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प्रसंगः मिर्जा़ गा़लिब और घर वापसी

धर्मों ने सदा अपने मानने वालों की संख्या बढ़ाने पर बल दिया है। यह संख्या चाहे जोर-जबरदस्ती बढ़ाई जाए या बहला-फुसला कर, इसे धर्मात्मा बुरा नहीं समझते।
Author January 17, 2016 01:10 am
मिर्जा गालिब

महाकवि मिर्ज़ा ग़ालिब अगर आज जीवित होते तो मुझे विश्वास है कि ‘फेसबुक’ के दीवाने होते, क्योंकि उन्हें तमाशा शब्द बहुत पसंद था और ‘फेसबुक’ पर जितना तमाशा होता है उतना शायद आज कहीं नहीं होता। मजा यह है कि तमाशा करने वाला अपना पूरा चेहरा छिपा कर भी तमाशा कर सकता है और दूसरे लोग भी उसमें शामिल हो सकते हैं। अभी आज ही कल में किसी ने पोस्ट लगाई है कि एक मुसलमान लड़की इस्लाम धर्म त्याग कर हिंदू हो गई है। उसके हिंदू हो जाने को घर वापसी और मूल की ओर वापस आना माना जा रहा है। लगातार बधाई के संदेश दिए जा रहे हैं। जय-जयकार हो रही है।

मेरे विचार से धर्म परिवर्तन एक व्यक्तिगत मामला है और किसी को भी यह अधिकार है कि वह अपना धर्म छोड़ कर कोई और धर्म अपना ले। लेकिन मेरी निजी राय ली जाए तो मैं यही कहूंगा कि एक कुएं से निकल कर दूसरे में गिरने से क्या फायदा। मैं यह भी जानता हूं कि मेरी राय को मानने और सुनने वाले नहीं हैं। इसलिए मैं अपनी बात को आगे नहीं बढ़ाऊंगा।
मेरे लिए यह हमेशा दिलचस्पी का विषय रहा है कि ‘मूल’ की ओर लौटने वाले किस ‘मूल’ की बात करते हैं? विभिन्न धर्मों में दी गई मानव उत्पत्ति की धारणाओं को मानना तो मुश्किल है, क्योंकि उसके आधार पर इतने सवाल छत्तीस खड़े होते हैं कि उनका उत्तर पाना कठिन हो जाता है। इसलिए वैज्ञानिकों के मत के आधार पर ही यह मानना पड़ता है कि मानव इतिहास पैंतीस हजार साल पुराना है। इसलिए ‘मूल’ के लिए हमारी खोज कम से कम पैंतीस हजार साल पीछे से तो शुरू ही होनी चाहिए।

दूसरों को तकलीफ देने से अच्छा है कि अपने ही मूल की खोज की जाए। मुझे नहीं मालूम कि मेरे किस पूर्वज ने कब इस्लाम धर्म स्वीकार किया होगा। लेकिन इतना निश्चित है कि कभी न कभी किया होगा, क्योंकि इस्लाम धर्म की उत्पत्ति का इतिहास है। अगर हम मान लें कि पूर्वज ने तेरह सौ साल पहले इस्लाम धर्म स्वीकार किया था तो उससे पहले उनका क्या धर्म था? सुविधा के लिए मान लेते हैं कि वे यहूदी थे।

क्योंकि वह इस्लाम से पहले का धर्म है। तो फिर प्रश्न उठता है कि यहूदी होने से पहले वे क्या थे? पीछे हटते-हटते और मूल की खोज में हम वहां पहुंचेंगे, जहां कोई धर्म नहीं था। मनुष्य कुछ शक्तियों की पूजा करता था। इन शक्तियों की पूजा करने का भी कोई इतिहास रहा होगा। सूर्य और अग्नि की पूजा करने का इतिहास तो उपलब्ध है। बताया जाता है कि अग्नि पूजा का इतिहास ईसवी पूर्व पंद्रह सौ वर्ष पुराना है। उससे पहले क्या विश्वास थे? कड़ी खोज के बाद नतीजा यही निकलता है कि एक समय वह था जब धर्म और धार्मिक विश्वास नहीं थे। इस रूप में तो धर्म बिल्कुल नहीं था जैसा आज है। इसलिए इस्लाम छोड़ कर हिंदू धर्म अपनाना घर वापसी नहीं है- धर्म परिवर्तन है।

‘घर वापसी’ धार्मिक या सांस्कृतिक अवधारणा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक नारा है। इसके आधार पर सांप्रदायिकता और कट््टर हिंदूवाद को बढ़ावा देना है, जिसका निश्चित उद्देश्य राजसत्ता प्राप्त करना है। इस तरह यह एक खतरनाक तमाशा है।
एक सवाल यह भी है कि अगर कोई भारतीय मुसलमान या ईसाई हिंदू हो जाता है तो उसकी ‘घर वापसी’ मानी जाएगी, लेकिन अगर किसी दूसरे देश में रहने वाला ईसाई या मुसलमान हिंदू धर्म अपना लेता है तो उसे क्या माना जाएगा? वह घर वापसी तो नहीं हो सकती? उसे ‘गृह प्रवेश’ कहा जाएगा?

धर्मों ने सदा अपने मानने वालों की संख्या बढ़ाने पर बल दिया है। यह संख्या चाहे जोर-जबरदस्ती बढ़ाई जाए या बहला-फुसला कर, इसे धर्मात्मा बुरा नहीं समझते। संख्या का महत्त्व लोकतंत्र में और अधिक हो जाता है। जितने लोग उतने अधिक मतदाता। अधिक मतदाता सत्ता तक ले जाते हैं। मतलब धर्म का असली खेल सत्ता है। चाहे वह हिंदू धर्म या मुसलिम धर्म हो। अब ‘घर वापसी’ वालों से यह पूछा जा सकता कि धर्म का राजनीतिक सत्ता से क्या लेना-देना? धर्म आध्यात्मिक सत्ता है। राजनीति सांसारिकता है। धर्म जिसे त्याग देने की बात करता है। यह कैसे हो सकता है कि जिसे त्याग देने की बात ढोल बजा-बजा कर की जा रही हो उसे प्राप्त करने के लिए मतदाता बढ़ाए जाएं?

यह कहना कठिन है कि आज धर्म सत्ता का पर्याय बन गया है या सदा से ही धर्म सत्ता का पर्याय रहा है। धर्म का एक अंतर्द्वंद्व है कि वह आध्यात्मिक के आधार पर सांसारिकता को वश में करने का प्रयास करता रहता है।
भारत जैसे देशों के लोकतंत्र में जहां धर्म और जाति के आधार पर सत्ता प्राप्त की जाती है वहां धर्म को मानने वालों की संख्या का बहुत बड़ा अर्थ है। हमारा लोकतंत्र जन नहीं, धर्म आधारित लोकतंत्र बन गया है। हमारा लोेकतंत्र उसी ‘धर्म’ का है, उसी के पास अधिक शक्ति और सत्ता है, जिसके मानने वालों की संख्या अधिक है। यही कारण है कि भारत में किस धर्म के मानने वालों की संख्या कितनी घट या बढ़ रही है, बड़ा मुद्दा बन जाता है। मुझे विश्वास है कि धर्म और राजनीति के इस तमाशे को मिर्ज़ा ग़ालिब बहुत ‘सराहते’। वे कहते ही थे- होता है शबो-रोज़ (रात-दिन) तमाशा मेरे आगे।

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