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बाखबर- शोक-स्नान

भारत का गजब कूटनीतिक तख्तापलट! कि तभी उस चैनल पर पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या की खबर ब्रेक हुई और सभी चंपी चैनलों को अपनी कहानियां पलटनी पड़ीं।
Author September 10, 2017 05:26 am
पत्रकार गौरी लंकेश की अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी। (तस्वीर- फेसबुक)

अंगरेजी का एक चंपी-चैनल लाइन पर लाइन चस्पां किए जा रहा था: एसएमएस की अंगरेजी से असली अंगरेजी बचाओ! फिर नई लाइन चिपकाई: ‘लंगड़ा’ लीग ने भागवत के आने पर रोक लगाई! इस ‘लंगड़ा’ लीग में कौन-कौन हैं, जरा खोल भी देते भाई!  इसी वक्त दूसरा कांग्रेस-कोसू चंपी चैनल लाइन दिए जा रहा था: ‘अब यह संघ बरक्स शेष’ है। संघ विचारक बोले: यह फासिज्म है।  ममता की पार्टी के प्रवक्ता ने कहा: संघ समेत कइयों को मना किया है। हॉल की मरम्मत चल रही है।  तीसरा अंगरेजी चैनल गोरखपुर में मरे बच्चों पर बहस कराए जा रहा था। चौथा चैनल भी गोरखपुर में हुई बाल मृत्यु पर बहसे जा रहा था।
पहले वाले का चंपी से मन न भरा तो लाइन दी: चीन मोडीफाइड। भारत का गजब कूटनीतिक तख्तापलट! कि तभी उस चैनल पर पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या की खबर ब्रेक हुई और सभी चंपी चैनलों को अपनी कहानियां पलटनी पड़ीं।  कुछ पहले तक एक और अंगरेजी चैनल का भक्त एंकर न जाने कहां से एक शुद्ध अमेरिकी ‘सामरिक प्रचार’ का वीडियो ले आया और दिखाता रहा कि किस तरह अमेरिका चाहे तो उत्तरी कोरिया को कितनी बार बर्बाद कर सकता है? कुछ देर बाद वह अमेरिकी वीडियो से निकला, तो सीधे मुंबई कनेक्ट कर गणेश विसर्जन को कवर करने लगा कि इसी बीच उसे गौरी की हत्या की खबर लगी और फिर गणेश विसर्जन कट करके गौरी की हत्या की कवरेज पर आना पड़ा।

गौरी की हत्या की कहानी बाकी सब कहानियों पर भारी पड़ी! कहानी थी ही ऐसी लोमहर्षक और नृशंस!  दो चैनल पूछते रहे: गौरी को किसने मारा? किसने मारा? एकदम सनसनीखेज सवाल! राहुल शायद कुछ जल्दी ही बोल गए और ‘जंप द गन’ वाली हरकत कर बैठे कि समूची विचारधारा ही चुप करने की है, जो हमला करती है और ‘किल’ तक करती है। एक ही आवाज, आवाज है।
इसके बाद कहानी ने राजनीतिक बहसा-बहसी का रूप ले लिया। गडकरी ने राहुल की टिप्पणी को ‘नानसेंस’ कहते हुए साफ किया कि भाजपा का इससे कोई लेना-देना नहीं!
लेकिन इसके बाद समूचा अखाड़ा खुल गया। ऐसा ही होता है। हमारे चैनल बड़ी से बड़ी घटना की अपेक्षा उसकी राजनीतिक रस्साकसी का मजा ज्यादा प्रसारित करते हैं। वही बिकती है।
हर एंकर कहता और प्रवक्ता कहते कि विपक्ष जांच से पहले ही नतीजे निकाल चुका है। पहले जांच होने दें, जांच के बाद पता लगेगा कि किसने मारा अभी से किसी पर तोहमत लगाना कहां का न्याय है?
गौरी का प्रोफाइल दिया जाने लगा। वह फ्री थिंकर थी। अकेली रहती थी। पत्रिका अपने बल पर निकालती थी। निर्भीक थी। ईमानदार थी। उसे धमकियां मिलती रहती थीं। नक्सलों के बीच काम करती थी। सोशल मीडिया पर दी जाती धमकियों के बारे में उसने किसी को नहीं बताया!
कहानी ज्यों ज्यों खुली त्यों त्यों कांग्रेस-कोसू चैनल अपनी फार्म में आने लगे। एक ने लाइन लगा कर पूछा: वे कामरेड कौन थे जो लड़ रहे थे?
बहसों में लोग हिसाब-किताब करने लगे। एंकर कहते थे कि हत्या पर राजनीति न करें, लेकिन जितना मना करते थे उतनी ही राजनीति बढ़ती जाती थी। अपने यहां राजनीति ही ‘सत्य’ और ‘तथ्य’ तय करती है।

इसके आगे कथा एक जासूस कथा की तरह कही जाने लगी कि सीसीटीवी फुटेज हत्यारे का सुराग देगा, सीएम ने कहा है कि किसी को बख्शा नहीं जाएगा, राजकीय सम्मान से श्रद्धांजलि दी गई… शुरू की खबरों में दो हत्यारे बताए गए। अंत में एक ही रह गया! उसकी मोटर साइकिल सीसीटीवी कैमरे ने पकड़ी, लेकिन हत्यारा हेलमेट पहने रहा, इसलिए चेहरा शायद साफ नहीं दिखा।
एंकरों और रिपोर्टरों को पहले ‘धक्का’ लगा। सब कहते ‘आयम शॉक्ड’! ‘आयम शॉक्ड’! पत्रकार बिरादरी शोक में अक्सर ‘शॉक्ड’ महसूस करती है। कइयों ने कहा: आज उसकी बारी थी, कल हममें से किसी की भी हो सकती है।
एक चैनल की बहस में एंकर ने एक से एक घृणामूलक ट्वीट उद्धृत किए और लिखे दिखाए (वे जिस गंदी भाषा में थे वह अलेखनीय है)। एंकर खुद पढ़ने से हिचक गई।
कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने दुख की इस घड़ी में भी सोशल मीडिया में ऐसी घटिया भाषा लिखने वालों को धिक्कारा! यह अपेक्षित था!
एक चैनल की बहस में एक पत्रकार ने सोशल मीडिया वाच करने वाले पीएम का बचाव करते हुए कहा कि वे तो मुझे भी वाच करते हैं, उनके वाच करने का मतलब यह कहां कि वे उनका समर्थन करते हैं। उसे किसी ने नहीं काटा!
इसके आगे शोक-स्नान शुरू हुआ।
‘आयम गौरी’ ‘आयम गौरी’ कहने वाले पोस्टर दिखाए जाने लगे।
एक एंकर अस्तित्ववादी-सा होकर कराह उठा: ऐसा लग रहा है कि कल मर गया हूं!

धन्य है गौरी लंकेश, जो इतने सारे लोगों को अपराधबोध से भर गई! शोक में डुबकी लगाना पुण्य का काम है। टीवी में शोक भी परफारमेंस बन उठता है।
एक चैनल ने बताया कि परिवार वालों का राज्य सरकार की जांच पर भरोसा नहीं है। वे सीबीआइ की जांच चाहते हैं!
एबीपी ने उत्तरी कोरिया के एकछत्र तानाशाह किम इल जोंग की पच्चीस कहानियां बतार्इं जो एक से एक सनसनीखेज थीं कि किम जब तीन सप्ताह का था, तो चलने लगा था, जब छह सप्ताह का हुआ तो बोलने लगा! अपने बाल वह खुद काटता है और सबसे उसी तरह के काटने को कहता है। वह शुगर कर मरीज है। उसका सब पर कंट्रोल है, वह किसी का भरोसा नहीं करता।…

 

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