ताज़ा खबर
 

दिल्ली का दमामा बाज रहा

मार्क्सवादी और गैरमार्क्सवादी दोनों तरह के लेखकों के लिए दिल्ली एकमात्र तीर्थस्थली के रूप में तब्दील हो गई।
Author May 14, 2017 04:07 am
जब हमारे विद्वान धड़ल्ले से ‘लब्धप्रतिष्ठ’ की जगह ‘लब्ध प्रतिष्ठित’ बोल रहे हैं, ‘अनेकों’ और ‘श्रीमति’ का प्रचलन आम और क्षम्य हो गया है, तो फिर युवा पीढ़ी का क्या दोष! वह तो वही आत्मसात कर रही है, जो हम उसको परोस रहे हैं।

दिनेश कुमार 

बहुत समय पहले ‘अंधेरे में’ शीर्षक कविता में मुक्तिबोध ने लिखा था-‘क्या करूं, कहां जाऊं दिल्ली या उज्जैन?’ उस समय उनके मन में एक दुविधा थी कि वे सांस्कृतिक केंद्र की तरफ जाएं या राजनीतिक केंद्र की तरफ। कालांतर में यह दुविधा धीरे-धीरे समाप्त होती गई। हिंदी के सारे बड़े ‘आइकन’ आकर दिल्ली में बस गए। कुछ प्रतिरोध की राजनीति करते-करते सत्ता के सबसे बड़े केंद्र में दाखिल हो गए, तो कुछ यहीं से प्रतिरोध की राजनीति करने लगे। मार्क्सवादी और गैरमार्क्सवादी दोनों तरह के लेखकों के लिए दिल्ली एकमात्र तीर्थस्थली के रूप में तब्दील हो गई। आज हिंदी की मुख्यधारा में दखल रखने वाले अधिकतर लेखक दिल्ली और एनसीआर में रह रहे हैं और जो नहीं हैं वे किसी भी तरह पहुंचने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं।  दिल्ली के प्रति लेखकों के इस आकर्षण का एक बड़ा कारण है कि दिल्ली पूरे देश में साहित्य को संचालित और नियंत्रित करने वाला एकमात्र शक्तिकेंद्र बन गया है। ऐसा माहौल बना दिया गया है कि अच्छे रचनाकार होने के लिए दिल्ली की स्वीकृति आवश्यक है। बाहर के रचनाकार दिल्ली और यहां के मठाधीश बन चुके लेखकों को हसरत भरी निगाहों से देखते और अपनी साहित्यिक और साहित्यिेतर गतिविधियों द्वारा उनकी नजर में आने का जी-तोड़ प्रयास करते रहते हैं। मगर जो लेखक साधन संपन्न नहीं हैं, रचना-कर्म के अलावा और कुछ कर पाने में असमर्थ हैं, उन्हें साहित्य की मुख्यधारा से बाहर फेंक दिया जाता है। उन्हें एक तरह से निर्वासन झेलना पड़ता है। यह प्रवृत्ति साहित्य के लिए बहुत खतरनाक है।
साहित्यिक केंद्र बनने में पत्र-पत्रिकाओं और प्रकाशन जगत की निर्णायक भूमिका होती है। शुरू-शुरू में कोलकाता हिंदी का केंद्र था। हिंदी का पहला पत्र वहीं से निकला। आगे ‘भारत मित्र’, ‘मतवाला’, ‘विशाल भारत’ आदि महत्त्वपूर्ण प्रकाशन वहीं से हुए। फिर भारतेंदु के समय बनारस एक बड़े साहित्यिक केंद्र के तौर पर उभरा। बीसवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध तक इसकी चमक बरकरार रही। छायावाद के दौर में लखनऊ भी कुछ समय के लिए साहित्यिक केंद्र रहा। उस दौर की दो महत्त्वपूर्ण पत्रिकाओं ‘सुधा’ और ‘माधुरी’ का प्रकाशन वहां से होता था। कालांतर में बनारस और लखनऊ के ध्वस्त होने के बाद इलाहाबाद एक बड़ा साहित्यिक केंद्र बना। यह केंद्र ‘छायावाद’ से ‘नई कविता’ के काल तक अत्यंत प्रभावशाली रहा। भिन्न-भिन्न जगहों से लेखक आकर इलाहाबाद में रहते थे, बहुतों ने तो स्थाई निवास ही बना लिया। महत्त्वपूर्ण प्रकाशन भी तब इलाहाबाद में थे। ‘रूपाभ’, ‘प्रतीक’, नई कहानियां’ आदि जैसी कई महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएं इलाहाबाद से निकल रहीं थीं।

इसके बाद भोपाल एक बड़ा साहित्यिक केंद्र बना। यह केंद्र मुख्य रूप से भारत भवन के कारण अस्तित्व में आया। वह तरह-तरह के सेमिनारों के कारण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय लेखकों के मिलने-जुलने का केंद्र बना। सरकार द्वारा पोषित और समर्थित यह पहला और इकलौता साहित्यिक केंद्र रहा। वह भी धीरे-धीरे ध्वस्त हो गया। अब लगभग सभी महत्त्वपूर्ण प्रकाशन दिल्ली में हैं और अधिकतर महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएं यहां से निकल रही हैं। सभी महत्त्वपूर्ण अकादमियां और सांस्कृतिक संस्थाएं दिल्ली में हैं। इनसे लाभान्वित होने के लिए, अपना जुगाड़ बिठाने के लिए हर कोई दिल्ली भाग रहा है। साहित्य पीछे छूट गया और जोड़-तोड़ महत्त्वपूर्ण हो गया है। साहित्यिक केंद्र बनने और ढहने की प्रक्रिया हिंदी में चलती रही है। पर दिल्ली का साहित्यिक केंद्र बनना पूर्ववर्ती ऐतिहासिक प्रक्रिया से कई मायनों में अलग है। पहली बात तो यह कि पहले जितने भी केंद्र थे वे राजनीतिक सत्ता के केंद्र नहीं थे। यह पहली बार हुआ है कि राजनीति का केंद्र ही साहित्य का केंद्र हो गया है। इससे सत्ता और साहित्य के बीच एक गठजोड़ का रिश्ता बना। दिल्ली ने साहित्यकारों की प्रतिरोधात्मक क्षमता को आचरण के स्तर पर समाप्त कर दिया। साहित्य सत्ता का प्रतिपक्षी न होकर उसका सहयोगी बनता गया। सत्ता से जुड़ने के लिए उसने अपनी नैतिक आवाज को तिलांजलि दे दी। साहित्य और सत्ता की दुरभिसंधि ने प्रतिपक्ष के रूप में साहित्य की वैधता को लगभग समाप्त ही कर दिया है। दिल्ली केंद्रीयता ने साहित्य के प्रतिरोधी दांत को उखाड़ने में बड़ी भूमिका निभाई है।
पहले नए साहित्यिक केंद्र विकसित होने से पुराने साहित्यिक केंद्र महत्त्वहीन नहीं हो जाते थे। यानी, एक की कीमत पर दूसरे केंद्र विकसित नहीं होते थे। पुराने केंद्रों में भी साहित्यिक सक्रियता बरकरार रहती थी। साहित्य का स्वरूप विकेंद्रीकृत था और उसके नए-पुराने केंद्रों के बीच वर्चस्व और अधीनता का न होकर बराबरी का संबंध था। लेखक की हैसियत का निर्धारण इससे नहीं होता था कि वह कहां रहता है। कोलकाता, बनारस, इलाहाबाद, लखनऊ, भोपाल के साथ ही कानपुर, आगरा, गोरखपुर, पटना, रांची, जबलपुर, रायपुर, शिमला जैसे न जाने कितने छोटे-छोटे केंद्र थे, जो मुख्य साहित्य केंद्र के समांतर अपना अस्तित्व बचाए हुए थे। दिल्ली के साहित्यिक केंद्र बनने के बाद से ये सारे छोटे-बड़े केंद्र धीरे-धीरे नष्ट हो गए। साहित्य के शक्ति-केंद्र के तौर पर विकसित दिल्ली ने इन सारे केंद्रों को अपना अधीनस्थ बना लिया। सबसे दिलचस्प बात है कि इन केंद्रों ने भी दिल्ली का साहित्यिक उपनिवेश बनना खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया है। इन केंद्रों में भी पूरी तरह से दिल्लीपन हावी है। दिल्ली की तमाम पतनशील प्रवृत्तियां यहां भी पहुंच चुकी हैं। इन केंद्रों का स्वत्व पूरी तरह से समाप्त हो गया है और अब वे दिल्ली के ‘सेटेलाइट’ बन कर रह गए हैं। साहित्य के क्षेत्र में एक तरह से दिल्ली की तानाशाही स्थापित हो चुकी है। मार्क्सवादी से लेकर उदारवादी तक सभी इस पर मौन हैं। हिंदी में ऐसी स्थिति पहले कभी नहीं थी।
पहले साहित्य के जितने भी केंद्र बने उनकी तरफ रचनात्मक कारणों से लेखक आकर्षित होते थे। वे वहां रचनात्मक उन्मेश, नवीनता और प्रशिक्षण के लिए जाते थे। दिल्ली पहला साहित्यिक केंद्र है, जहां रचनात्मकता अत्यंत न्यून है। बल्कि कहें कि दिल्ली रचनात्मकता के लिए बंजर भूमि है, तो कोई अतियुक्ति न होगी। दिल्ली आने के बाद लेखकों की सृजनात्मकता का क्षय ही हुआ है। शायद ही किसी लेखक ने दिल्ली आने के बाद अपनी पूर्ववर्ती रचनाओं से श्रेष्ठ कुछ लिखा हो। दिल्ली आकर बसे लेखकों के पहले और बाद के लेखन का विश्लेषण करें तो तस्वीर स्पष्ट हो जाती है। आज भी हिंदी का श्रेष्ठ साहित्य दिल्ली के बाहर लिखा जा रहा है। सार्थक और महत्त्वपूर्ण साहित्यिक आयोजन भी दिल्ली के बाहर हो रहे हैं।
यह कितनी विचित्र स्थिति है कि जो दिल्ली साहित्य को संचालित कर रही है वह साहित्य का सृजन केंद्र नहीं है। दिल्ली में रचनात्मकता नहीं है, पर कोई रचनात्मकता अच्छी है या बुरी उसको निर्धारित दिल्ली कर रही है। यह स्थिति अभूतपूर्व है। दिल्ली मात्र शक्ति केंद्र है। बनारस, इलाहाबाद जैसे पूर्ववर्ती केंद्रों और वर्तमान केंद्र दिल्ली में यही बुनियादी फर्क है। दिल्ली में साहित्यिक प्रतिष्ठा के लिए साहित्य से अधिक साहित्येतर कारणों की निर्णायक भूमिका होती है। यह शक्ति-केंद्र का कमाल है कि दिल्ली का औसत लेखक भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है और बाहर का महत्त्वपूर्ण लेखक भी औसत हो जाता है। साहित्य के संघर्ष में दिल्ली ऐसी जगह है, जहां रहने मात्र से आपको आधी ताकत मिल जाती है। आप स्वत: स्फूर्त साहित्य के अभिजन बन जाते हैं। यहां के लोगों को साहित्य के वास्तविक और गंभीर प्रश्नों से कोई लेना-देना नहीं है। किसी को उठाना-गिराना यहां बैठे लोगों का प्रिय खेल है।
साहित्य की अधिकतर बुराइयों और कुप्रवृत्तियों का स्रोत दिल्ली है। साहित्य विरोधी वातावरण के निर्माण में दिल्ली की अग्रणी भूमिका है। साहित्य की दिल्ली केंद्रीयता से जो परिदृश्य उभरा है, वह वाकई चिंताजनक है। साहित्य के संदर्भ में दिल्ली एक शहर नहीं, रूपक बन गया है। इस रूपक से मुक्ति ही साहित्य की मुक्ति है।

 

 

जेट एयरवेज के मुंबई से दिल्ली जा रहे विमान में हाईजैक की अफवाह; यात्री ने किया था पीएम मोदी को ट्वीट

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on May 14, 2017 4:07 am

  1. No Comments.
सबरंग