May 26, 2017

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साहित्यः युवा लेखन की चुनौतियां

साहित्य संवेदना की गहराई में उतर कर कला की अन्यतम निर्मिति होने के कारण ही हमें आनंदित करने के साथ-साथ सुचिंतित जीवन दृष्टि देता है। पर हमारे समकालीन युवा लेखक अनुभूति और अभिव्यक्ति दोनों स्तरों पर चुकते नजर आ रहे हैं।

Author October 16, 2016 01:12 am

चेस्वाव मिवोष का कथन है: ‘किसी कमरे में जहां सभी लोग सर्व सम्मति से चुप रहने का षड्यंत्र किए बैठे हों, सत्य का एक शब्द पिस्तौल दगने जैसी आवाज करता है।’ इस सत्य का ‘एक शब्द’ साहित्य ही है। साहित्य हर उस चुप्पी को तोड़ता है, जो रचनात्मकता के विरोध में खड़ी होती है। लेकिन जब हमारा ध्यान समकालीन युवा लेखन पर जाता है, तो लगता है कि कहीं हम सर्व सम्मति से चुप रहने के षड्यंत्र में तो शामिल नहीं हो गए हैं। यह देखना दिलचस्प है कि समकालीन युवा लेखकों के पास सुसंगत दृष्टि का अभाव है। उनके पास इतिहास की परख तो है ही नहीं, परंपरा के प्रति रागात्मकता भी नहीं है। एक जमाने में यही वह वर्ग था, जिसकी लेखनी से क्रांति आई थी। इस वर्ग ने नई रचनाधर्मिता का प्रसार किया था।

‘तार सप्तक’ हिंदी के समकालीन युवा लेखन का पहला व्यवस्थित और ऐतिहासिक प्रयत्न था, जिसमें संकलित रचनाकारों ने अपनी महती रचनात्मक उत्कृष्टता दिखाई थी। यह वह समय था जब युवा रचनाकारों ने समय और समाज को गहराई से महसूस किया था और जीवन यथार्थ का बारीक पर्यवेक्षण किया था। इसी सुचिंतित समझ का परिणाम था कि साहित्य के प्राचीन बोध और उसकी कुंठित रचना-प्रक्रिया से बाहर हो गए। नए समय में भाषा से लेकर जीवन की लगातार बदलती स्थितियों तक से रचनाकारों ने तादात्म्य बिठाया और सही मायनों में प्रयोग की परंपरा का प्रारंभ हुआ। यह नवीनता केवल प्रवृत्ति तक सीमित नहीं थी, बल्कि जीवन की जटिलता, उसके तनाव, समय की निरंतरता और व्यापक सामाजिक बदलावों का प्रतिनिधित्व करती थी। पर समकालीन युवा लेखन क्यों इन अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता?

समकालीन युवा लेखकों के सामने सबसे बड़ी समस्या है दृष्टिहीनता की। उनके पास कोई सुसंगत दृष्टि या सोच नहीं है। एक तरफ वे कथित प्रगतिशीलता को दलीय प्रतिबद्धता मान कर जी रहे हैं, दूसरी और एक ऐसा वर्ग भी है, जिसके आगे किसी भी वैचारिकता का दबाव नहीं है। इस स्तर पर वह अप्रतिबद्ध ही नहीं, गैरजरूरी रचनाशीलता का शिकार हो गया है। इतिहास से सर्वथा अपरिचय उसकी दूसरी बड़ी समस्या है। कहना न होगा कि रचना इतिहास से व्यापक नहीं बनती, पर सार्थक जरूर बनती है। ‘वाद विवाद संवाद’ में नामवर सिंह ने लिखा है- ‘अपने इतिहास से बाहर रहने के कारण कुछ युवा लेखकों में इतिहास से एकदम बाहर जाने की आकांक्षा दिखाई देती है। संपूर्ण परंपरा को नकार देने के मूल में यही आकांक्षा है। उधर भविष्य का दरवाजा पहले से बंद है। इसलिए इतिहास के बाहर जाने की चेष्टा अदबदा कर उन्हें ‘आदिमपन’ में ला छोड़ती है। जब इतिहास एक व्यर्थ का भार है और सभ्यता एक अभिशाप, तो आदिम अवस्था ही काम्य बची रहती है। इस आदिम मनोदशा में सारा संसार जंगल दिखाई देता है। और सारे आदमी पशु। कवि का मन ‘चिड़िया का व्याकरण’ सीखने को बेचैन हो उठता है। इसी मनोदशा का एक अर्थ है- जड़ों की खोज।’
ईट्स ने कहा था- ‘सपनों में ही हमारी जिम्मेवारियां शुरू होती हैं।’ लेकिन यहां तो रचना में भी जिम्मेवारी का अहसास नहीं होता। सातवें दशक में हिंदी का जो युवा लेखन उभरा था, वह मनुष्य की स्वतंत्रता और उसकी जटिल जीवन स्थितियों को स्वर देने की कोशिश थी। आठवें दशक में भी दृश्य में आए युवा लेखकों ने इस चुनौती को स्वीकार किया था। नौवें दशक में उभरे लेखकों ने भी इस आग को जीवित रखा था। मगर दुर्भाग्य से उसके बाद वह स्वर न केवल गायब हो गया, बल्कि रचना में संवेदनाहीन अनुभूतियों की भरमार हो गई।
अध्ययन और साधना का अभाव समकालीन युवा लेखन की तीसरी बड़ी कठिनाई है। यह लगातार कहा जाता रहा है कि आज का लेखक अध्ययन की दृष्टि से न्यून है। परिश्रम से तो उसे परहेज ही है। फिर इस जटिल जीवन स्थितियों को वह कैसे रूपायित कर पाएगा। संचार माध्यमों की मार अलग से है, प्रकाशन माध्यमों के जरिए आए दिन पाठकों को जो मसाले दिए जाते रहे हैं; उनसे भी रचनाकारों के लिए चुनौती खड़ी हुई है। तात्पर्य यह कि आज का रचनाकार सृष्टि के सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है, जिसके लिए लगातार बेहतर देने की कोशिश की जरूरत है। नहीं तो साहित्य से समाज के जुड़े रहने में भी कठिनाई खड़ी हो सकती है।
साहित्य संवेदना की गहराई में उतर कर कला की अन्यतम निर्मिति होने के कारण ही हमें आनंदित करने के साथ-साथ सुचिंतित जीवन दृष्टि देता है। पर हमारे समकालीन युवा लेखक अनुभूति और अभिव्यक्ति दोनों स्तरों पर चुकते नजर आ रहे हैं। उनमें बची रह गई है तो सिर्फ खुशफहमी, जो कविता के क्षेत्र में अधिक घातक बन कर सामने आ रही है।
साहित्य न तो राजनीति का विकल्प होता है न समाजशास्त्र का। उसका अपना एक सार्वभौम लक्ष्य और अपनी न्याय प्रणाली होती है। पर समकालीन युवा लेखक क्या यह समझने की चेष्टा कर रहा है? वह तो यह मान कर चलता है कि उसका साहित्य पल-प्रतिपल या तो विकल्प है, नहीं तो उच्छवासजन्य प्रलाप है। यही कारण है कि आज के युवा लेखन में तात्कालिकता का इतना दबाव है कि कल उसके लिए पहचान का खतरा पैदा हो सकता है। यह देख कर आश्चर्य होता है कि सारी विकृतियों को युवा लेखक अपनी खासियत समझने का भ्रम पालने लगता है।
परंपरा और लोक जीवन से विमुख होकर सृजनात्मकता को किनारे कर आज का युवा लेखक इस कदर उदासीन हो गया है कि वह सिर्फ ‘लिखने के लिए लिखने’ को अपना मूल मान चुका है। ऐसे में अगर जीवन-सत्य का हमें आभास तक नहीं होता, तो इसमें कोई गलती नहीं है। समकालीन युवा लेखन की वर्तमान चुनौतियां प्राथमिक तौर पर यही हैं। इन्हें दूर किए बगैर किसी सार्थक उम्मीद की संभावना नहीं बनेगी। साहित्य अपनी निर्मिति में मनुष्य के हर संभव कार्य और उसकी दिशा का नियामक होता है। यह उसके प्रकृतिगत विस्तार से संपन्न होता है। कहना न होगा कि इसी प्रकृतिगत विस्तार के कारण साहित्य सार्वदेशिक से सार्वकालिक हो जाता है।

रचना प्रक्रिया और अनुभूति से अलग आज के युग में युवा लेखक के सामने और भी बहुत सारी चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। सांप्रदायिकता, अजनबीयत, मानवीय संबंधों की कृत्रिमता, अपसंस्कृति का दबाव, भयावह बेकारी, पारिवारिक विघटन जैसी अनेक समस्याओं ने युवा लेखन को घेर रखा है। इन्हें रूपायित करने और सही मायने में मनुष्यता को प्रतिष्ठित करने के लिए रचनाकार को समर्पित भाव से काम करने की जरूरत है। इसके लिए भाषा और शिल्प में प्रयोग की तो आवश्यकता है ही, नए जीवन संदर्भों की जटिलता को वैज्ञानिक दृष्टि से समझने और देखने की भी आवश्यकता है। रचना करने की बेचैनी से ज्यादा बेचैनी रचना की रक्षा की होनी चाहिए। बेहतर जीवन-मूल्यों की स्थापना से मानव समाज में बेहतरी तो आएगी ही, बेहतर मनुष्य बनाने में भी मदद मिलेगी। युवा लेखन का यह दौर तब रेखांकित हो सकेगा, जब अपने समसामयिक सवालों से दो चार होने की कोशिश के साथ परंपरा और आधुनिकता की संगति बैठेगी। युवा लेखक पर हर युग में बड़ी जिम्मेवारी आती है। यह जिम्मेवारी तब और बढ़ जाती है जब परंपरा से चली आ रही प्रवृत्तियां अपनी अर्थवत्ता खो बैठती हैं। आज का समय ऐसा ही है। कथा और कविता सहित साहित्य का पूरा परिदृश्य आज जिस धुंधलके में फंसा पड़ा है, उसमें समकालीन युवा लेखक को एक ऐतिहासिक भूमिका निभानी है। क्या यह संभव है? क्या ऐसा हो पाएगा?

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First Published on October 16, 2016 1:12 am

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