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मतांतर: मर्जी का मतलब

दीपिका पादुकोण और अन्य निन्यानबे नामक वीडियो को लेकर उठे विवाद पर मृणाल पांडे (19 अप्रैल) को पढ़ना बेहद सुखद लगा। पर उनकी कुछ बातों से सहमत नहीं हुआ जा सकता। उन्होंने जिस प्रतिशत से प्रतिनिधित्व का प्रश्न जोड़ा है, वह बेमानी है।
Author May 3, 2015 16:30 pm

दीपिका पादुकोण और अन्य निन्यानबे नामक वीडियो को लेकर उठे विवाद पर मृणाल पांडे (19 अप्रैल) को पढ़ना बेहद सुखद लगा। पर उनकी कुछ बातों से सहमत नहीं हुआ जा सकता। उन्होंने जिस प्रतिशत से प्रतिनिधित्व का प्रश्न जोड़ा है, वह बेमानी है। अगर हम ‘सफरगेट’ आंदोलन को देखें, ओलिंपे दे गॉज पर गौर करें (जिन्होंने 1791 में ‘डिक्लेरेशन आॅफ राइट्स आॅफ वुमन ऐंड फीमेल सिटिजन’ लिखा), ब्रिटेन में कै रोलिन नॉर्टन को देखें तो उनकी संख्या कितनी थी आखिर! पर उनकी आवाज का मतलब हम सब जानते हैं।

भारत में भी गौरा देवी और मेधा पाटकर जैसी कई आंदोलनकारी हैं, पर वे अकेले क्या कर पार्इं, बताने की जरूरत नहीं। प्रश्न है कि वे पुरुषों से किस स्तर तक बराबरी हासिल कर पाई हैं या क्या यही उनका लक्ष्य है?

जब मृणाल पांडे महिला शरीर के सीत्कारी उत्पीड़न के संदर्भ में आपत्ति जताते हुए ‘वोग’ पत्रिका को लानत भेजती हैं, तो अजीब लगता है। जिस देश को ‘कामसूत्र’ की रचना पर गर्व हो, वह ऐसे उत्पीड़न के विरोध में ‘वोग’ की भर्त्सना कैसे कर सकता है! कामसूत्र में इसकी विशद व्याख्या है और उसे उत्पीड़न की श्रेणी में नहीं रखा गया है, बेशक संदर्भ अलग है। अभी हाल में एक उपन्यास-त्रयी आई ‘फिफ्टी शेड्स आॅफ ग्रे’, जिस पर फिल्म भी बनी। किताब की दस करोड़ प्रतियां बिकीं और बावन भाषाओं में अनुवाद हुआ, मृणाल पांडे अगर इसे पूरा पढ़ लें, तो सीत्कारी उत्पीड़न का चरम क्या हो सकता है और यह विश्व स्तर पर इतना लोकलुभावन क्यों है, शायद वे इसका उत्तर खोज पाएं।

एक और जटिल प्रश्न है इस लेख में- पुरुष की पाशविकता का। पाशविकता सिर्फ पुरुष की क्यों? पुरुष पशु और स्त्री शिकार के रूपक कब तक बने रहेंगे? क्या सचमुच स्त्री सिर्फ शिकार है? क्या अपने शरीर को लेकर स्वाधीनता का खुलेआम प्रदर्शन करती स्त्री शिकारी नहीं है? पशु-भावना और कर्म दोनों का दारोमदार सिर्फ पुरुष पर कैसे हो सकता है? वैसे ही जैसे विवाहेतर यौन संबंधों की व्यवस्था वेश्यालयों के रूप में सिर्फ पुरुषों के लिए, समाज के पूरे संज्ञान में की गई? क्या महिलाओं को तमाम नैसर्गिक जरूरतों से विलग करते हुए इच्छा की परिधि से बाहर कर दिया गया? क्या विवाह पुरुषों को संतुष्ट करने में कहीं चूक रहा था, इसीलिए बिना विवाह तोड़े एक समांतर प्रावधान कर दिया गया! जब यही उद्घोष दीपिका करती हैं तो वह गलत कैसे हो गया?

आज महिलाएं रात पाली में काम करने को तैयार हैं, जोखिम भरे व्यवसाय भी अपना रही हैं, पर उन्हें मर्जी किसी और की माननी पड़ती है, वरना अवसाद के खतरे बने रहेंगे! शायद यहां कुछ और तथ्य हैं, जिनसे मृणाल पांडे सहमत हों। अठारह से पच्चीस वर्ष के बीच आयु की ऐसी महिलाओं की संख्या काफी है, जो अवसाद की चपेट में आती हैं, उनकी खुदकुशी के बढ़ते आंकड़े भी हैं। सिर्फ कामकाजी महिलाएं नहीं, घरेलू महिलाएं भी बड़ी तादाद में इसकी चपेट में हैं।

जहां तक विवादित वीडियो के असर का सवाल है कि यह पुरुष की पाशविकता को उकसाएगा, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि आज पाशविक यौन अपराध एक उत्तेजना की तरह है। यह एक कामाक्रांत समाज की अत्यंत गंभीर मनोवैज्ञानिक समस्या है।

दरअसल, हम अर्थ के अलावा बाकी संदर्भों को क्या और कहां जगह दें, यह तय नहीं कर पा रहे हैं। सिनेमा, मीडिया, साहित्य में तो विकृत, स्वीकृत काम को हर जगह तलाश रहे हैं, पर वास्तविक जीवन में वह सुख और संतुष्टि देने के मामले में छलता जा रहा है और हम अकुला कर उसे सिर्फ देह से जोड़ दे रहे हैं, चाहे वह स्त्री देह हो या पुरुष। क्या पचास की अवस्था पार कर चुके सलमान, शाहरुख और आमिर अपनी काया-माया में आकंठ डूबे कमीज उतारते और सिक्स पैक ऐब बनाते निरीह से नहीं लगते? क्या वे शिकार नहीं लगते किसी को?

विद्वान अल्फर्ड डे बोनो ने ‘लेटरल टाकिंग’ की बात करते हुए मानवीय सोच को धारदार बनाने के लिए उत्तेजना को एक औजार के रूप में देखा था। वही औजार है इस वीडियो में। नहीं तो दीपिका और अन्य निन्यानबे को अपने काम या अर्थ स्वातंत्र्य का उद्घोष करने की शायद यों भी जरूरत नहीं है, वैसे ही जैसे अपने अवसाद का खुलासा करने की। यह खुलासा हिम्मत की बात है। सेलिब्रिटी ही क्यों, हम सभी ‘सब कुछ चलता है’ ग्रंथि के साथ नकली जिंदगी जीने को अभिशप्त हैं।

जब सब गड़बड़ चल रहा हो, संवाद गायब हों, फुरसत खत्म हो गई हो और लबादा एक प्रतिमान बन चुका हो, अपवाद दुत्कार और भर्त्सना के पात्र हों, तब एक ही सांचे और लीक पर चल रहा यह इकहरा समाज समझ ही नहीं पा रहा कि वह देह, मन और आत्मा का सामंजस्य कहां बिठाए? स्त्री चेतना, पुरुष चेतना, लैंगिक चेतना, मानवीय समझ, वैश्विक चेतना और देसी चेतना में सामंजस्य कहां स्थापित करे, यह एक बड़ी समस्या बनती जा रही है।

यहां शिवानी का जिक्र प्रासंगिक है। सत्तर से लेकर नब्बे के दशक तक वे हिंदी बहुल क्षेत्रों की लोकप्रिय उपन्यासकार थीं। तब लोगों के पास फुरसत थी, स्मृति आज की तरह क्षीण नहीं थी और साहित्य का असर जीवन पर दिखता था, क्योंकि उस दौर में वैकल्पिक माध्यम इतने प्रभावशाली नहीं थे।

तब शिवानी ऐसी नायिकाओं के साथ जीवन-रस घोलने उतरी थीं, जो हमेशा सांचे में ढली हुई, अति सुंदरी, कमनीय, गोरी (कृष्णकली को छोड़ कर) और पुरुषोन्मुख होती थीं। अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि पूरे हिंदी क्षेत्र में उनके लेखन ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी कैसी मानसिकता बनाई होगी? वे आखिर बाजार की किन बाध्यताओं के चलते अति सुंदर स्त्रियों की पात्र-संरचना करती चली गर्इं? क्या वे बाध्य की गई थीं या फिर यह नैसर्गिक चाह थी, सुंदरता को रचने की, जीने और उसे स्थापित करने की? जब उनसे पूछा गया कि आपकी हर नायिका सुंदर ही क्यों होती है तो उन्होंने कहा था कि मेरी चेतना में जो सुंदर है, उसे मैं कुरूप कैसे बना दूं? सही है। फिर आज सौंदर्य प्रसाधन से सुंदरता की चाह प्रश्न के घेरे में कैसे आ सकती है? आज की युग चेतना अलग है, जो केलॉग्स खाकर और फेयर ऐंड लवली लगा कर अपने को सुंदर पाती है।

मृणालजी ने कानून और उसके पुरुष रचयिताओं की बात उठाई है। इस संदर्भ में मैं अपराध दंड संहिता की खासकर दो धाराओं- 304 ए और 498 ए- की व्याख्या जानना चाहती हूं, जिनमें हत्या के प्रयास और दहेज के खिलाफ दंड का प्रावधान है। उन्हें पुरुषों ने ही बनाया, पुरुषों के खिलाफ गैर-जमानती, गैर-समझौतापरक! उनका इस्तेमाल किस वर्ग ने और कैसे किया कि एक के बाद एक तमाम समितियों ने उन पर सवाल उठाए!

आज आंकड़े चीखते नजर आते हैं कि इन दोनों धाराओं के तहत नब्बे प्रतिशत मामले फर्जी दर्ज कराए गए। फिर कानून के जरिए स्त्री-मुक्ति के रास्ते किस हद तक प्रशस्त हो पाएंगे, क्या यह सोचना जरूरी नहीं? क्या एक बार फिर से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के समुचित, सामूहिक उद्देश्य स्थापित नहीं करने होंगे? जब तक यह सब नहीं होगा, स्त्री और पुरुष यों ही बावले बने, प्राकृतिक और नैसर्गिक का अतिक्रमण करते, एक-दूसरे के पूरक नहीं, बल्कि भक्षक बने भटकते रहेंगे।

आज जिंदगी के मायने बड़े तुरत-फुरत वाले हो गए हैं। यौन अपराध भी इसी मानसिकता के परिचायक हैं।

 

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