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पुस्तकायन: आलोचना का रचनात्मक पाठ

नंदकिशोर नवल की पुस्तक हिंदी कविता: अभी, बिल्कुल अभी समकालीन हिंदी कविता-आलोचना का नया रचनात्मक पाठ है। रचना के साथ ‘सहयात्री’ बनने का भाव यहां दृष्टिगोचर होता है। यहां उन रचनाकारों (विनोदकुमार शुक्ल, विष्णु खरे, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, आलोक धन्वा, श्याम कश्यप, ज्ञानेंद्र पति, उदय प्रकाश और अरुण कमल) पर विचार किया गया है, […]
Author April 12, 2015 16:37 pm

नंदकिशोर नवल की पुस्तक हिंदी कविता: अभी, बिल्कुल अभी समकालीन हिंदी कविता-आलोचना का नया रचनात्मक पाठ है। रचना के साथ ‘सहयात्री’ बनने का भाव यहां दृष्टिगोचर होता है। यहां उन रचनाकारों (विनोदकुमार शुक्ल, विष्णु खरे, राजेश जोशी, मंगलेश डबराल, आलोक धन्वा, श्याम कश्यप, ज्ञानेंद्र पति, उदय प्रकाश और अरुण कमल) पर विचार किया गया है, जिनके साथ वे उठे-बैठे, झगड़े हैं, उनके प्रिय हैं, समकालीन हैं। ऐसी स्थिति में पूर्वग्रह रहित होकर रचना का मूल्यांकन लगभग कठिन हो जाता है।

सहृदयता नवलजी का खास आलोचकीय गुण है और यही कारण है कि वे सहृदय पाठक के सोच और संवेदना से आत्मीय रिश्ता कायम कर लेते हैं। इस प्रक्रिया में कविता की अनावश्यक चीर-फाड़ न करते हुए उसकी गहरी और आत्मीय समझ विकसित कर देते हैं। आलोचना पढ़ते हुए इस तरह कब और कैसे कविता हमारी संवेदना का अनिवार्य हिस्सा बन जाती है, पता ही नहीं चलता। शायद इसी अर्थ में आलोचना भी एक रचना है, सर्जनात्मक संवाद है।

विनोदकुमार शुक्ल पर विचार करते हुए नवलजी उनकी रचना के भीतर निहित स्वाभाविक प्रगतिशीलता को रेखांकित करते हैं। ऐसा पहली बार संभव हुआ है कि कल्पना, सौंदर्य और प्रगतिशीलता के अंतर्संबंध को, पाठ की जटिल और अंतर्विरोधी सच्चाइयों के मध्य उपस्थित करते हुए, सहजता से पकड़ने के आलोचकीय विमर्श में चरितार्थ किया गया हो। विनोदकुमार शुक्ल के वस्तु-पर्यवेक्षण की बारीकियों को नवलजी लगभग चौंका देने वाली ‘बतकही शैली’ में उपस्थित कर देते हैं।

प्रेम, प्रकृति और करुणा के साथ आम आदमी के स्वाभाविक संघर्ष को जिस नए काव्य शिल्प में कवि रूपांतरित करता है, उसके ‘क्लाइमेक्स’ और ‘एंटीक्लाइमेक्स’ पर नजर रखना पाठकीय दृष्टि से बहुत जरूरी है। नवलजी बड़ी सरलता से इसे ग्राह्य बना देते हैं। ‘मुक्तिबोध’ नवलजी के सबसे प्रिय कवि हैं। विनोद शुक्ल की लंबी कविताओं को पढ़ते हुए, उसके बिंबों की बारीक ध्वन्यात्मकता से गुजरते हुए, फैंटेसी की नई रचनात्मक अर्थवत्ता टटोलते हुए नवलजी को कवि के ‘पड़ोस’ में ‘मुक्तिबोध’ खड़े दिखाई पड़ते हैं। हालांकि वे कहते हैं कि ‘विनोदजी ने उनका अनुकरण नहीं, अनुसरण किया है’। इसे कहते हैं उदात्त शैली की सर्जनात्मक आलोचना।

‘कहानी में कविता लिखना विष्णु खरे की सबसे बड़ी शक्ति है’- रघुवीर सहाय का यह कथन नवलजी को विष्णु खरे की कविताओं के गंभीर आलोचकीय पाठ की तरफ प्रेरित करता है। क्योंकि इस अर्थ में खरेजी कविता के प्रचलित शिल्प को तोड़ कर अपने लिए एक नया शिल्प अविष्कृत करते हैं। मुझे लगता है कि कविता में गद्य का सार्थक इस्तेमाल रघुवीर सहाय के बाद सबसे अधिक विष्णु खरे ने किया है। घटना का आख्यान और उसके बीच कविता की चमक, जो सामाजिक विसंगति, विडंबना और तनाव को काव्य-विधान की संरचनात्मक प्रक्रिया में अनुस्यूत करती है- इस काव्य शिल्प के साथ विष्णु खरे की कविताओं से गुजरते हुए ही हम उसका आस्वादन कर सकते हैं। नवलजी ने आस्वादन की इस पूरी प्रक्रिया को विस्तार से देखने की कोशिश की है।

व्यवस्थित आलोचना का आधार बने सभी कवियों में नवलजी के अनुसार राजेश जोशी सबसे अधिक लोकप्रिय हैं। क्योंकि ‘उनके पास कुछ ऐसी कविताएं हैं, जो प्राय: काव्य गुणों से पूर्ण होते हुए भी सहज संप्रेषणीय हैं।’ अगर राजेश जोशी इस विलक्षण काव्य-कौशल में सफल हैं, तो क्या वे समकालीन हिंदी कविता के ‘मानक कवि’ सिद्ध हो सकते हैं, जो आलोचक और सामान्य पाठक दोनों को एक साथ प्रभावित करता हो? क्या मुख्य धारा की कविता में ‘लोकप्रिय कविता’ जैसा कोई सार्थक मुहावरा विकसित किया जा सकता है? इन प्रश्नों पर नवलजी की टिप्पणी के संदर्भ में अलग से विचार करने की आवश्यकता है।

नवलजी राजेश जोशी की अनेक कविताओं को आलोचक के लिए भी चुनौती मानते हैं। उनके हवाले से इस निष्कर्ष को रेखांकित किया जाना चाहिए। क्या जादुई यथार्थ का इतना अद्भुत इस्तेमाल किसी अन्य समकालीन कवि ने नहीं किया? क्योंकि नई पीढ़ी के कवियों के लिए इस अर्थ में वे प्रेरक कवि सिद्ध हो सकते हैं। पूरी टिप्पणी इस बात की ओर संकेत करती है कि कवि के भीतर जीवन के प्रति गहरी आस्था है, इसलिए ये ‘पॉजिटिव एप्रोच’ की कविताएं हैं। स्वप्न और यथार्थ में विलक्षण सामंजस्य कवि की विशेषता है। शायद यही कारण है कि अपने पूरे काव्यात्मक सौंदर्य में उनकी कविता अन्याय और शोषण के विरुद्ध एक साहसिक वक्तव्य बन जाती है।

मंगलेश डबराल पर चर्चा करते हुए नवलजी उतने सहज नहीं हैं जितना राजेश जोशी के साथ ‘आलोचनात्मक ट्रीटमेंट’ में। सभी कवियों ने मानवीय यथार्थ को काव्यात्मक यथार्थ में बदलने की सार्थक कोशिश की है। मंगलेश इस काव्यात्मक यथार्थ को जिस तरह चरितार्थ करते हैं उस शिल्प की विशेषता ही यही है कि ‘उन्होंने कविता के लिए अपनी शैली ईजाद की है, जिसमें सधाव ही नहीं, एक बौद्धिक स्पर्श भी है’, लेकिन ‘उनकी कविता दुर्बोध नहीं है।’ नवलजी के विश्लेषण से एक बात तो साफ है कि मंगलेश की कविता पुनर्पाठ की मांग करती है। वहां चीख है, रुदन है, भूख, दुख, यथास्थिति के टूटने की सार्थक संभावना है। अनुभवों की सच्चाई का मार्मिक पाठ है। अपने समय के संघर्ष का एक चमकदार आलोड़न है, ऐंद्रिक अनुभव की गूंजें और अंतर्ध्वनियां हैं। कुल मिला कर एक उत्कृष्ट काव्य-कला का मार्मिक रूपांतरण है।

नक्सलबाड़ी आंदोलन की उपज ‘आलोक धन्वा की काव्य-संवेदना इतनी गतिशील है कि वे जल्दी ही ‘नक्सलवाद’ से हट कर अपनी कविता की ‘नाजुक दुनिया’ में लौट आए।’ क्या यहां ‘नाजुक दुनिया’ का तात्पर्य प्रगतिशील संवेदना से विरत होकर विशुद्ध रूमानी कविता की तरफ लौटना है, जहां नर्म, कातर और लिजलिजे बिंब पाठकीय सौंदर्यबोध को सहज ही चमत्कृत कर देते हों? राजेश जोशी की ही तरह संप्रेषणीयता आलोक धन्वा का बड़ा गुण है। नवलजी उनकी बाद की कविताओं में (जिसे वे ‘नाजुक दुनिया’ कहते हैं) मानवीय संवेदना के उत्कर्ष का दर्शन करते हैं और वह है भी, लेकिन संग्रह प्रकाशित कराने के दबाव में दुर्भाग्य से ऐसी कविताएं कम हैं।

ज्ञानेंद्र पति, उदय प्रकाश और अरुण कमल पर विचार करते हुए नवलजी का आलोचक, सभी की अलग-अलग विशेषताएं उद्घाटित करते हुए उन्हें अपने समकालीनों में अलग पहचान देने की पाठकीय समझ भी विकसित करता है। ज्ञानेंद्र पति अपनी काव्य-भाषा में तत्सम और तद्भव का रचनात्मक साहचर्य विकसित करते हैं। सही है। लेकिन तत्सम वाली संस्कृतनिष्ठ दुरूहता आस्वाद में खलल डालती है, इसे भी स्वीकार करना पड़ेगा। नवलजी कमियों को भी सकारात्मक काव्यात्मक उत्कर्ष में रूपांतरित कर देते हैं। यह उनकी ‘सहृदयता’ का ही प्रमाण है। बहुत चुपके से कमियों की तरफ इशारा करते हैं कि आत्मीयता का सर्जनात्मक पाठ बाधित न हो।

काव्यात्मक विडंबना और तनाव उदय प्रकाश की काव्य-भाषा को एक चमक प्रदान करता है। नवलजी ‘उस गुस्से और प्रतिरोध को रेखांकित करते हैं, जिसमें कहीं क्रांतिकारी संकल्प है, तो कहीं वक्र उक्तियों का सहारा लेते हुए धारदार व्यंग्य।’ लेकिन अपनी पीढ़ी के कवियों में सबसे अधिक काव्य-चातुर्य का सहारा भी उदय प्रकाश ही लेते हैं। अरुण कमल की लोक-संवेदना और लोक प्रतिबद्धता उन्हें अपने समकालीन कवियों से अलग करती है। नवलजी ने इस संदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण रचनात्मक तथ्य की ओर इंगित किया है- ‘अरुणजी प्राय: अपने उपमानजनित बिंबों के निर्माण में लोक-भाषा का प्रयोग उदारतापूर्वक करते हैं। यह बात उनकी कविता को क्षति पहुंचाती है।’ नए कवियों के लिए यह बड़ी सीख है। नवलजी की पड़ताल का निष्कर्ष निकालें तो कह सकते हैं कि अरुण कमल जीवन-राग और गहरी लोक संशक्ति के कवि हैं।

यह कृति न सिर्फ समकालीन हिंदी कविता के प्रमुख कवियों का सजग और सतर्क मूल्यांकन प्रस्तुत करती है, बल्कि उन अंतर्विरोधों की ओर भी इशारा करती है, जहां पंथ निरपेक्षता या गुट निरपेक्षता को प्रगतिविरोधी मान लिया गया है।

महेश आलोक
हिंदी कविता: अभी, बिल्कुल अभी: नंदकिशोर नवल; राजकमल प्रकाशन, 1 बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 500 रुपए।

 

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