार और उद्योग जगत का मिलन बिंदु क्या हो, यह अब भी एक समस्या है।

भारतीय रुपया।

अपने 2 अक्तूबर 2016 के स्तंभ में (‘यहां सही मायने में स्वतंत्रता कितनी है’), मैंने कारोबारी सुगमता के बारे में विश्व बैंक की रिपोर्ट का संक्षिप्त जिक्र किया था, और इन शब्दों के साथ उस स्तंभ का समापन किया था : ‘‘1991 में शुरू हुए आर्थिक सुधार के बावजूद, जिसकी एक शानदार कहानी है, सरकार और उद्योग जगत का मिलन बिंदु क्या हो, यह अब भी एक समस्या है। क्या करने की जरूरत है और क्या किया जा सकता है, इस पर एक अलग स्तंभ की दरकार होगी और मैं आशा करता हूं कि वैसा एक स्तंभ मैं शीघ्र लिख सकूंगा।’’
संचित लापरवाही

विश्व बैंक ग्रुप की ‘कारोबारी सुगमता 2017: सबके लिए समान अवसर’ शीर्षक सालाना रिपोर्ट प्रकाशित होने के साथ ही वह मौका आ गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत की स्थिति निराशाजनक है। पिछली रिपोर्ट और ताजा रिपोर्ट के बीच के साल में, भारत की कुल स्थिति केवल एक पायदान सुधरी है, 190 देशों के बीच 131 से 130 पर। इसका अर्थ है, शीर्ष 50 के बीच जगह बनाने के महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य के बावजूद, हालत जस की तस है।

बेशक, भारत इस निराशाजनक स्थिति में एक साल में नहीं पहुंचा है। यह आजादी के समय से, खासकर 1960 और 1970 के दशक से की जा रही गलतियों और लापरवाही का संचित परिणाम है, जब अर्थव्यवस्था की दिशा के निर्धारण और प्रबंधन में सरकारी हस्तक्षेप बड़े पैमाने पर होता था। तब कुछ खास संस्थाओं (प्राइवेट सेक्टर) तथा स्वाभाविक शक्तियों (बाजार) के प्रति गहरा अविश्वास था, और कुछ ढांचों (नौकरशाही) तथा संगठनों (सार्वजनिक उपक्रमों) पर बहुत ज्यादा निर्भरता थी। दूसरी अहम संस्थाएं (न्यायपालिका, नगर पालिकाएं) पहले की तरह चलती रहीं, हालांकि कई पुर्जे पुराने और बेकार हो चुके थे।अगर कोई विश्व बैंक ग्रुप के अध्ययन की कार्यप्रणाली पर बारीकी से गौर करे, तो वह कुछ महत्त्वपूर्ण सीमाएं रेखांकित कर सकता है। जहां तक भारत की बात है, निष्कर्ष केवल दो महानगरों के सर्वे पर आधारित है- दिल्ली और मुंबई। इसके अलावा, रिपोर्ट 190 देशों के बीच तुलनात्मक अध्ययन है, जिसके फलस्वरूप उन देशों का दर्जा तय किया गया है। इसका मतलब है कि अगर व्यापक रूप से महत्त्वपूर्ण सुधार हुआ होता, अगर अन्य देशों ने बहुत अच्छा किया होता, तो भारत की स्थिति में कोई सुधार लक्षित न होता। बावजूद इसके, निष्कर्ष महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वह भारत में कारोबारी मुश्किलों की हकीकत को करीब-करीब बयान करता है।

किस बात की शेखी
अध्ययन ने दस मानकों पर विभिन्न देशों को परखा है। भारत के मामले में, केवल दो मानकों पर सुधार दर्ज हुआ है: बिजली का कनेक्शन पाने में (51 से 26) और अनुबंधों के क्रियान्वयन में (178 से 172)। दो मानकों पर मामूली सुधार हुआ है, एक पर स्थिति जस की तस है, और बाकी पांच मानकों पर हालत और खराब हुई है। कुल मिलाकर, शेखी बघारने की कोई वजह नहीं है, जो कि हम समय-समय पर सुनते हैं।  दिल्ली और मुंबई में बिजली-वितरण के निजीकरण के कारण, बिजली का कनेक्शन पाना पहले से आसान हो गया है। सप्लाई में सुधार भी सहायक साबित हुआ है। अनुबंधों के क्रियान्वयन के मामले में, शायद दिल्ली और मुंबई की अदालतें इस बात को लेकर अब पहले से ज्यादा सजग हैं कि सख्त होने की जरूरत है; हालांकि 172वां स्थान, कोई सम्मानजनक स्थान नहीं है।

दूसरे मानकों के मुताबिक स्थिति कैसी है इसे देखें और सोचें कि क्या किया जा सकता है।संपत्ति का पंजीयन (140/143) : जैसे हमने प्रतिभूतियों के लिए अमानतदारों को अधिकृत कर रखा है, वैसे ही हमें प्राइवेट पंजीयकों को अधिकृतकरना चाहिए, जिनके बीच प्रतिस्पर्धा होगी और बेहतर तथा तीव्र सेवा सुलभ होगी। विदेश व्यापार (144/143) : बाहर का माहौल वास्तव में पहले से ज्यादा संरक्षणवादी और मुश्किल हो गया है। ऐसा भारत में भी हुआ है, खासकर इस वजह से कि अर्थहीन और अप्रासंगिक बातें फिर से विदेश व्यापार नीति तथा नियम-कायदों में शामिल कर ली गई हैं। मंत्री महोदय विचारों से चुक गए लगते हैं। यह वक्त है कि कारोबार के आड़े आने वाले नियम-कायदों को एक बार फिर आग के हवाले कर दिया जाए, जैसा कि 1991-92 में हुआ था। प्रहरी को भी बदलने की जरूरत है।

समग्र सुधार
कारोबार की पहलकदमी (151/155): अड़चनें जानी-पहचानी हैं। छोटे व मझले उद्यमों के मामले में पूर्व अनुमति के नियम को खत्म करने तथा यह नियम बनाने की जरूरत है कि उद्यमी उद्यम शुरू करने के साठ दिनों के भीतर उसकी रिपोर्ट दे।दिवालियेपन का निराकरण (135/136) : दिवालियेपन से संबंधित नई संहिता को एक साल तक आजमाएं। उसके बाद उसे संसद में लाया जाए, जो उसमें सुधार करे। निर्माण की इजाजत (184/185) : यह एक ऐसा मामला है जो अवैध कमाई के लिए दुनिया भर में कुख्यात है, और भारत अपवाद नहीं है। मुझे सुझाव देने से अरुचि है, पर यहां एक सुझाव देना चाहूंगा। जन सुनवाई शुरू करें और आवेदनों पर निर्णय करें। यह अदालत में होने वाली सुनवाई जैसी होगी, और सुनवाई के अंत में हर आवेदन पर फैसला दिया जाना चाहिए।

कर्ज प्राप्ति (42/44) : एनपीए के मामले में हालत और बिगड़ने के कारण, यह हैरत की बात नहीं कि कर्ज पाना और मुश्किल हो गया है। एनपीए से पार पाने के लिए सरकार ने धमकियों, मनमानी नियुक्तियों और अनुपयोगी पर्यवेक्षी (सुपरवाइजरी) बोर्ड का सहारा लिया है। हमारे सामने 1997/1998 में और भी बुरी स्थिति थी, और तब हमने अनुभवी बैंकरों को ज्यादा सशक्त करके समाधान निकाला था। अब भी वही रास्ता है। साधारण निवेशकों की रक्षा (10/13) : सरकार ने महीनों से रिक्त पदों पर नियुक्तियां न करके कंपनी लॉ बोर्ड को बेजान बना दिया है। अब हमारे पास नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल और अपीलीय ट्रिब्यूनल हैं। उनके काम पर बारीकी से नजर रखी जानी चाहिए ताकि वे बेहतर परिणाम दे सकें।
कर भुगतान (172/172) : करों का भुगतान करना क्यों पहले से और कठिन हो गया है? भारतीय जनता पार्टी ‘टैक्स टेररिज्म’ यानी कर-आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल करती थी।

आज किसी व्यवसायी से पूछें कि आय कर, उत्पाद शुल्क और सेवा कर से संबंधित महकमों के मौजूदा कामकाज के बारे में उसका क्या खयाल है, तो जो शब्द आपको बारंबार सुनने को मिलेगा वह ‘टैक्स टेररिज्म’ ही होगा। हाल में ‘काले धन’ की पैंसठ हजार करोड़ की ‘फसल’ और उसके बाद विभिन्न कर-अधिकारियों की कार्रवाइयों के खौफनाक किस्से सुनने को मिलेंगे। पीछे की तारीख से कर वसूली (यूपीए के समय सिर्फ एक, वोडाफोन का मामला था) जारी है। ऐसा लगता है कि कर-संग्रह को लेकर सरकार दिग्भ्रमित है, और यहां मैं कोई सुझाव नहीं दूंगा। मुझे खुशी है कि प्रधानमंत्री ने विश्व बैंक ग्रुप की रिपोर्ट के मद््देनजर सुझाव मांगे हैं। सबसे अच्छे सुझाव वे होंगे जो मौजूदा व्यवस्था के ‘रचनात्मक ध्वंस’ की वकालत करेंगे।

 

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First Published on October 30, 2016 4:47 am

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