December 05, 2016

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‘दूसरी नजर’ कॉलम: नया नोट निर्णायक बाजी नहीं

जब तक कर-योग्य आय और कर-मुक्त आय का सह-अस्तित्व है, धन का हस्तांतरण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को होगा, तो धन का रंग बदल सकता है।

Author नई दिल्ली | November 13, 2016 05:53 am
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया द्वारा जारी 2000 का नया नोट। (फोटो- ट्विटर)

धन का कोई रंग नहीं होता। अधिकतर देशों में कुछ तरह के धन के लेन-देन पर कर लगता है। लिहाजा, धन के दो प्रकार हैं- धन जिस पर कर नहीं लगता, और धन जिस पर कर लगता है। अगर धन कर के दायरे में है और उस पर कर नहीं दिया जाता या कराधान से बचा जाता है, तो उस धन को आमतौर पर बेहिसाबी धन या ‘काला धन’ कहते हैं। धन पर लगने वाले कर का सबसे जाना-पहचाना रूप आय-कर है। इसे प्रगतिशील कर माना जाता है- ज्यादा आमदनी, ज्यादा कर। अलबत्ता बहुत-से लोग नाखुशी से ही आय-कर देते हैं। वे मानते हैं कि आय-कर की दरें बहुत ज्यादा हैं और आय-कर आमदनी की जब्ती का जरिया है।

कर-मुक्त आय : कर न देने वाला खलनायक समझा जाता है। कभी-कभी हम गलत लोगों को खलनायक मान बैठते हैं। अगर नीतिगत कारणों से, लोगों द्वारा अर्जित आय का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा कर के दायरे में नहीं है, तो वह आय भी वैध और कानून-सम्मत है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण भारत है, जहां कृषि-आय पर कर नहीं लगता, मगर वह आय वैध तथा कानून-सम्मत है।

जब तक कर-योग्य आय और कर-मुक्त आय का सह-अस्तित्व है, धन का हस्तांतरण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को होगा, तो धन का रंग बदल सकता है। एक किसान से एक दुकानदार, और फिर वहां से एक डॉक्टर को हस्तांतरित होने वाले धन पर गौर करें। कौन कर के दायरे में है, इस पर निर्भर करता है कि धन का रंग सफेद से काला तथा फिर से सफेद हो जा सकता है।

इसके अलावा, जैसा कि कोई भी अर्थशास्त्री बताएगा, काला धन पूरी तरह ‘स्टॉक’ (भंडार) के रूप में नहीं है। अधिकांशत: यह ‘प्रवाह’ के रूप में है। शायद पुराने दिनों में बेहिसाबी धन नगदी के रूप में इकट्ठा रहता था- जैसी कि कहावत है, ‘गद््दे के नीचे’। बेहिसाबी धन अब अधिकांशत: जमीन-जायदाद, मकान, सोना-चांदी और आभूषणों तथा शेयरों/प्रतिभूतियों में छिपा रहता है। और सबसे बड़ी बात यह कि बेहिसाबी धन को पैदा होने से रोकना भी मुश्किल है तथा उसके प्रवाह पर नजर रखना भी।

यह विमुद्रीकरण नहीं : कुछ दिन पहले सरकार ने एलान किया कि पांच सौ और हजार रुपए के नोट अब ‘विमुद्रीकृत’ हो गए हैं। ‘विमुद्रीकरण’ (डिमोनेटाइजेशन) का एक खास अर्थ है। इसका मतलब होता है कि संबंधित मूल्य का करेंसी नोट अब से महज कागज का टुकड़ा है! वैसा कुछ नहीं हुआ है।
सरकार की 8 नवंबर 2016 की अधिसूचना के मुताबिक, पचास और सौ रुपए के नोटों के वैध चलन का दर्जा वापस ले लिया गया है, पर इसी के साथ यह साफ किया गया है कि ये नोट रिजर्व बैंक के किसी कार्यालय या किसी बैंक-शाखा में जमा कराए जा सकते हैं और बदले में उतने ही मूल्य के नए नोट हासिल किए जा सकते हैं। सो, एक चीज साफ है कि यह विमुद्रीकरण नहीं है, और सरकार के प्रवक्ता को उचित ही यह सलाह दी गई होगी कि वह इस शब्द का इस्तेमाल न करे। सही ढंग से इस निर्णय को कहना हो तो कहना होगा ‘पुराने नोटों के बदले नए नोट!’ सरकार और रिजर्व बैंक, दोनों ने ‘पुराने नोटों के बदले नए नोट’ के निर्णय के पीछे तीन मकसद बताए हैं। पहला, जाली नोटों से निपटना। यह कोई नई बात नहीं है। रिजर्व बैंक समय-समय पर यह करता रहा है, एक निश्चित अवधि के दौरान नई शृंखला के नोट जारी किए गए और पुरानी शृंखला के नोट जब्त तथा नष्ट किए गए।

दूसरा मकसद है जाली नोटों को खत्म कर आतंकवाद को नेस्तनाबूद करना। यह वास्तव में पहले मकसद का ही हिस्सा है। तीसरा मकसद है, नगदी के रूप में जमा काले धन को व्यर्थ कर देना। इसके पीछे धारणा यह है कि बेहिसाबी धन दरअसल पांच सौ और हजार रुपए के नोटों का भंडार है और इसलिए वह व्यर्थ हो जाएगा। मार्च 2016 के आखीर में, पांच सौ रुपए के 1570 करोड़ और हजार रुपए के 632 करोड़ नोट चलन में थे, जिनका मूल्य चलन वाली कुल मुद्रा का 86.4 फीसद था। पहला कदम : 30 दिसंबर तक की समय-सीमा में, यानी 51 दिनों के भीतर उन्हें बाहर निकालो, लोगों को बाध्य करके कि उन नोटों को बैंकों में इस अवधि में जमा करा दें। दूसरा कदम : अगर यह सही मायने में विमुद्रीकरण है, तो नोटों को नष्ट कर दो, जो कि एकदम साफ वजहों से सरकार वैसा नहीं करेगी- जबकि वह क्रांति ही न चाहती हो!

सच्चाई यही है कि पुराने नोटों की जगह नए नोट आ जाएंगे। इसलिए सही सवाल यह है कि नए नोटों से बदलने की खातिर पुराने नोट किस अनुपात में जमा कराए गए हैं? केवल वही नोट, जो कि जमा नहीं कराए जाएंगे, सही मायने में ‘विमुद्रीकृत’ माने जाएंगे।

गंभीरता से सोचें
सरकार की योजना में कई सारी अनिश्चितताएं हैं और कई अज्ञात पहलू:
1. सरकार इस निष्कर्ष पर कैसे पहुंची कि पांच सौ का नोट काफी कीमत का नोट है?
2. क्या सरकार ने नए नोटों की होने वाली मांग के लिए तैयारी कर ली थी? शुरुआती कुछ दिन बेहद अराजकता के रहे हैं और लोगों को काफी तकलीफें उठानी पड़ी हैं।
3. नए नोटों की छपाई के खर्च सहित पुराने नोटों को नए से बदलने की कितनी लागत बैठी होगी? मेरा आकलन है कि पंद्रह हजार करोड़ से बीस हजार करोड़ के बीच। क्या इस कवायद की इतनी कीमत चुकाई जानी चाहिए?
4. नगदी की मौजूदा मात्रा जीडीपी का बारह फीसद है। क्या यह कम होकर चार फीसद के वैश्विक औसत पर आएगी?
5. ऊंचे मूल्य वाले नोट, जो चलन में हैं, उनकी कीमत पंद्रह लाख करोड़ रुपए है। क्या इसमें काफी हद तक कमी आ जाएगी?
6. सोने के आयात में बढ़ोतरी क्या इस बात का संकेत है कि आय/धन को सोने-चांदी और स्वर्णाभूषणों में छिपाया जाएगा?
8. और सबसे उलझन में डालने वाला पहलू: सरकार के मकसद कैसे सधेंगे, अगर नए तथा ज्यादा कीमत के नोट (दो हजार रुपए के) लाए जाएंगे?
मेरा जिक्र, उपहास के अंदाज में, एक स्तंभकार के तौर पर होता है। सरकार के मंत्री इस स्तंभकार के सवालों का जवाब दें या न दें, कम से कम ब्लागर तो इनका जवाब देने की मेहरबानी करें।

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First Published on November 13, 2016 2:57 am

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