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बिक्री तंत्र के नुस्खे

कौतूहलवश नोएडा के एक बड़े मॉल की सबसे बड़ी बुक शॉप शृंखला में यह देखने गया कि घोषित ‘बेस्ट सेलर’ सूची की कौन-सी पुस्तकें वहां उपलब्ध हैं
कथा सम्राट प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को काशी के लमही गांव में हुई थी। (फाइल फोटो)

पिछले दिनों जब हिंदी साहित्य की बेस्ट सेलर सूची जारी की गई, तो सहज जिज्ञासा हुई कि क्या अब प्रेमचंद हिंदी के बेस्ट सेलर लेखक नहीं रहे? क्या अब ‘चित्रलेखा’, ‘राग दरबारी’, ‘मुझे चांद चाहिए’, ‘काशी का अस्सी’ बाजार से बाहर हो गए? और क्या हुआ सदाबहार बेस्ट सेलर ‘गुनाहों का देवता’ का, जिसका लगभग सात दशक से प्रतिवर्ष एक संस्करण प्रकाशित होता रहा है? तो क्या अब शिवानी भी बिकना बंद हो गर्इं? कौतूहलवश नोएडा के एक बड़े मॉल की सबसे बड़ी बुक शॉप शृंखला में यह देखने गया कि घोषित ‘बेस्ट सेलर’ सूची की कौन-सी पुस्तकें वहां उपलब्ध हैं, लेकिन सचमुच यह अविश्वसनीय था कि कथा और कथेतर गद्य की उस सूची में शामिल बीस पुस्तकों में से अपवादस्वरूप सिर्फ एक पुस्तक वहां उपलब्ध थी। नई दिल्ली और लखनऊ के रेलवे स्टेशनों के वीलर बुक स्टाल पर भी यही स्थिति थी, जबकि प्रेमचंद, रेणु, अमृतलाल नगर, श्रीलाल शुक्ल, धर्मवीर भारती, हरिशंकर परसाई, सुरेंद्र वर्मा, काशीनाथ सिंह और मैत्रेयी पुष्पा सहित हिंदी साहित्य की मुख्यधारा के बहुत से लेखकों की कई पुस्तकें वहां उपलब्ध थीं। तो क्या तिलिस्म है इस ‘बेस्ट सेलर’ सूची का?
अगर यह ‘आॅनलाइन’ बिक्री पर आधारित सूची थी, तो इसका भी खुलासा बिक्री संख्या के साथ किया जाना चाहिए था। बताया गया कि ये कुछ शहरों के पुस्तक विक्रेताओं की बिक्री पर आधारित आकड़े हैं। दिलचस्प तो यह है कि बेस्ट सेलर की कथा संवर्ग की दस पुस्तकों की इस सूची में सात पुस्तकें तो एक ऐसे नए प्रकाशक की हैं, जिसका लक्षित पाठक वर्ग हिंदी का वह युवा है, जो अंगरेजी से उलीच दिए जाने के बाद बरास्ते हिंदी नए बनते मध्यवर्ग में अपनी जगह बनाने का आकांक्षी है। शायद बेस्ट सेलर की यह समूची कवायद एक नए उभरते प्रकाशक द्वारा व्यापक प्रसार वाले समाचार पत्र के सहमेल से चेतन भगत और अमीष त्रिपाठी की तर्ज पर हिंदी में तुरंता साहित्य का बाजार पैदा करने का उपक्रम हो। कारण यह कि हाल के वर्षों में मिल्स और बून के कैंपस लिटरेचर का अनुकरण करते हुए अंगरेजी के युवा पाठकों के बीच पापुलर लिटरेचर की मांग और खपत ने व्यावसायिक सफलता का जो रास्ता दिखाया है, उससे हिंदी में भी कुछ नए प्रकाशक और लेखक उत्साहित हुए हैं।

इस संदर्भ में याद आ रही है पिछले दिनों की वह अफवाहनुमा खबर, जिसमें यह दावा किया गया था कि बिहार के किसी गुमनाम हिंदी लेखक को उपन्यास लिखने के लिए एक करोड़ रुपए की अग्रिम राशि दी गई है। कौन है वह लेखक और कौन है अग्रिम राशि देने वाला वह प्रकाशक, इसका खुलासा होने के पहले वह खबर भी हवा में उड़न-छू हो गई। दरअसल, यह अंगरेजी की व्यावसायिक दुनिया का वह बासी पड़ गया नुस्खा है, जो कुछ वर्ष पहले सुर्खियों में था। अब अंगरेजी में भी विक्रम सेठ, अरुंधति राय, अमिताव घोष, झुंपा लाहिड़ी और नील मुखर्जी की सफलता रायल्टी की अग्रिम राशि पर न टिक कर उनके लेखन की गुणवत्ता पर है। स्वीकार करना होगा कि हिंदी ही नहीं, दुनिया की हर भाषा में साहित्यिक पाठकों और लोकप्रिय साहित्य के पाठकों के बीच न कभी कोई प्रतिस्पर्धा रही है और न ही कोई विवाद। यहां तक कि दोनों के प्रकाशक और विके्रता भी अलग ही रहे हैं। लाखों में बिकने वाले गुलशन नंदा, वेदप्रकाश शर्मा और सुरेंद्र मोहन पाठक कभी स्तरीय पुस्तक विक्रेताओं के शोकेस में सजे नहीं देखे गए। तात्पर्य यह कि बिक्री और लोकप्रियता कभी भी साहित्यिक गुणवत्ता को बेदखल नहीं कर पाई। यही कारण है कि शिवानी को आजीवन यह मलाल रहा कि लोकप्रिय होने के बावजूद वे गंभीर साहित्य की दुनिया में स्वीकृति नहीं प्राप्त कर सकीं। इसी तर्ज पर नीरज भी लोकप्रिय होते हुए गंभीर कवि के रूप में समादृत नहीं हो सके।

धर्मवीर भारती के गंभीर लेखक होने के बावजूद ‘गुनाहों का देवता’ गंभीर साहित्यिक कृति के रूप में स्वीकृति प्राप्त करने से वंचित ही रहा। संभवत: साहित्यिक कृतियों में ‘राग दरबारी’ अकेला ऐसा अपवाद है, जिसने ‘साहित्यिक’ और ‘लोकप्रिय’ के अंतर को मिटाते हुए गंभीर और आस्वादपरक दोनों ही पाठक संवर्ग के बीच स्वीकृति के विरल कीर्तिमान बनाए।  ‘गुनाहों का देवता’ और ‘राग दरबारी’ ने लोकप्रिय और गंभीर साहित्य के बीच एक सेतु निर्मित करते हुए बड़े पाठक संवर्ग की रुचियों का परिष्कार भी किया। आजादी के बाद के लगभग चार दशक तक हिंदी की पत्र-पत्रिकाओं ने भी हिंदी समाज में नया पाठक वर्ग बनाने और उसकी साहित्यिक रुचियों के निर्माण में जरूरी भूमिका निभाई। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इधर के कुछ वर्षों में अखबारों और व्यापक प्रसार की पत्रिकाओं में साहित्य चर्चा का स्थान सिमटते-सिमटते हाशिये के भी बाहर हो गया है। जबकि अभी बहुत दिन नहीं बीते जब व्यापक प्रसार की स्टाल पर बिकने वाली एक पत्रिका की साहित्य वार्षिकी एक लाख से अधिक छपती और बिकती थी। बेस्ट सेलर का परचम लहराए बिना वहां सचमुच हिंदी साहित्य अपनी समूची छवि के साथ मौजूद रहता था।
कहना न होगा कि दुनिया के हर साहित्य की तरह हिंदी साहित्य में भी तुरंता और गंभीर साहित्य के बीच हमेशा फांक रही है। ‘वर्दी वाला गुंडा’ हिंदी का सर्वाधिक बिक्री वाला उपन्यास होने के बावजूद न कभी वह साहित्यिक मान्यता का दावेदार था और न कभी उसे गंभीरता से लिया गया। एक दौर में आम पाठकों के बीच सर्वाधिक लोकप्रिय होने के बावजूद आज शिवानी के साहित्य की न वह लोकप्रियता रही और न बाजार में उनकी पुस्तकों की वैसी उपलब्धता। विचार किया जाना चाहिए कि जिन फुटपाथों और दुकानों पर कभी गुलशन नंदा, कुशवाहा कांत और वेदप्रकाश शर्मा की किताबें बिक्री के लिए सजी रहती थीं, आज वहां से अदृश्य क्यों हैं? क्यों अब किराए पर पढ़ी जाने वाली जासूसी और रहस्य रोमांच की पुस्तकों का चलन लगभग समाप्त हो गया? इस सबका समाजशास्त्रीय अध्ययन किया जाना चाहिए।

मगर किसी गैर-पारदर्शी सर्वेक्षण के आधार पर एक समयावधि विशेष के लिए यह घोषणा करना कि अब हिंदी साहित्य की अमुक पुस्तकें बेस्ट सेलर हैं, उन नए पाठकों के साथ छल करना है, जो स्तरीय साहित्य की मुख्यधारा से अनभिज्ञ हैं। यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण है कि व्यापक प्रसार की पत्र पत्रिकाओं ने स्तरीय साहित्य की उपेक्षा और किनाराकशी की जो शुरुआत की थी वह अब साहित्य को बाजारू बनाने और पाठकीय रुचि को हल्का-फुल्का बनाने की ओर उन्मुख हो गई है। स्तरीय साहित्य को दृश्य ओझल कर समयकाटू पुस्तकों को साहित्यिक कृतियों के रूप में प्रचारित किया जाना इसी का सूचक है।
पुस्तकों का बाजार बने, पुस्तकें बिकें और हाथों हाथ लाखों पाठकों के बीच पढ़ी जाएं, इसकी चाहत तो हर किसी को है, लेकिन पुस्तकों को बाजारू बना कर साहित्य के रूप में प्रस्तुत किया जाना सचमुच उद्विग्न करने वाला है। यह पड़ताल भी की जानी चाहिए कि जिन पुस्तकों को हिंदी की बेस्ट सेलर के रूप में प्रचारित किया जा रहा है उनमें हिंदी समाज का कौन-सा चेहरा है? क्या उसमें आत्महत्या करते किसान, बेरोजगारी की मार झेलते युवक, हाशिये के समाज के दुख-सुख, बदरंग होते जनतंत्र की आहटें और गली-मोहल्ले, गांव-कस्बे का जीवन और स्पंदन है या कि सब कुछ हवा-हवाई, महानगरीय और सपनीला आभासी जीवन। डर है कि कहीं स्तरीय साहित्य के जमे-जमाए बड़े प्रकाशक भी नए बनते बाजार के लोभ में तुरंता साहित्य के प्रकाशन की होड़ में न शामिल हो जाएं। इसके कुछ संकेत भी मिलने लगे हैं। साहित्य और लेखक को ब्रांड और बिकाऊ माल में तब्दील होने देने के दुष्परिणामों को जानना और उससे समय रहते निपटना लेखक, पाठक और प्रकाशक का सामूहिक दायित्व है, जिससे विमुख नहीं हुआ जा सकता।

 

 

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