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सुबह विपक्ष नाराज होता है, दोपहर बाद सीरियस हो जाता है!

एआइबी की फुलफार्म इतनी गंदी है भाईसाब कि मैं टीवी पर बोल तक नहीं सकता। इनको हवा क्यों देते हो।
Author July 23, 2017 04:36 am
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया। (फाइल फोटो)

इस बदतमीज समय में जितनी बदतमीजी करो उतनी बाइट पाओ! हाय हाय पाओ! वाह वाह पाओ!
‘एआइबी’ वाले जब भी बोर होते हैं, खड़े-खड़े किसी न किसी महामहिम को अपनी हंसी में ‘भून’ (रोस्ट) डालते हैं। सोशल मीडिया में वायरल करवा देते हैं और चैनलों का ‘डिनर’ हो जाता है। चिंता में दुबले हुए जाते एंकर हाय हाय करने लगते हैं- देखो तो कैसी बदतमीजी कर डाली है! पीएम को एक झोला लेकर स्टेशन पर खड़े दिखाया है, मानो हर वक्त ट्रेनों का इंतजार ही करते रहते हों। फिर दूसरे चित्र में एक भोंडा-सा स्नैपचैट फिल्टर लगा कर उनका चेहरा भद्दा बना दिया!
लेकिन हर बदतमीजी बिकती है। हर चैनल के प्राइम टाइम में ऐसी बदतमीजी का एक पैकेज दिया जाता है। पैकेज में एक वकील होगा, जो कानून बताएगा कि छोटे-मोटे का मजाक उड़ाना चलता है। पीएम का मजाक उड़ाना ‘नाट एलाउड’। हालांकि कानून इस मामले में चुप है। फिर एक आजादीपसंद बोलेगा कि क्या जुबान पर ताला लगा लें? एक निंदक कहेगा कि एआइबी की फुलफार्म इतनी गंदी है भाईसाब कि मैं टीवी पर बोल तक नहीं सकता। इनको हवा क्यों देते हो।
एक घंटे हवा देने के बाद एंकर कहती है कि कम से कम पीएम को तो बख्श देते!
ऐसे में केस न हो तो कब हो?
‘एआइबी’ यानी ‘आल इंडिया बदतमीजी’। (‘बी’ का असली शब्द एकदम गलीछाप है) इसी तरह नाम कमाती है! चैनल कमवाते रहते हैं।
मुंबई की बारिश में सड़कों के गढ्ढों से परेशान आरजे मलीश्का ने बीएमसी का गा-बजा कर वीडियो बना कर मजाक उड़ाया। वीडियो मजेदार बनाया। गीत और व्यंग्य के बढ़िया तड़के वाला वीडियो वाइरल हो गया तो चैनल ले उड़े। बारिश में मुंबई की गढ्ढा हाल सड़कों के सीन दिखाने लगे। बीएमसी से सवाल करने लगे।
लेकिन अहंकार का क्या करें कि जरा-सी मीठी बदतमीजी भी बर्दाश्त न हुई और नोटिस दे डाला कि मलीश्का मच्छर क्यों पालती हैं!
एक बदतमीजी नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ होती नजर आई। रविवार को रिपब्लिक टीवी पर अनुपम खेर के ‘पीपल’ में नवाज एक बेहतरीन बातचीत करते रहे, लेकिन तीन दिन बाद ही एक रंगभेदवादी डाइरेक्टर के कमेंट पर वे नाराज नजर आए और चर्चा के केंद्र में आ गए! विवाद होते ही चैनल ने एक बहस करा कर उनकी आने वाली फिल्म का छोटा-सा बाजार बना दिया!
चुनाव आते देख कर्नाटक सरकार ने अपना झंडा अलग बुलंद करने का ऐलान कर दिया। खुद को नेशन समझने वाले, पल-पल पर ‘नेशन वांट्स टू नो’ चीखने वाले चैनलों में हाय हाय शुरू कर दी कि नेशन के भीतर ये कौन-सा नेशन मांगता? एक भी कन्नडभाषी लज्जित नहीं था। कन्नडवादी वक्ता गर्व से कहते थे: अलग झंडे में क्या गलत है? कश्मीर का भी तो है! इससे तो नेशन और मजबूत होगा। राष्ट्रवादी प्रवक्ता मन ही मन प्रसन्न कि देश के टुकड़े-टुकड़े करने वाली बिग्रेड को कूटने का सुनहरा अवसर प्राप्त हुआ!
चुनाव जीतने के लिए कोई कुछ भी कर सकता है।
बलैयां लूं तमिल सीएम पलनीसामी जी की कि एक झटके में तमिल विधायकों की तनखा में सौ फीसद का इजाफा कर दिया!
इस इजाफे को देख सारे एंकर जल उठे। कहने लगे: घोर अनर्थ? सरकार को एक्सपोज करने के लिए कंट्रास्टी सीन दिखाने लगे: एक फ्रेम में तमिल किसान हरे पटके सिर पर बांधे और हरे रंग की अद्धी पहने खोपड़ियां हाथ में लिए जंतर मंतर पर हल चलाते दिखते, दूसरे फ्रेम में सीएम हंसते दिखते, तीसरे में एंकर चिल्लाते दिखते कि अपनी डबल कर ली! (और हमारी वही की वही रही! हमारी भी बढ़वा देते तो कुछ बात होती!)
हमें तो तमिल किसान न जाने क्यों कुछ अलग तरह के किसान दिखे! हरा पटका, हरी अद्धी, हाथ में खोपड़ियां और एक हल, जिसे जंतर मंतर पर चलाने का सीन देते किसान! और तमिल की जगह फर्राटे से अंग्रेजी बोलने वाले! हमें तो एकदम डिजाइनर किसान लगे!
चैनलों के लिए सबसे सुखद दिन संसदीय सत्रों के होते हैं। विपक्ष की सबसे लोक लुभावन कहानियां राज्यसभा में ही बनती दिखती हैं। इसलिए लोकसभा या राज्यसभा टीवी का सौजन्य लगाया और कनेक्ट कर आराम से बैठ गए।
सुबह विपक्ष नाराज होता है, दोपहर बाद सीरियस हो जाता है! बहन मायावती का दो मिनट नौ सेकेंड के भाषण के बाद अंडर प्रोटेस्ट इस्तीफा देने की घोषणा करना ऐसा ही एक प्रतिरोधी पल था। बाद में सीताराम येचुरी और टीएमसी के डेरेक ओ ब्रायन के भाषण जोरदार रहे! सीता ने लिचिंग को कानून-व्यवस्था की समस्या न कह कर ‘विचारधारात्मक निर्मित’ कहा! यह भी कहा कि इस देश में एक नास्तिक चार्वाक भी हुए हैं। उनका भाषण एकदम शानदार था! लेकिन सपा के नरेश अग्रवाल ने हमारे देवी-देवताओं के बारे में कुछ ऐसा कह दिया कि सत्ता पक्ष को आपत्तिजनक लगा और उनको अपने शब्द वापस लेने पड़े! इसके बाद भी उनकी आलोचना जारी रही!
संसद के वर्षाकालीन सत्र से ऐन पहले मोदी जी ने सर्वदलीय बैठक में गोरक्षकों को कड़ी चेतावनी दी, तो चैनल धांय-धांय करके लाइन लगाते रहे: गोरक्षा के नाम पर हिंसा करने वालों को कड़ी चेतावनी! कड़ी चेतावनी! कड़ी चेतावनी!!
उपराष्ट्रपति के लिए वेंकैया जी को नामित करने की घोषणा ने इंडिया टुडे के राजदीप सरदेसाई को कटाक्ष का अवसर दे दिया! वे बोले: असल में उनको वीआरएस दिया गया है!
हाय रे मेरी कटी पतंग!
‘आर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन’ पर निहलानी जी ने कैंची चलाई, तो उसके डाइरेक्टर ने उसे आनलाइन रिलीज करने की ठानी! मधुर भंडारकर की ‘इंदु सरकार’ का कांग्रेस ने विरोध किया तो उनको अपनी आजादी पर खतरा दिखाई दिया! हमें तो दोनों का मार्केटिंग मोमेंट दिखा।
एक अंग्रेजी चैनल ‘निजता के अधिकार’ पर चर्चारत था। अरे भाई! जो देश ‘त्वदीयंवस्तु गोविंदम्’ में यकीन करता हो, वहां किसकी और कैसी निजता?
तेरा तुझको सौंपते क्या लागे है मोर?

त्वदीयंवस्तु गोविंदम्

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