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परिदृश्य: विस्थापन का विकास

प्रमोद मीणा पर्यावरण एवं वन मंत्रालय पिछले कुछ सालों से विवादों के केंद्र में रहा है। इस पर जहां कुछ उद्योगपतियों और मंत्रियों ने विकास के रास्ते में रोड़ा डालने के आरोप लगाए, वहीं इसके खिलाफ अपने नजदीकी पूंजीपतियों का रास्ता निष्कंटक बनाने की शिकायतें भी सुनने को मिलती रही हैं। दरअसल, इन सारे विवादों […]
Author April 12, 2015 16:46 pm

प्रमोद मीणा

पर्यावरण एवं वन मंत्रालय पिछले कुछ सालों से विवादों के केंद्र में रहा है। इस पर जहां कुछ उद्योगपतियों और मंत्रियों ने विकास के रास्ते में रोड़ा डालने के आरोप लगाए, वहीं इसके खिलाफ अपने नजदीकी पूंजीपतियों का रास्ता निष्कंटक बनाने की शिकायतें भी सुनने को मिलती रही हैं।

दरअसल, इन सारे विवादों के मूल में प्रकृति और विकास का द्वंद्वात्मक रिश्ता है। सरकार विकास की अपनी महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं को किसी भी कीमत पर पूरा करके देश को विश्व स्तर पर आर्थिक शक्ति बनाना चाहती है, जबकि पर्यावरण मंत्रालय की स्थापना प्रकृति की कीमत पर होने वाले आर्थिक विकास पर लगाम लगाने के लिए हुई है।

इस तरह अपने अस्तित्व के लिए प्रकृति पर निर्भर आदिवासी समुदायों के हित भी इस मंत्रालय से जुड़ गए हैं। प्रकृति को खतरे में डाल कर मंजूर की जाने वाली आर्थिक गतिविधियों से आदिवासियों का पूरा जीवन ही दांव पर लगा हुआ है। पर आज आर्थिक विकास के पक्षधर तमाम लोग इस मंत्रालय और पर्यावरण कानूनों पर विकास की गाड़ी को पटरी पर से उतारने के आरोप भी लगा रहे हैं।

सर्वोच्च न्यायालय की सक्रियता के चलते 2010 में अस्तित्व में आया राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण भी औद्योगिक घरानों और पूंजीवादी निगमों की आंखों में शुरू से खटकता रहा है, क्योंकि कई अवसरों पर इसने औद्योगिक परियोजनाओं के पैरवीकारों और निवेशक कंपनियों से असुविधाजनक प्रश्न पूछ कर उनकी मंशाओं पर से परदा उठाया है।

केंद्र में सरकार बदलने के साथ ही प्रगति और प्रकृति के बीच जारी द्वंद्व और तेज हो गया है। ‘मेक इन इंडिया’ का नारा देते हुए सरकार ने आर्थिक प्रगति की अपनी महत्त्वाकांक्षा से कोई भी समझौता न करने का इरादा जाहिर कर दिया है। प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई सरकार को विकास परियोजनाओं से प्रभावित होने वाले लोगों की अब कोई परवाह नहीं रह गई है। लगता है, वह इन्हें विकास के मार्ग का कांटा मान चुकी है।

हालांकि पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर बार-बार आश्वासन देते रहे हैं कि विध्वंसक विकास को कहीं स्वीकृति नहीं दी जाएगी, लेकिन भूमि अधिग्रहण अधिनियम और खनन अधिनियम आदि में प्रस्तावित बदलावों को लेकर जो अध्यादेश लाया गया, उससे सरकार की कथनी और करनी का अंतर साफ दिखता है। सरकार की मंशा स्पष्ट है कि वह पर्यावरण कानूनों में भी मनमाफिक फेरबदल करना चाहती है। इस पूरे परिदृश्य में पर्यावरण संरक्षण और लोगों की आजीविका को बचाने के मुद्दे पृष्ठभूमि में धकेल दिए गए हैं, निगमीय अर्थव्यवस्था के खिलाड़ियों के हितों को वरीयता दी जा रही है।

ऐसे संकेत मिलने लगे हैं कि सरकार वनाधिकार कानून को नखदंत विहीन करने का मानस बना चुकी है। बीते अगस्त में पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने छह वन कानूनों की समीक्षा के लिए मंत्रालय के एक पूर्व सचिव की अगुआई में उच्च स्तरीय समिति गठित की थी। चूंकि समिति की रपट को लेकर पर्यावरण हितैषियों और आदिवासी सामाजिक संगठनों में व्यापक असंतोष है, इसलिए अब यह रपट पर्यावरण संबंधी स्थायी संसदीय समिति के पास समीक्षाधीन है। संसदीय समिति देश के शीर्षस्थ पर्यावरणविदों के साथ उनकी आशंकाओं पर एक दौर की सुनवाई कर चुकी है।

उच्च स्तरीय समिति की रपट देखने से पता चलता है कि उसने नियामक प्रक्रिया और इसे अंजाम देने वाले तंत्र पर सीधा निशाना साधा है। समिति का एकमात्र तार्किक सुझाव जीएम फसलों के खतरों पर व्यक्त चिंताओं को लेकर है। समिति के सदस्य छानबीन शुरू करने से पहले ही इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के समक्ष प्रस्तुत विकास परियोजनाओं की जांच और मंजूरी विषयक प्रक्रिया गंभीर खामियों से ग्रस्त और काफी वक्त बरबाद करने वाली है। रपट में मंजूरी प्रक्रिया पर अंगुली उठाने के बजाय पर्यावरण कानूनों को ही सिरे से खारिज करने का प्रयत्न किया गया है।

मंत्रालय विकास परियोजनाओं की त्वरित मंजूरी को सुगम बनाने के नाम पर पर्यावरण कानूनों में सरकार की आर्थिक नीतियों के अनुसार अपेक्षित फेरबदल का मानस पहले ही बना चुका था। उसकी ओर से समिति को स्पष्ट निर्देश थे कि वह वर्तमान की आवश्यकताओं और लक्ष्यों के मद्देनजर पर्यावरण कानूनों में समुचित संशोधनों की संभावनाओं पर विचार करे।

पूंजीवादी कॉरपोरेट के कंधों पर सवार होकर सत्ता में आई हिंदुत्ववादी सरकार की मंशा अब किसी से छिपी नहीं है। पर्यावरण मंत्रालय का लक्ष्य अब पर्यावरण कानूनों की सामर्थ्य और दायरों को व्यापक बनाना नहीं है और न पर्यावरण का संरक्षण करना उसकी प्राथमिकता है। उसकी प्राथमिकता अब इन कानूनों की बांहें मरोड़ कर प्रस्तावित विकास परियोजनाओं की तेज मंजूरी सुनिश्चित करना है।

समिति की कार्यप्रणाली पर भी काफी लोगों ने आपत्ति दर्ज की है। एक आम धारणा यह है कि समिति ने राज्य सरकारों, विकास परियोजनाओं से प्रभावित लोगों और विषय विशेषज्ञों से पर्याप्त विचार-विमर्श नहीं किया। समिति ने तो सिर्फ मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार खानापूर्ति की है। हालांकि समिति का दावा है कि उसने उपलब्ध समय-सीमा में अपना सर्वश्रेष्ठ करने का भरसक प्रयास किया है। लेकिन वास्तविकता यही है कि जो समिति को करना चाहिए था, उसमें वह पूर्णत: विफल रही है।

समिति की रपट में सबसे आपत्तिजनक है एक ऐसे पर्यावरण कानून प्रबंधन अधिनियम की प्रस्तावना रखना, जिसमें पर्यावरण विषयक अपराधों को नए सिरे से पुनर्परिभाषित किया गया है। परियोजनाओं पर पर्यावरण मंजूरी चाहने वाले आवेदकों से अपेक्षा की गई है कि वे ईमानदार और विश्वसनीय हों। उनकी नेकनियती संबंधी वैधानिक प्रावधान भी इस कानून में जोड़ा गया है। लेकिन जब रपट खुद यह कहती हो कि हमारे व्यापारी और उद्यमी ईमानदारी की कसौटी पर प्राय: खरे नहीं उतरते तब आपकी यह आशा ही बेतुकी है कि वे अपने परियोजना प्रस्तावों में व्यावसायिक नैतिकता और भलमनसाहत का सच्चाई के साथ निर्वाह करेंगे।

रपट विकास परियोजना के आवेदनकर्ता की स्वघोषित नैतिकता और भलमनसाहत की बिना पर उसके प्रस्ताव को स्वीकृति देने की अनुशंसा करती है। हालांकि परियोजना स्वीकृति और क्रियान्वयन उपरांत भी अगर आवेदक की जालसाजी उजागर होती है, तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान इसमें रखा गया है। लेकिन ऐसे भ्रष्ट उद्योगपति और पूंजीपति को जेल भेजने या सख्त आर्थिक दंड देने के बावजूद नष्ट हो चुकी पारिस्थितिकी के साथ आप कभी न्याय नहीं कर पाएंगे।

यह उच्चस्तरीय समिति राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण की भूमिका को भी कमजोर करती है। वह अनुशंसा करती है कि इस न्यायाधिकरण को अपीलीय समितियों द्वारा किए गए निर्णयों की न्यायिक समीक्षा करने तक ही सीमित रखना चाहिए। इस रपट में विशेष पर्यावरण न्यायालयों और नई एजेंसियों की प्रस्तावना है, जिसके अनुसार केंद्र और राज्य स्तर की वर्तमान पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण समितियों के स्थान पर पर्यावरण प्रबंधन प्राधिकरण का गठन प्रस्तावित है। केंद्र और राज्य सरकारों की पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण समितियां अपनी अक्षमताओं और भ्रष्टाचार के लिए कुख्यात रही हैं। नए प्राधिकरण द्वारा इन पुरानी समितियों को अपदस्थ करने मात्र से प्रशासनिक कार्यकुशलता और ईमानदारी की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?

हैरानी की बात है कि देश के कर्णधार आर्थिक विकास के लक्ष्यों को साधने की उतावली में पर्यावरण कानूनों को कमजोर करने को तत्पर हैं, पर्यावरण के साथ किए जाने वाले खिलवाड़ के नतीजों की ओर नहीं देखना चाहते। ‘मेक इन इंडिया’ का नारा उद्योगों को उनके दाय का वादा तो करता है, पर उन लाखों-करोड़ों हाशिये के समुदायों के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार जारी रहने देता है, जिनसे विकास के नाम पर उनकी जीवन-रेखा ही छीनी जाती रही है। लेकिन जिंदा कौमें एक हद के बाद विद्रोह अवश्य करती हैं और आदिवासी वही जिंदा कौम है, इसलिए सरकार को अपनी हदें पार करने से पहले एक बार फिर अपनी नीतियों पर तनिक ठहर कर सोचना चाहिए।

 

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