April 30, 2017

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बाखबर: अथ गर्दभ विमर्श

जब तक एआइडीएमके की लीला प्रसारित थी, तब तक एआइडीएमके कम से कम दो अंगरेजी एंकरों की नजरों में खल पार्टी थी।

Author February 26, 2017 04:06 am
एक पहलू यह भी है कि दोनों जज इस मामले को फिर से सुनवाई के लिए हाईकोर्ट भेज दें और ट्रायल कोर्ट के सजा के आदेश को स्टे ना करें तो शशिकला मुख्यमंत्री नहीं बन पाएंगी।

जब तक एआइडीएमके की लीला प्रसारित थी, तब तक एआइडीएमके कम से कम दो अंगरेजी एंकरों की नजरों में खल पार्टी थी। शशिकला खलनायिका थीं, पलनीसामी शशिकला के चमचे थे। पलनीसामी जब विश्वासमत जीत गए तब भी दोनों एंकर पलनीसामी से नाराज दिखते रहे। उनका बस चलता तो उन्हें कुर्सी से हटवा कर दम लेते!विधानसभा में हंगामे के फुटेज डीएमके को हंगामा करते दिखाते थे, लेकिन इस पर भी डीएमके निंद्य नहीं मानी गई। अगले रोज एक अंगरेजी चैनल कुछ ऐसा फुटेज लेकर आया कि लगे कि एआइडीएमके भी कम नहीं थी! सिर्फ आर्यमान सुंदरम् ने कहा कि यह क्या बात है कि जिनने हंगामा किया, वही शिकायत कर रहे थे! आर्यमानजी, एक स्तालिनजी से आप और क्या उम्मीद कर सकते हैं? लेकिन अगर अपने नेताओं में उपहास को समझने-सहने की समझ होती और मजा लेने की कुव्वत होती, तो वातावारण इतना तेजाबी न होता।

अखिलेश का ‘गर्दभ संवाद’ एकदम मजेदार था। उन्होंने हंसते-हंसते मार की थी, जो बड़ी मार्मिक थी। उनकी उपहास वक्रता में धार थी। उन्होंने सदी के महानायक के गुजरात के गधों को दिखाने वाले विज्ञापन की स्क्रिप्ट को पढ़ कर एक रैली में चुटकी ली थी और किसी का नाम नहीं लिया था। लेकिन मोटी समझ वाले अंगरेजी चैनलों ने रात तक लाइन लगा ही दी कि यह मोदीजी पर प्रहार था! अंगरेजी वालों की समझदारी कुछ ऐेसी ही है कि वे स्टैंडअप कॉमेडियनों के फूहड मजाकों को तो सराह सकते हैं, लेकिन हिंदी की उपहास वक्रता को नहीं समझ पाते। इसीलिए उन्होंने अखिलेश के व्यंग्यार्थों को इस कदर अभिधार्थक बना दिया कि हंसने की जगह हमें रोना आने लगा! अगर हमारे चैनलों में हंसने की कुछ तमीज होती तो न रेनकोट वाली मोदीजी की प्यारी चुटकी पर रोआराट मचती और न गधे की चर्चा पर मचती। जब हंसने की तमीज नहीं होती, तो हंगामा ही होता है!

विपक्ष पर आए दिन चुटकी लेने वाले मोदीजी ने उसे ‘वार’ ही समझा और दो दिन बाद पलटवार किया। उन्होंने एक रैली में गधे के अथक मेहनती और वफादार होने की तारीफ की और खुद को सवा सौ करोड़ देशवासियों के लिए अथक काम करने वाला बताया और रैली में ताली ली, तो गर्दभ विमर्श बदलता नजर आया! जो गधा उपहास का पात्र बना था वही गर्व का पात्र बनने लगा। मोदीजी विपक्ष पर आए दिन चुटकी लेते रहते हैं, लेकिन इस बार वे प्रति-चुटकी न ले सके! हां, अखिलेश की चुटकी को भी अपने पक्ष में मोड़ ले गए! वे हर चुटकी को अपने पक्ष में मोड़ने की कला में सिद्धहस्त हैं, लेकिन इससे मजाक में से मजा तो निकल गया! यही नहीं, उनकी इस टिप्पणी में एक प्रकार का आत्मदया का भाव भी दिखा!
लेकिन चुटकी लेने की जो क्षमता मोदीजी में है, अमित शाहजी में नहीं है। मोदीजी की ‘स्केम’ की दलीय व्याख्या की नकल पर अमित शाहजी ने ‘कसाब’ के बहाने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बसपा पर तीखा कटाक्ष किया, तो तुरंत मायावती ने उसी टोन में जवाब दिया कि अमित शाह सबसे बड़ा ‘टेररिस्ट’ हैं! यानी जैसे को तैसा! हंसने की जगह इस तरह के फूहड़ कटाक्षों से नहीं बना करती।

एंकरों के भाव देख चैनलों की लाइनें समझ में आती हैं। अगर एंकर उछल रहा है, तो समझिए वह सीन के सीधे ‘सिंक’ में है। अगर बैठा-बैठा कह रहा है कि लाइन में गड़बड़ है, तो समझिए सीन उसके अनुसार नहीं बन रहा है।कई बार चैनलों पर एक ही खबर बड़ी खबर की तरह बजती रहती है और फर्क करना मुश्किल होता है कि किसकी लाइन क्या है? लेकिन एक कहानी में से जब चैनल अपनी-अपनी कहानी कातने लगते हैं, तो समझ में आने लगता है कि लाइनों में पंगा है। लेकिन बना रहे टाइम्स नाउ कि भाजपा लाइन बाद में देती है, पहले नाउ देता है। एक दिन पहले महाराष्ट्र के सीएम फडणवीस बोल कर गए कि हारा तो जिम्मेदारी मेरी और जीते तो श्रेय पार्टी का, लेकिन नाउ ने सीधे यह लाइन दी: मुंबई में मोदी की गर्जना, फिर लाइन दी कि भाजपा से तलाक के बाद उद्धव का ‘रीयिलटी चेक’ का वक्त! कमल का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन! एंकर ने यह भी कहा कि यह नोटबंदी की फतह है!  हमें तो ऐसे ही एंकर पसंद हैं, जो खुद दलीय राजनीति का हिस्सा बन जाते हैं! बहरहाल, उछलती हुई शिवसेना का हंगामा अंत में शांत-सा दिखा! भाजपा जरूर उछलती नजर आई और क्यों न उछलती? उसने छह-सात नगरपालिकाओं पर सीधे कब्जा किया और शिवेसना के लगभग मुकाबले की सीटें पार्इं!

एनडीटीवी पहले दिल्ली-अंबाला मार्ग पर होने वाले प्रदर्शनों को दिखाता रहा, फिर गुजरात पहुंचा। वहां लगी दफा एक सौ चौवालीस की खबर आती रही। सतलुज-यमुना कैनाल को लेकर इनेलो के कार्यकर्ता जोर में रहे, फिर उसी सांस में वह गुजरात विधानसभा में हुए हंगामे को रिपोर्ट करता रहा कि किस तरह विधानसभा में हंगामे के बीच एक मंत्री को चोटें आर्इं। मुद्दा किसानों का था और गुस्सा विधानसभा में था!प्रदर्शन टीवी के लिए होते हैं और टीवी प्रदर्शन के लिए होता है! हर प्रदर्शन एक से आकर्षक सीन देता है: सड़क पर भीड़, नारे, ऊभ-चूभ, पुलिस का इधर-उधर दौड़ना, उसके डंडों का लहराना और प्रदर्शकों के हंगामे, इधर से उधर चलती खींच-खांच और कैमरामैनों का उनको दौड़-दौड़ कर कवर करना! हिचकोले खाते हुए दृश्य ही प्रामाणिक लगते हैं!

रामजस कॉलेज ने जो कवरेज अपने सौ साला जश्न में नहीं लिया, वह उसे जेएनयू के उमर खालिद को बुलाने से मिला। ‘देशभक्तों’ को उत्तेजित करने के लिए ‘कथित देशद्रोही’ का नाम ही काफी था और यही हुआ। एबीवीपी के नेताओं ने पहले कॉलेज की खबर ली, जब कॉलेज ने खालिद के बुलावे को कैंसिल किया, तो आइसा मैदान में आ गई और कॉलेज के बाहर प्रदर्शन करने लगी। आइसा के विरोध में एबीवीपी ने अखाड़ा खोल लिया और हंगामा होने लगा। पूरे दिन कॉलेज के भीतर-बाहर हंगामा होता रहा। खींचा-खांची, हाथापाई तो एक दो सीनों में लाइव दिखती रही। एक चैनल के रिपोर्टर ने कहा कि मीडिया वालों को पुलिस ने पीटा है! एक पोस्टर कहता था: एबीवीपी की गुंडागर्दी मुर्दाबाद! दूसरा कहता था कि यह एबीवीपी का फासिज्म है! एबीवीपी का नेता बोला कि हम गुंडे नहीं हैं। हम राष्ट्रवादी हैं! जो देश को तोड़ना चाहते हैं हम उनको नहीं चाहते! सोनियाजी का एक वीडियो एनडीटीवी पर दिखा। वे अपने क्षेत्र के वोटरों को शायद संबोधित कर रही थीं। लेकिन इस वीडियो की क्वालिटी बेहद दयनीय थी। पिक्चर में न गहरे कलर थे, न शार्पनेस थी। सोनिया गांधी बोलती हुई फीकी-फीकी दिखती थीं!कांग्रेसी लोग क्या इतना भी नहीं जानते कि इन दिनों विजुअल्स की क्वालिटी ही सब कुछ तय करती है! आप कैसे दिखते हैं, इसी से सब तय होता है!

 

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First Published on February 26, 2017 4:03 am

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