April 27, 2017

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किताबें मिलीं : प्रिय भग्गन

सबसे बड़ी बात यह है कि इन पत्रों ने साहित्यानुरागी अपने अनुज में न केवल साहित्य के प्रति उत्सुकता और ललक जगाई, बल्कि भविष्य में उसके साहित्य-लेखन का पथ भी प्रशस्त किया।

Author नई दिल्ली | March 5, 2017 03:04 am
इन पत्रों में व्यक्ति, परिवार और समाज ही नहीं, बल्कि इससे साहित्य की एक बड़ी दुनिया भी खुलती है, जिसका परिप्रेक्ष्य हिंदी साहित्य के वर्तमान के साथ पूरे विश्व के बड़े लेखकों की दुनिया है।

यह सच है कि हिंदी में साहित्यकारों के लिखे पत्रों का महत्त्व देर से समझा गया, लेकिन साहित्येतिहास की दृष्टि से उन पत्रों का बहुत महत्व है, जिसका प्रमाण है प्रेमचंद द्वारा लिखे पत्र, जिनके आधार पर अमृत राय ने उनकी जीवनी ‘कलम का सिपाही: प्रेमचंद’ लिखी। प्रस्तुत पुस्तक ‘प्रिय भग्गन’ दरअसल, हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक नंदकिशोर नवल द्वारा अपने अनुज भारत भारद्वाज को संबोधित है। ये दो सौ इकहत्तर पत्र एक लंबी अवधि- लगभग पैंतीस वर्षों के दौरान (1970 से 2003)- लिखे गए हैं। इन पत्रों में व्यक्ति, परिवार और समाज ही नहीं, बल्कि इससे साहित्य की एक बड़ी दुनिया भी खुलती है, जिसका परिप्रेक्ष्य हिंदी साहित्य के वर्तमान के साथ पूरे विश्व के बड़े लेखकों की दुनिया है। सबसे बड़ी बात यह है कि इन पत्रों ने साहित्यानुरागी अपने अनुज में न केवल साहित्य के प्रति उत्सुकता और ललक जगाई, बल्कि भविष्य में उसके साहित्य-लेखन का पथ भी प्रशस्त किया। यही नहीं, खुद डॉ. नवल के आलोचक के विकास की एक रूपरेखा भी इन पत्रों में है। सचमुच ये पत्र पिछले पैंतीस वर्षों के वर्तमान साहित्य का अद्भुत दृश्यालेख हैं, जिनमें सुख-दुख और संघर्ष और भटकाव के अनेक मोड़ हैं।

प्रिय भग्गन: संकलन-संपादन- भारत भारद्वाज; प्रकाशन संस्थान; 4268-बी/3, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 500 रुपए।

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रेडियो, नाटक, फिल्मों और धारावाहिक आदि माध्यमों की विख्यात सृजनकर्मी अचला नागर का यह पहला उपन्यास है। इस उपन्यास में उन्होंने परिवार और व्यवसाय की एक सहयोगी संरचना को आधार बनाते हुए एक ओर पीढ़ियों के संघर्ष को रेखांकित किया है, तो दूसरी तरफ विश्वास और भरोसे पर जीवित शाश्वत मूल्यों को प्रतिष्ठित किया है। कथा के केंद्र में एक व्यवसायी परिवार है, जिसने व्यवसाय का एक सहयोग-आधारित ढांचा खड़ा किया है, जहां व्यवसाय के सब फैसले सहयोगियों की राय से मिल जाते हैं, लेकिन नई पीढ़ी के कुछ लोगों को यह तरीका बहुत रास नहीं आता, जिसका परिणाम परस्पर छल, अविश्वास और पारिवारिक मूल्यों के विघटन में होता है। लेकिन जल्दी ही उन्हें अपनी भूल का अहसास होता है, और परिवार तथा परस्पर सौहार्द के जिस ढांचे पर ग्रहण लगने लगा था, वह वापस अपनी आभा पा लेता है। उपन्यास की विशेषता इसका कथा-रस है जो इधर के उपन्यासों में अक्सर देखने को नहीं मिलता। बिना किसी चमत्कारी प्रयोग के कथाकार ने सरल ढंग से अपनी कहानी कहते हुए अपने यथार्थ पात्रों को साकार और जीवित कर दिया है।

छल: अचला नागर; लोकभारती प्रकाशन, पहली मंजिल, दरबारी बिल्डिंग, महात्मा गांधी मार्ग, इलाहाबाद; 199 रुपए।

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दीप्ति गुप्ता की इन रचनाएं मनुष्यता को सहेजने वाली उद्दात रचनाएं हैं, जो सहज ही दिल और आत्मा की गहराइयों में उतरती चली जाती हैं। इन दिनों जब हर तरफ लालसाओं की अंधी दौड़ चल रही है, कंधे से कंधा मिला कर नहीं, बल्कि छीलते हुए लोग, ज्यादा से ज्यादा बटोर लेने, समेट लेने की घमासान में शामिल हैं, तब दीप्ति इन सबसे अलग बड़े यत्नपूर्वक जीवन मूल्यों की संपदा सहेजने में लगी हैं और इसके लिए कहीं दूर न जाकर, वे आसपास के चरित्रों, घटनाओं और स्थितियों के बीच से जीवन सत्व के ‘मोती’ चुनकर उन्हें स्वांत सुखाय शब्दों में पिरोती हैं। ये मोती कभी ‘लगन’ कहानी के पावस-केतकी के निस्वार्थ स्वकार्य की धवल आभा बिखरते होते हैं, तो कभी अपनी क्यारी के फूलों को देवत्व प्रदान करने वाले ‘दोस्त’ कहानी के माली गुलाब सिंह के पास, या फिर ‘जीवत’ वाले बुधवीर की आंखों से झरते आंसुओं में या ‘अनबूझ रिश्ते’ के हरिया काका की ममता में, तो कभी ‘फरिश्ता’ के भोले मनस मधुकर के हाव-भाव और कर्तव्यनिष्ठता में, तो कभी दीन-दुखियों के मसीहा और फक्कड़ ‘तोषी’ के त्यागमय स्वभाव में दमकते दिखाई देते हैं। जीवन के शिवत्व और सुंदर को अपने अंदर समाहित करने वाले इन सामान्य चरित्रों में दीप्ति जीवन की सार्थकता पाती हंै। ऐसे दूसरों के लिए जिए जाने वाले जीवन के बड़े मार्मिक और जीवंत चित्र दीप्ति ने खींचे हैं।

हाशिए पर उगते हुए सूरज: दीप्ति गुप्ता; अमन प्रकाशन, 104 ए/ 80 सी, रामबाग, कानपुर; 250 रुपए।

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First Published on March 5, 2017 3:04 am

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