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पुस्तकायन: रूढ़ छवियों को तोड़ते हुए

माधव हाड़ा की पुस्तक पचरंग चोला पहर सखी री मीरां के जीवन और उनके समकालीन समाज के विषय में अब तक अनुत्तरित प्रश्नों के, नए उपलब्ध तथ्यों के आलोक में, जवाब ढूंढ़ने की कोशिश करती और कुछ नए सवाल खड़े करती है। इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी गहन ऐतिहासिक गवेषणात्मक प्रविधि है। इसमें […]
Author April 12, 2015 16:35 pm

माधव हाड़ा की पुस्तक पचरंग चोला पहर सखी री मीरां के जीवन और उनके समकालीन समाज के विषय में अब तक अनुत्तरित प्रश्नों के, नए उपलब्ध तथ्यों के आलोक में, जवाब ढूंढ़ने की कोशिश करती और कुछ नए सवाल खड़े करती है। इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी गहन ऐतिहासिक गवेषणात्मक प्रविधि है। इसमें प्रयुक्त स्रोतों और संदर्भों की विविधता और बहुलता आश्चर्यचकित करने वाली है।

पुस्तक का पहला वाक्य है: ‘मीरां का ज्ञात और प्रचारित जीवन गढ़ा हुआ है।’ इन गढ़ी गई छवियों में मुख्य हैं- गीता प्रेस और अमर चित्रकथा की आदर्श हिंदू पत्नी, टॉड की प्रेम-दीवानी संत-भक्त की आध्यात्मिक रहस्यात्मक छवि और वामपंथियों तथा स्त्रीवादियों द्वारा गढ़ी असाधारण विद्रोही स्त्री। मीरां के संबंध में हालत यह है कि केवल दृष्टिकोण नहीं, तथ्य भी गढ़ लिए गए हैं। लेखक का प्रयास इन गढ़ी गई अनेक ‘मीरांओं’ में से मीरां की प्रामाणिक छवि तलाश करना है।

पुस्तक छह अध्यायों में विभक्त है, जो क्रमश: मीरां के जीवन, समाज, धर्माख्यान, कविता, कैननाइजेशन और छवि निर्माण पर केंद्रित हैं। पहले अध्याय में माधव हाड़ा मीरां की रूढ़, पारंपरिक और गढ़ी गई छवियों को सप्रमाण तोड़ते हैं। मीरां के जन्म-समय, जन्म-स्थान, विवाह, मृत्यु आदि के बारे में वे मान्य इतिहासकारों के अद्यतन शोध-निष्कर्षों का सहारा लेते हैं। इस अध्याय में वे मीरां की कृष्ण-भक्ति को उसके पितृकुल की परंपरा से जोड़ कर देखते हैं: ‘यह धारणा गलत है कि विवाह से पूर्व मीरां भावुकतापूर्ण ईश्वर-भक्ति में लीन युवती थी।’ वे यह भी कहते हैं कि मीरां का वैवाहिक जीवन सामान्य था, हालांकि उसकी अवधि छोटी थी। पर सवाल है कि लेखक द्वारा अंकित मीरां की यह छवि कहीं उसे आदर्श हिंदू पतिव्रता सिद्ध करने वाले आग्रहों से प्रभावित तो नहीं है?

दूसरे अध्याय में लेखक का मानना है कि मीरां के समय का मध्यकालीन समाज जड़ नहीं था, उसमें गतिशीलता के पर्याप्त चिह्न मिलते हैं। पर प्रश्न है कि क्या इस गतिशील समाज में भी पितृसत्तात्मक सामंती व्यवस्था की जकड़न स्त्रियों के लिए कम हो गई थी, और वह भी सामंती कुल की मर्यादा को चुनौती देने वाली विधवा स्त्री के लिए? क्या मीरां के भक्तिमूलक विद्रोह को मेवाड़ के तत्कालीन सामंती समाज में भी वैसी ही स्वीकार्यता मिल पाई, जैसी लोक में मिली? मीरां की भक्ति और विद्रोह की स्वीकार्यता लोक में तो व्यापक रूप से हुई, इसकी ओर लेखक ने यह कह कर इशारा किया है कि मीरां के विद्रोह में लोक अपनी कामनाओं को फलित होते देखता था। पर सामंती पितृसत्ता द्वारा उसे व्यापक स्वीकार्यता मिली, यह ऐतिहासिक सत्य प्रतीत नहीं होता।

लेखक का यह निष्कर्ष और विवादास्पद है कि ‘मीरां के जीवन और कविता में जो सघन अवसाद है, वह उसके वंचित-पीड़ित होने के कारण नहीं है। यह मीरां के सुरक्षा और स्थायित्व की तलाश में भटकने और परिजनों के निधन के दुख से पैदा हुआ है।’

तीसरे अध्याय में वे पहले दो अध्यायों से अलग ‘मीरां का असाधारण विद्रोही स्त्री सामंत चरित्र और उसकी खास किस्म की लोकभक्ति’ को रेखांकित करते हैं। वे स्थापना देते हैं कि नाभादास के भक्तमाल में मीरां का निरंकुश और निडर स्त्री रूप उसके निर्मित भक्त रूप के नीचे पूरी तरह दबता नहीं है। परवर्ती भक्तमालों में यह दब गया है। और यह कि आज की मीरां की छवि ‘प्रियादास’ की बनाई हुई है। पर यही अपेक्षित सजगता लेखक सामंती परंपरा से प्राप्त स्रोतों की मूल मंशा के परीक्षण में नहीं बरतते।

चौथे अध्याय में हाड़ा मीरां की कविता के बारे में बात करते और कुछ नई और महत्त्वपूर्ण स्थापनाएं देते हैं। मीरां की दो प्रचलित छवियां उसकी रहस्यवादी संत-भक्त और रूमानी कवयित्री की पारंपरिक छवि और वंचित-उत्पीड़ित हाशिये की विद्रोही स्त्री की छवि (जो लेखक के मत में कुछ वामपंथी समालोचकों और इधर के स्त्री विमर्शकारों की देन है) का खंडन करते हुए वे मीरां के स्वर को ‘हाशिए का स्वर’ नहीं मानते। इस अध्याय में माधव हाड़ा लिखते हैं: ‘मीरां पारंपरिक अर्थ में संत-भक्त नहीं थी, उसने राजसत्ता और पितृसत्ता के विरुद्ध अपने विद्रोह को भक्ति के आवरण में व्यक्त किया, जिसके पर्याप्त साक्ष्य उसकी कविता में हैं।’

इसके विपरीत औपनिवेशिक प्राच्यवाद और वामपंथियों और स्त्रीवादियों द्वारा गढ़ी गई मीरां की छवि का खंडन करते हुए वे लिखते हैं: ‘मीरां की कविता में जो सघन अवसाद और दुख है उसका कारण पितृसत्तात्मक अन्याय और उत्पीड़न नहीं था। यह खास प्रकार की घटना-संकुल ऐतिहासिक परिस्थितियों के कारण था, जिनमें मीरां को एक के बाद एक अपने लगभग सभी परिजनों की मृत्यु देखनी पड़ी और निराश्रित होकर निरंतर एक से दूसरी जगह भटकना पड़ा।’

यहीं मीरां की कविता की विवेचना करते हुए हाड़ा एक महत्त्वपूर्ण, पर विवादास्पद स्थापना देते हैं कि ‘मीरां एक संसारी स्त्री थी और उसके जागतिक सरोकार बहुत व्यापक, मूर्त और सघन थे।… उसकी कविता में जीवन और जगत का निषेध नहीं था।… मीरां की कविता में वस्तु-जगत बहुत सघन और व्यापक रूप में मौजूद है।… उसकी कविता में इंद्रिय संवेदनाओं और कामनाओं की अकुंठ और निर्बाध अभिव्यक्ति है। यह कहीं प्रत्यक्ष है, तो कहीं परोक्ष। खास बात यह है कि इस संबंध में अन्य संत-भक्तों की तरह उसमें किसी तरह की अंतर्बाधा या अपराधबोध नहीं है। कृष्ण से संयोग की उसकी तीव्र और सघन ऐंद्रिक कामना उसकी कविता में कई तरह से आती है।’ पर ऐंद्रीयता समेत ये सभी विशेषताएं माधुर्यभावोपासक कृष्ण-भक्तों में आमतौर पर मिलती हैं।

पुस्तक के छठे अध्याय ‘छवि निर्माण’ में लेखक गीता-प्रेस, डायमंड पॉकेट बुक्स, अमर चित्रकथा, फिल्मों, भजन-संग्रहों के फ्लैप तक पर अंकित मीरां की विभिन्न छवियों की पड़ताल करते हैं। सुखद बात यह है कि पुस्तक के आरंभ से ही वामपंथियों और स्त्रीवादियों के साथ चस्पां कर मीरां के जिस विद्रोही रूप का खंडन लेखक करना चाहते हैं, पुस्तक के अंत तक पहुंचते-पहुंचते वे खुद मीरां के विद्रोही रूप के प्रतिपादक बन जाते हैं।

दरअसल, पुस्तक के ये अंतर्विरोध लेखक के अपने अंतर्विरोध न होकर उन विभिन्न स्रोतों के हैं; जिन्हें लेखक ने अपनी पुस्तक में प्रयुक्त किया है। हर तरह की विचारधारा या दृष्टिकोण से अपने को अलग करके केवल तथ्यों पर अंध-निर्भरता आसानी से इस तरह के अंतर्विरोधों तक पहुंचा देती है। जब तथ्यों की ऐसी विपुल और विविधतापूर्ण राशि एकत्रित हो तो यह खतरा और बढ़ जाता है।

यह सच है कि मीरां के काव्य में ‘स्त्रीवाद’ का प्रतिपादन नहीं है, यह एक आधुनिक अवधारणा है। पर इसी कारण मीरां के काव्य में सामंतवाद और पितृसत्ता के प्रति विद्रोह को अनदेखा करना दूसरे तरह का अतिवाद होगा। इसी प्रकार मध्यकालीन भारतीय समाज में गतिशीलता के चिह्नों को स्वीकार करते हुए भी उस समाज में उपस्थित सामंती, पितृसत्तात्मक, जातिवादी उत्पीड़न और दमन को नकारना भी ऐतिहासिक भूल होगी।

शुरू के अध्यायों में वैचारिक शिथिलता के बावजूद इस पुस्तक में ऐसा बहुत कुछ है, जो मीरां के जीवन और उसके समय के समाज को समझने के लिए एक नया प्रस्थान बन सकता है। यह पुस्तक विभिन्न दृष्टिकोणों से गढ़ी गई अनेक मीरांओं में से सबसे प्रामाणिक छवि वाली मीरां की तलाश में एक नए विमर्श की शुरुआत है।

रेणु व्यास

पचरंग चोला पहर सखी री (मीरां का जीवन और समाज): माधव हाड़ा; वाणी प्रकाशन, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 375 रुपए।

 

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