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ऐसे रोना भी क्या रोना

आधी रात हुई कि अचानक मेरी नींद टूट गई। नींद टूट गई, मगर आंखें देर में खुलीं। ऐसा बहुत-से लोगों के साथ होता है।

आधी रात हुई कि अचानक मेरी नींद टूट गई। नींद टूट गई, मगर आंखें देर में खुलीं। ऐसा बहुत-से लोगों के साथ होता है। वे नींद से बाहर आ जाते हैं, मगर उनकी आंखें नहीं खुलतीं। खैर, जब खुलीं तो पता चला कि कहीं दूर से किसी के रोने की आवाज आ रही है। मन खिन्न हो गया। इस शहर के लोगों में सभ्यता नाम की चीज बची ही नहीं। बताओ भला। कितना शानदार खाना खाकर सोया था। सोने से पहले सावधानी के साथ चैट शैट भी हो गई थी। संजाल समागम का अपना ही सुख है। इस सुख के बाद मुल्क के गरीबों का चिंतन किया था। अच्छा लगता है कि चलो हमने उनके लिए कुछ तो किया। ऐसा करने से मानुष भाव बना रहता है। मानुष भाव का तकिया लगा लेने से नींद अच्छी आती है, नींद टूट गई।
क्या होगा इस देश का, जहां लोगों को रोने का भी शऊर नहीं। जब हर काम का समय नियत है तो रोने का भी कर लो। यह नहीं सोचा कि बड़ा शहर है। देश-विदेश के तमाम अतिथि हजारों रुपए खर्च करके आराम से पड़े होंगे। उनके सुख में खलल पड़ेगा। दुख सह कर भी हंसते रहने का भारतीय दर्शन नष्ट हो रहा है। सुख-दुख में समान रहने का अभ्यास तो करवाया जा रहा है, लेकिन असर नहीं पड़ रहा।
रोने की आवाज इतनी मद्धिम थी कि ठीक-ठीक पता नहीं चल पा रहा था कि पुरुष का रोना है या औरत का। मैं सहानुभूति व्यक्त करना भी चाहूं तो किस शिल्प में करूं, किस मात्रा में करूं। रोना एक तरह का नहीं होता। पुरुष का, स्त्री का, गरीब का, अमीर का, पीट-पीट कर थक गए पुलिस वाले का, पिट-पिट कर थक गए किसी अमुक तमुक का। जाति, धर्म, भाषा और प्रांत के आधार पर भी रोने का विभाजन किया जा सकता है। अब देखिए, अंगरेजी में रोने का जो प्रभाव समाज पर पड़ता है वह हिंदी और उर्दू में रोने से नहीं पड़ता, एक पूंजीपति की हिचकी से मुल्क हिल जाता है। एक किसान की हिचकी पिचकी-पिचकी नजर आती है।
मै खीझ रहा हूं। रोना पारदर्शी और प्रामाणिक होना चाहिए। यह जिसकी भी आव़ाज है उसे रोने का महत्त्व नहीं पता। पढ़े-लिखे का रोना नहीं लगता। पढ़ा-लिखा समझदार आदमी तब रोता है, जब रोने पर दाद देने वाले सामने हों। एक-एक आंसू की कीमत वसूल कर लेने की शानदार परंपरा राजनीति और साहित्य में है। यह दूसरी परंपरा की खोज करता हुआ रोने वाला स्वर लगता है। और इस रोने में कोई उतार-चढ़ाव नहीं है। हमें चाहिए कि रुदन कला अकादेमी की स्थापना पर बल दें। इसे सिखाने वालों की कमी नहीं होगी, ऐसा बुद्धिजीवियों की संख्या के आधार पर कहा जा सकता है। इस अकादेमी से प्रशिक्षित लोगों की मांग गांव से लेकर विश्वग्राम तक होगी। जिस तरह हम उन्नति कर रहे हैं, उससे भरोसा जागता है कि ग्लोबल वीपिंग के सुनहरे दिन आने वाले हैं। हो सकता है, मांग इतनी बढ़े कि रोने के लिए लाइसेंस लेना पड़े। व्यवस्था कहे कि तुम महीने में दो बार रो चुके, अब अगले महीने रोना। आत्महत्या का लाइसेंस किसानों को समय-समय पर जारी होता ही रहता है। दूसरे लोग भी रोने से क्यों वंचित रहें।
खैर, यह सब स्वर्णिम भविष्य की बातें हैं। मगर अभी मैं परेशान हूं। पहले ही शहर में इतना प्रदूषण है, अब रुदन प्रदूषण। इन रोने वालों नें समाज में जाने कितने लोगों का जीना हराम कर रखा है। क्या इन पर कोई एक्शन नहीं लिया जा सकता। एक्शन लिया भी जाए, तो जाने कैसे-कैसे तर्क सामने आएंगे। इनके हिमायती कहेंगे कि ये भूखे हैं, गरीब हैं, परेशान हैं, बेरोजगार हैं, बीमार हैं। आदि-आदि। हिमायती नहीं जानते कि बहाना बनाना समाज के खिलाफ साजिश है। महात्मा गांधी ने कतार में खड़े अंतिम आदमी के आंसू पोंछने की बात कही थी। तो मान ली बात। दयालु व्यवस्था रूमाल दे रही है। आराम से अपने आंसू पोंछ लो। गांधी जानते थे कि स्वतंत्र भारत में बहुतेरे घरों में रोना एक कुटीर उद्योग बन जाएगा। इसीलिए उन्होंने स्वावलंबन पर जोर दिया था। अफसोस, हमारा मुल्क पूरी तरह रोने के उद्योग में ऐसा नहीं बन पाया है। हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। एक दिन हम रोने में आत्मनिर्भर हो जाएंगे। आखिर हमें महाशक्ति बनना है कि नहीं।
अभी-अभी लगा कि रोने की आवाज नजदीक आती जा रही है। तो क्या घर से बाहर निकल कर पता करूं। छोड़ो भी, रोने वाले को मुहूर्त का ध्यान नहीं, मगर मुझे तो है। चौराहे पर पुलिस वाले ने पूछ लिया कि रोने वाले से तुम्हारा क्या रिश्ता है, तो! रोने वाले से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहिए। पुलिस वाला न भी पूछे तो किसी मीडिया वाले को पता लग गया तो। अखबार में आ जाएगा कि रोने वाले की खोज करने निकला एक आदमी। यह तो गलत होगा। एक आदमी को रुलाने में जाने कितने लोगों की मेहनत लगती है। कितना पसीना बहाना पड़ता है। कभी-कभी तो पानी की तरह खून भी बहाना पड़ता है। औरों का। बहाते-बहाते थक जाने वाले कर्मवीरों को दुख होगा। दुख तो ठीक है। कहीं उन्होंने दिल पर लेकर मुझे निशाने पर ले लिया तो! मेरी तो खोज भी नहीं हो पाएगी। मैं कर्मवीरों का सहयोग न कर सकूं तो ठीक, मगर उनके काम में बाधा तो न बनूं। ऐसा सोचते ही मेरा मन ग्लानि से भर गया। ग्लानि का सही अर्थ मुझे नहीं पता और शब्द का उच्चारण भी ठीक से नहीं कर पाता, मगर जो भी है उससे भर गया। भर जाने का एक कारण यह भी रहा कि रोना-गाना तो सब ऊपर वाले के अधीन है। बाकायदा धर्म में इसकी व्याख्या है। बाकायदा इस व्याख्या पर लाखों लोगों का व्यापार टिका है। बाकायदा इस व्यापार को संस्कृति का डिपार्टमेंटल स्टोर समझा जाता है। ओह, तो मैं इतने सब बाकायदाओं में बाधक बनने जा रहा हूं। यह सोच कर मेरे रोएं आदि खड़े हो गए। रोएं होते ही हैं इसलिए कि सही मौके पर खड़े हो जाएं। न जानें क्यों मुझे बचपन में सुनी कुछ कहानियां याद आ गर्इं। इनमें होता था कि रात में रोने की आवाज सुन कर कोई राजा उस आदमी को ढूंढ़ने निकल पड़ता था। राजा जब खोज लेता था तब वह आदमी कभी देवदूत बन जाता था, कभी देवी लक्ष्मी।
एक मन ने कहा कि निकल ही पड़ूं। दूसरे मन ने कहा कि वह अगर देवदूत या लक्ष्मी न निकला तो! तीसरे मन ने कहा, तो क्या, वहीं तमाम कर देंगे धोखेबाज को। रो-रो कर ठगता है शरीफ लोगों को। लेकिन जाने दो। रात बहुत बीत चुकी है। ताज्जुब है कि मैं सोचते-सोचते कहां निकल आया, मगर यह रोने का स्वर मेरा पीछा कर रहा है। यह कब तक रोता रहेगा। कब तक पर मुझे आपत्ति नहीं। लोकतंत्र में सबको समान अधिकार है। मगर रात है, इसका तो खयाल हो। मैं मीडिया में जाकर यह सुझाव दूंगा कि सस्ता साइलेंसर ईजाद किया जाए। इसे आसान तरीके से रुलाने वाली किस्तों पर उन लोगों को दिया जाए, जो रोनेच्छुक हैं। वे रोएं, मगर अन्य लोगों को डिस्टर्ब न करें। भई हमें दिक्कत न हो तो आप आत्महत्या करें, चिल्लाएं, रोएं, तड़पें चाहे जो करें। शरीफ लोग डिस्टर्ब हुए तो कानून अपना काम करेगा। अरे रे। यह सब मैं क्या सोचने लगा। क्यों सोचने लगा। मैंने तो बड़ी उन्नति कर ली है। अब मुझ तक रोते हुए मां-बाप की आवाज भी नहीं पहुंचती। तो आज मुझे यह आवाज क्यों सुनाई पड़ रही है। जरूर मेरी शिक्षा में कोई कमी रह गई। कोई बात नहीं, उपयोगिता का आसन बिछा कर ध्यान लगा लेता हूं। अहा। लगने लगा ध्यान। महसूस हो रहा है कि रोने की आवाज सहसा लोकतांत्रिक संगीत में बदल गई है। मैं ध्यान में डूबता जा रहा हूं।

 

 

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  1. संतोष त्रिवेदी
    Dec 13, 2015 at 4:03 am
    सुशील जी का व्यंग्यात्मक लेखन जबरदस्त है।
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    Reply
    1. K
      Kulina Kumari
      Dec 13, 2015 at 2:12 am
      यह मात्र व्यंग्य नही, आज कल में विकसित और पढ़े लिखे समाज के लोगो की ऐसी ही सोच हो रही है, यह लेख हमें बता रहा है की हम प्रगति करके भी कितना पीछे हो गए है, शायद दुसरो के प्रति संवेदनहीन हो गए है...हमें फिर से पुनर्विचार करने की जरुरत है की खुसी या आनंद का मतलब सिर्फ अपना लाभ है या समग्र को लेकर चलने की जरुरत है..
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      Reply
      1. Vikas Thakur
        Dec 15, 2015 at 1:23 pm
        अच्छा सा कोई मौसम, तनहा सा कोई आलम। हर वक्त का रोना तो, बेकार का रोना है। ग़म हो कि खुशी दोनों, कुछ देर के साथी हैं। फिर रस्ता ही रस्ता है, हसना है न रोना है।
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        सबरंग