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सिनेमा : परदे पर कथा का पुनर्पाठ

प्रेमचंद अपनी कहानी में दिखाते हैं कि लकड़ी बीच से फट गई। कुल्हाड़ी छूट कर गिर पड़ी और दुखी चक्कर खाकर गिर गया। सत्यजित राय इसे दूसरे तरीके से दिखाते हैं।
Author नई दिल्ली | February 14, 2016 02:21 am
प्रतीकात्मक चित्र

राजकुमार

कैमरे की आंख से कहानियों-उपन्यासों को पढ़ना या देखना बिल्कुल जुदा और नया अनुभव होता है। रूढ़ तरीके से साहित्य पढ़ने का अभ्यास अर्थों को सीमित करता है। उन छिद्रों को बंद किए रखता है, जिनसे नए अर्थ निकलने की संभावना होती है। पर जैसे ही एक निर्देशक कैमरे में आंखें धंसाता है, कथा की संरचना, पात्र, घटनाएं और परिवेश टूट-टूट कर दृश्यों में बदलने लगते हैं। दृश्यों की यह शृंखला अपनी स्वायत्तता बरकरार रखते हुए नए अर्थ देती और अगले दृश्य से अर्थों को जोड़ती चलती है।

मसलन, प्रेमचंद की कहानी ‘सद्गति’ पर सत्यजित राय की फिल्म का वह दृश्य, जब दुखी लकड़ी की गांठ को फाड़ने के लिए उसके गठीले तने को देखता है। कैमरे का फ्रेम छोटा होकर दुखी के चेहरे पर ठहर जाता है। वह घूम-घूम कर लकड़ी की गांठ को देखता है। हाथों से हिलाने-डुलाने की कोशिश करता है। फिर हल्के हाथों से कुल्हाड़ी को गांठ पर धीरे से खट-खट ठोंकता है। गांठ की कठोरता का अंदाजा लगते ही कुल्हाड़ी से जोर का प्रहार करता है और कुल्हाड़ी ऐसे छिटकती है जैसे चिकने पत्थर की गेंद पर पटकी गई हो। दूसरे प्रहार के साथ भी वही मंजर उभरता है। यह दृश्य अपने आप में संपूर्ण है। अर्थ संप्रेषण में भी। दुखी का दुबला, कमजोर शरीर, लकड़ी की मोटाई और कठोरता एक पूरा आख्यान रच जाती है। संवाद रहित ‘खट-खट’ की ध्वनियां जब दृश्य को घेरे में लेती हैं, तो अर्थ अपने आप सघन और संप्रेषित हो जाते हैं।

इस दृश्य के आगे बढ़ने के साथ ही अर्थों का एक नया पुंज तब सामने आता है जब पंडित उससे कहता है- लकड़ी ज्यों की त्यों पड़ी है। लगता है हाथ में दम नहीं। उसके बाद दुखी के आक्रोश का आवेग कुल्हाड़ी में समा जाता है और हजारों वर्षों की वर्चस्ववादी ब्राह्मणवादी गांठों में दरारें पड़ने लगती हैं। हर चोट शोषण, उत्पीड़न के खिलाफ ध्वनियों में उठती है।

प्रेमचंद अपनी कहानी में दिखाते हैं कि लकड़ी बीच से फट गई। कुल्हाड़ी छूट कर गिर पड़ी और दुखी चक्कर खाकर गिर गया। सत्यजित राय इसे दूसरे तरीके से दिखाते हैं। सूर्य की तेज रोशनी में कुल्हाड़ी चमक रही है। कुल्हाड़ी की गति सूर्य की रोशनी को काट रही है और वह चमक फैल रही है। दुखी का चेहरा उसके लपेटे में है। कुल्हाड़ी लकड़ी की गांठ में धंस कर खड़ी है और क्षिप्र गति से दुखी का शरीर ‘रोल’ करते हुए गिरता है। ‘सद्गति’ का यह पुनर्पाठ है। ऐसे अर्थों को खोलते हुए जो कथा-संरचना में दबे पड़े थे। यथार्थ का एक पुनर्पाठ यहां खुलता है। कहानी के यथार्थ से फिल्म का यथार्थ अर्थ की ज्यादा चमकदार परतें समेटे हुए है। प्रेमचंद के यहां ‘कुल्हाड़ी के छूट कर गिरने’ और सत्यजित राय के यहां ‘कुल्हाड़ी के धंसे रहने में’ अलग-अलग अर्थ व्यंजित हो रहे हैं। एक तरफ सनातनी ब्राह्मणवादी उत्पीड़न और अत्याचार के खिलाफ पराजित हो जाना है, तो दूसरी तरफ उस व्यवस्था के खिलाफ भारी प्रहार के धंसे रहने का प्रतीकात्मक अर्थ। यह अर्थ की विराटता है।

यानी सही अर्थों में कोई उपन्यास या कहानी जब सेल्युलाइड पर उतारी जाती है तो वह कथा का फिल्मांकन होते हुए भी स्वायत होती है। समांतर रचना। हर दृश्य कहानी या उपन्यास का पुनर्पाठ होता है। एक तरह से आप कह सकते हैं कि प्रेमचंद की ‘सद्गति’ अलग है और सत्यजित राय की अलग।

प्रेमचंद की दूसरी कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ पर सत्यजित राय की फिल्म के संदर्भ में भी फिल्म और कहानी में जमीन-आसमान का अंतर है। प्रेमचंद ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में वाजिद अली शाह को महज एक पंक्ति में निपटा कर कथा से बाहर कर देते हैं- ‘वाजिद अली शाह का समय था’। यह ‘था’ प्रेमचंद को कहानी को किसी और दिशा में मोड़ने के लिए अवसर देता है और वे उसका पूरा फायदा उठाते हुए कहानी को कहीं और ले जाते हैं। प्रेमचंद इतिहास से बाहर गल्प की दुनिया में चले आते हैं। सत्यजित राय, प्रेमचंद के परिवेशीय दृश्य के तिनके को धीरे से पकड़ कर इतिहास में दाखिल हो जाते हैं। और अवध के बिना लड़े घुटने टेकने की दास्तान को इतने सलीके से रखते जाते हैं कि हम इतिहास के पुनर्पाठ/ अंतर्पाठ में कब दाखिल होते हैं, पता ही नहीं चलता। जिस वाजिद अली शाह को प्रेमचंद भूत की तरह इस्तेमाल करते हैं, सत्यजित राय वर्तमान की तरह। इंदिरा गांधी के आपातकालीन दौर के नजरिए से मिलान करें तो ‘शतरंज के खिलाड़ी’ का एक और पाठ बनता नजर आता है।

फिल्मी पाठ के अनुभव साहित्यिक पाठ के अनुभव पर भारी पड़ते हैं। अक्सर हम अनुभव करते हैं कि रेणु की ‘तीसरी कसम’, गुलेरी की ‘उसने कहा था’, शरतचंद का ‘देवदास’, मिर्जा हादी रुस्वा का ‘उमराव जान अदा’, विजयदान देथा की ‘दुविधा’ या महाश्वेता देवी की ‘हजार चौरासी की मां’ पर बनी फिल्मों के पाठ हमारे पढ़ने की परंपरागत अवधारणा से बिल्कुल अलग होते हैं। पात्र, घटनाएं, संवाद, अभिनय, परिवेश और नाटकीय योजनाओं के अनुभव जितना जिंदा और रोमांचकारी कैमरे की आंख से पढ़ने-देखने में अनुभूत होते हैं उतना एकांत में पढ़ कर नहीं। एकांत तो हम दोनों माध्यमों में अनुभव करते हैं, लेकिन फिल्मों से पैदा हुए एकांत के अनुभव अलग होते हैं। ये हमें जनसमूहों में बदलते हुए ऐकांतिक स्पेश देते हैं।

शैवाल की कहानी ‘दामुल’ संक्षेप में इतनी है कि माधो पांडे के हिसाब से बुरे वक्त में उसने संजीवना के परिवार की मदद की थी। उसके एवज में कर्ज चुकाने के लिए वह जानवर चुरा कर माधो पांडे को दे। मुखिया माधो पांडे जानवर चोरी के धंधे में लिप्त है। जानवर को छोड़ने के एवज में वह पैसे वसूलता है। ऐसा करने के लिए संजीवना को मजबूर कर उसे अपराधी बना देता है। दूसरे भाग में कहानी यह है कि वह संजीवना को कहता है कि महत्माइन की हत्या कर दे, क्योंकि पति की मृत्यु के बाद वह शहर से गांव आ गई है और अपने जमीन-जायदाद को बेच या किसी को दे सकती है। ऐसा न करने पर माधो पांडे के लोग महत्माइन को मार कर संजीवना को फंसा देते हैं। लेकिन प्रकाश झा इस कथा को बहुत बड़े कैनवास पर फैलाते हैं। जिस तरीके से इसे फिल्माया गया है, वह प्रकाश झा की समांतर रचना है।

इसकी पटकथा बिहार की उच्च जातियों की वर्चस्ववादी जातिगत संरचना, उस वर्चस्ववादी जातिगत ढांचे को बचाए रखने और अपने स्वार्थ में इस्तेमाल करने के लिए जातियों की गोलबंदी, उसके षड्यंत्र, चुनावी राजनीति में तब्दील हो जाती है। राजपूतों का वर्चस्व न बनाए रख पाने की स्थिति में दलितों को एकजुट कर माधो पांडे के खिलाफ लड़ाना, दलित बस्तियों में आग लगाना और फिर दोनों उच्च जातियों का मिल कर सरकारी योजनाओं और लूट की संपति तथा कब्जा की गई जमीनें बांट लेना कथा के मुख्य बिंदु बनते हैं। संजीवना की पत्नी का इस अन्याय के खिलाफ निर्णयात्मक लड़ाई लड़ने के लिए उठना और माधो पांडे पर हमला- फिल्म को कहानी से बहुत आगे ले जाते हैं। रजुली का हथियार उठाना स्त्रियों और दलितों के उठ खड़े होने में ध्वनित होने लगता है। यह फिल्म बिहार की राजनीति के बदलने की आहट की निशानदेही परदे पर छोड़ जाती है।

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