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बाखबर: अचानक नोटबंदी के फूले हुए गुब्बारे की हवा निकलने लगी!

चार दिन से हर खबर चैनल बाबा लीला को लाइव कवर करने में लगा था, मानो मालूम हो कि कुछ बड़ा घटित होने वाला है।
Author September 3, 2017 07:05 am
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी (फोटो-पीटीआई)

हाय कपंटीशन कि पहले टाइम्स नाउ का एक एंकर बरसते पानी में बरसाती पहन कर पानी में खड़ा बारिश को कवर करता दिखा कि तुरंत दूसरे चैनल के एक दहाड़ू एंकर को भी पानी में उतरना पड़ा और भीगते हुए ही कवर करना पड़ा! उसका बस चलता तो वहीं बारिश से बहस करने लग जाता और इंद्र भगवान का इस्तीफा मांग लेता!  रिपोर्टरों और एंकरों में इस बात का कपंटीशन रहा कि कौन कितने गंदे और गहरे पानी में ड़ूब कर बता सकता है: मुंबई मुंबई कित्ता पानी?  फिर मुंबई का वही मिडिल क्लासी चैनल क्रंदन शुरू हुआ कि इसके लिए जिम्मेदार कौन? अपने यहां किसी की जिम्मेदारी कभी फिक्स नहीं होती!  सप्ताह का सुपर नायक खलनायक रहा बाबा राम रहीम! चार दिन से हर खबर चैनल बाबा लीला को लाइव कवर करने में लगा था, मानो मालूम हो कि कुछ बड़ा घटित होने वाला है। पांच लाख भक्तों का जमावड़ा और सत्ता का असमंजस विचित्र स्थिति पैदा करता रहा।

बाबा की भक्ति की खातिर बनाई गई बाबा राम रहीम की इस गंद-कथा के पीछे एक ‘बाबा भक्त सत्ता’ थी, उससे भी अधिक ‘बाबा भक्त पुलिस’ थी और इन सबके ऊपर सत्ता के धरती पकड़ प्रवक्ता थे। मीडिया पिटा, पिटने दिया। जनधन हानि हुई, होनी दी। भक्त सीना तान कर कहते कि मर मिटने को तैयार हैं!
चार दिन तक चैनल सत्ता की खबर लेते रहे, लेकिन ढीठ सत्ता ‘किंतु परंतु’ लगा कर बाबा को डिफेंड करती रही। उसके प्रवक्ता अपनी गलती मानने को तैयार न होते। आप आधा घंटा ठोकें या एक घंटा, वे वही कहते जो कहना होता कि सरकार सही। पुलिस सही। मीडिया गलत। बाहर वाले बदमाशों ने बदमाशी की होगी!  बाबा-भक्त सत्ता ने बाबा का साथ जेल जाने तक न छोड़ा। भला हो अदालत का कि उसने हिम्मत दिखाई और बारह साल पुराने रेप के केस में बीस साल की सजा सुना दी! सिर्फ एक अन्य बड़ा बाबा इस बाबा के पक्ष में बोला। एक विचारक जी ने भी बाबा को बचाने में दम लगाया, लेकिन कहानी कुछ इस कदर अश्लील थी कि वे बचा न सके। हर चैनल ने अश्लील बाबा-लीला को ठोका!

और बाबा भी क्या? लव चार्जर, मैसेंजर आफ गॉड, एक्शन हीरो, गायक, पटकथा लेखक और घटिया-सा गायक! अंत में चैनलों ने नाम दिया बलात्कारी बाबा!
एबीपी ने बलात्कारी बाबा को ‘काम’ बाबा बताया। बाबा की ‘काम कथा’ बताते हुए बाबा के ड्राइवर खट्टा सिंह ने लंबे साक्षात्कार में बताया कि वह किस तरह ‘सेक्स विक्षिप्त’ था कि ‘काम कला’ में दक्ष रहने के लिए वह एक वैद्य रखता था, जो जवानी की दवाएं बनाता रहता था, गुफा में हॉस्टल की लड़कियां लाई जाती थीं, वह किसी को नहीं छोड़ता था… एक लंबी गंदी अश्लील कामुक कथा! कि अचानक नोटबंदी के फूले हुए गुब्बारे की हवा निकलने लगी! एक बड़ी खबर बनी और सन्नाटा छा गया। नोटबंदी के पक्ष में एक दमदार प्रवक्ता बोलता न दिखा! दो चैनलों ने नोटबंदी को रगड़ कर रख दिया!  आंकड़ा आपका। दावा आपका। जीडीपी आपकी! सब कुछ आपका और यह हाल कि ‘खोदा पहाड़ और निकला चूहा, वह भी मरा हुआ’। चैनलों पर चर्चाआें की टोन यही रही!
सिर्फ एक मंत्री बताते रहे कि नोटबंदी ने क्या क्या कमाल कर डाला, लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते रहे।

जय हो एनडीटीवी की कि उसके श्रीनिवासन ने सबसे बेहतरीन तरीके से आंकड़ों को रगड़ा और बताया कि किस तरह नोटबंदी की कथित उपलब्धियां सिर्फ अनुपलब्धियां हैं! जितने पुराने नोट थे लगभग सब लौट आए। सारा काला सफेद होकर घर आ गया! क्या ही कमाल की धुलाई थी भाई! दूसरे अंग्रेजी चैनल पर भी यही बातें बार-बार रिपीट हुर्इं कि सारा काला धन सफेद हो गया। लगभग सारे नोट लौट आए, तब बचा क्या? चिदंबरम का ट्वीट कम से कम एक चैनल पर खूब दिखा, जो कहता रहा कि सोलह हजार करोड़ वसूल करने के लिए इक्कीस हजार करोड़ गंवाए। नोटबंदी कराने वालों को नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए!
विकास दर यानी जीडीपी पांच दशमलव सात मात्र रह गई। पांच तिमाहियों में सबसे नीचे रही दर।
हाय! सत्तर साल बरक्स तीन साल की यह महान उपलब्धि!
तीन दिन तक हम उन दर्पोद्धत प्रवक्ताओं के दर्शनों के लिए तरसते रहे, जो हर शाम देर तक हर चैनल पर दिखा करते थे, जो किसी को बोलने तक न देते थे और असहमत को देशद्रोही कह कर चुप कर देते थे।
चर्चा में रहा गोलपोस्ट का बदलना। यानी घोषित उद्देश्य का बार-बार बदलना: काला धन खत्म होगा। आतंकवाद खत्म होगा। नक्सलवाद खत्म होगा… फिर बदले और फरमाए कि देशवासियो कैशलेस हो जाओ! लेन-देन डिजिटल करो। पेटीएम करो। मोबाइल से करो। कैशलेस हो जाओ!
लेकिन नगद नारायण थे कि फिर लौट आए! नगद नारायण जीते, डिजिटल वाद हारा!जनता को नगद नारायण ही पसंद है!
अहंकार के गुब्बारे की हवा जब निकलती है तो ऐसे ही निकलती है!
कैबिनेट में बदलाव के चक्कर में कई मंत्रियों ने इस्तीफे दिए। जिनने दिए उनके चेहरे लटक गए। ऐसी देशभक्ति है कि कुर्सी जाने की आशंका मात्र से उदास हो जाती है।

गुब्बारे की हवा

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