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उजड़ने का संताप

महावीर प्रसाद द्विवेदी के बाद रूपनारायण पांडे, शिवपूजन सहाय, नवजादिक लाल श्रीवास्तव, देवीदत्त शुक्ल, बनारसीदास चतुर्वेदी, माखनलाल चतुर्वेदी और मातादीन शुक्ल आदि पहले दौर के हिंदी साहित्य संपादकों में थे।
Author May 14, 2017 05:59 am
प्रतीकात्मक चित्र।

धीरेंद्र यादव 

करीब सौ साल पहले जब हिंदी साहित्य और भाषा का आधुनिक रूप बन-संवर रहा था तो हिंदी क्षेत्र में नए साहित्यिक केंद्र भी स्थापित हो रहे थे। इलाहाबाद, लखनऊ, बनारस, पटना, कानपुर, जबलपुर, भोपाल, नागपुर आदि के साथ-साथ समूचे उत्तर और मध्य भारत में साहित्य और समाज के बीच एक नया संवाद जन्म ले रहा था। ‘सरस्वती’, ‘माधुरी’, ‘सुधा’, ‘चांद’ और ‘हंस’ सरीखी स्थापित पत्रिकाएं हिंदी समाज का सार्वजनिक वृत्त निर्मित कर रही थीं। जहां ‘सरस्वती’ पर रामानंद चटर्जी के इंडियन प्रेस का वरदहस्त था, तो ‘माधुरी’ और ‘चांद’ के पीछे मुंशी नवल किशोर प्रेस की परंपरा और दुलारेलाल भार्गव सरीखे साहित्यिक उद्यमियों का पराक्रम। ‘हंस’ प्रेमचंद की साहित्यिक और सामाजिक प्रतिबद्धता का प्रतिफल थी, तो ‘चांद’ रामरिख सहगल के जीवट और संकल्प का परिणाम। आजादी के आंदोलन और सामाजिक सुधार आंदोलनों ने भी हिंदी के लेखन और प्रकाशन के दायरे को विस्तार प्रदान किया था।

यह वह दौर था जब हिंदी में पेशेवर संपादकों का एक समूह भी तैयार हुआ। महावीर प्रसाद द्विवेदी के बाद रूपनारायण पांडे, शिवपूजन सहाय, नवजादिक लाल श्रीवास्तव, देवीदत्त शुक्ल, बनारसीदास चतुर्वेदी, माखनलाल चतुर्वेदी और मातादीन शुक्ल आदि पहले दौर के हिंदी साहित्य संपादकों में थे। इसी दौर में कानपुर से गणेशशंकर विद्यार्थी ने ‘प्रताप’ और लखनऊ से यशपाल ने ‘विप्लव’ के माध्यम से मिशनरी पत्रकारिता को संघर्षशील आयाम दिए। आचार्य नरेंद्र देव और संपूर्णानंद सरीखे बौद्धिक राजनेता इसी दौर में अपने सामाजिक-राजनीतिक लेखन द्वारा हिंदी के दायरे को आधुनिक चिंतन से लैस कर रहे थे। आजादी के पहले का यह समूचा दौर हिंदी क्षेत्र में साहित्य, राजनीति, पत्रकारिता और प्रकाशन का ऐसा स्वर्णिम समय था, जब हिंदी समाज एक नई चेतना के साथ गतिमान था। यह अनायास नहीं था कि नेहरू सरीखे राजनेता बनारस में अपनी मौजूदगी के दौरान प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, संपूर्णानंद आदि के साथ संवाद करना जरूरी समझते थे। यह बात दूसरी है कि अपनी आत्मकथा में हिंदी साहित्यिकों को लेकर नेहरू ने कुछ तिक्तता भी प्रकट की है।

यहां यह भी ध्यान देने योग्य है कि आजादी के पूर्व प्रकाशित ‘गोदान’, ‘रंगभूमि’, ‘प्रेमाश्रम’, ‘कामायनी’, ‘चित्रलेखा’, ‘शेखर एक जीवनी’ सरीखी यादगार साहित्यिक कृतियां हों या कि आजादी के बाद प्रकाशित ‘नदी के द्वीप’, ‘झूठा सच’, ‘मैला आंचल’ सरीखे उपन्यास, सभी का प्रथम प्रकाशन दिल्ली के बाहर के प्रकाशनों से हुआ था। आजादी के बाद के पहले दशक तक दिल्ली के बाहर के पारंपरिक साहित्यिक केंद्रों की सक्रियता और गहमागहमी बरकरार रही। इलाहाबाद जहां निराला, महादेवी, पंत, अश्क के साथ परिमल और प्रगतिशील लेखक संघ के बीच बहस-मुबाहिसों, बैठकों और लेखकों के जमावड़े का केंद्र बना रहा, वहीं लखनऊ भी यशपाल, भगवतीचरण वर्मा, श्रीनारायण चतुर्वेदी और अमृतलाल नागर की जीवंत उपस्थिति और प्रभामंडल से सक्रिय बना रहा।

मगर यह सब टूटने-बिखरने का सिलसिला तब शुरू हुआ, जब दिल्ली देश की राजधानी बनने के साथ-साथ साहित्यिक राजधानी और हिंदी प्रकाशन के बड़े केंद्र के रूप में विकसित हुई। विश्वविद्यालयों-कॉलेजों, आकाशवाणी, दूतावासों, अकादमियों, समाचारपत्र-पत्रिकाओं आदि में ज्यों-ज्यों हिंदी नौकरियों के अवसर बढ़े, त्यों-त्यों समूचे हिंदी प्रदेशों से दिल्ली की ओर प्रतिभा पलायन हुआ। इस अनिवार्य सांस्कृतिक साहित्यिक गतिकी को न तो रोका जा सकता था और न ही मूल्यगत निर्णय देकर इसे प्रतिगामी करार दिया जा सकता था। लेकिन ‘क्या खोया, क्या पाया’ की तर्ज पर इस पर आज विचार जरूर किया जा सकता है। पारंपरिक साहित्यिक केंद्रों के उजड़ने का लेखन पर यों तो कोई तात्कालिक सीधा प्रभाव इसलिए नहीं पड़ा कि दिल्ली से बाहर के लेखकों- पंत, महादेवी, मुक्तिबोध, यशपाल, अश्क, अमृतलाल नागर, रेणु, नागार्जुन, परसाई, आदि सहित पूर्णकालिक लेखकों का बड़ा समुदाय न तो स्थायी रूप से विस्थापित हुआ और न ही देश की राजधानी का मुखापेक्षी हुआ। हां, यह जरूर हुआ कि दिल्ली, मुंबई और कोलकाता से बड़े प्रसार की साहित्यिक पत्रिकाओं के प्रकाशन के चलते साहित्य का एजेंडा सरोकार से कम, व्यवसाय से अधिक नियंत्रित होने लगा। वैसे ‘दिनमान’ सरीखे एकाधिक अपवाद यहां भी बने रहे। पर आजादी के बाद व्यावसायिक घरानों से निकलने वाली लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिकाओं ने हिंदीभाषी मध्यवर्ग की साहित्यिक अभिरुचि बनाने और विकसित करने में एक दौर में निर्णायक भूमिका निभाई। ‘इलस्ट्रेटेड वीकली आॅफ इंडिया’ अंग्रेजीदां उच्च वर्ग के बीच जिस भूमिका का निर्वाह नहीं कर पा रही थी, उससे बेहतर और अधिक प्रभावी भूमिका ‘धर्मयुग’, ‘हिंदुस्तान’, ‘सारिका’ आदि सरीखी पत्रिकाओं ने हिंदी मध्यवर्ग के बीच निभाई।

मगर इस बीच एक लंबा दौर ऐसा रहा, जब इन व्यावसायिक घरानों से मुक्त व्यापक प्रसार की पत्रिकाओं का प्रकाशन बाधित रहा। यह तब टूटा जब राजेंद्र यादव ने ‘हंस’ का पुन: प्रकाशन किया। उन्होंने इसके प्रकाशन से दलित और स्त्री विमर्श को केंद्रीयता प्रदान कर साहित्य का एजेंडा बदलने के साथ-साथ दिल्ली से दूर बैठे सरोकारधर्मी लेखकों को रचनात्मक अभिव्यक्ति का मंच भी प्रदान किया। उन्होंने व्यापक प्रसार की पत्रिका के प्रकाशन द्वारा साहित्यिक पाठकों की आवश्यकता पूर्ति के साथ-साथ व्यावसायिकता की जकड़बंदी को तोड़ कर वही कार्य किया जो एक दौर में प्रेमचंद और यशपाल ‘हंस’ और ‘विप्लव’ सरीखी पत्रिकाओं के माध्यम से कर चुके थे। पर इस समूचे दौर में जिस एक पत्रिका ने व्यावसायिक पत्रिकाओं को चुनौती देते हुए सरोकारधर्मी गंभीर साहित्य का प्रकाशन कर अपनी धमक लंबे समय तक बनाए रखी, वह है ज्ञानरंजन द्वारा संपादित जबलपुर से प्रकाशित अनियतकालीन पत्रिका ‘पहल’। ‘पहल’ उसी भूमिका का निर्वाह करती रही है, जो आजादी के पूर्व के वर्षों में मिशनरी पत्रकारिता ने किया था। भले आज उसकी वह पहुंच और धमक न हो, लेकिन दिल्ली से दूर रह कर लंबे समय तक वह दिल्ली के साहित्य को चुनौती देती रही है।

इसी कड़ी में लखनऊ से प्रकाशित कथाकार अखिलेश द्वारा संपादित अनियतकालीन पत्रिका ‘तद्भव’ ने लगभग अपने दो दशकों के प्रकाशन के दौर में गंभीर और श्रेष्ठ साहित्य के जो मानक बनाए हैं, वह स्वयं में विरल है। कहा जा सकता है कि लखनऊ के पुराने साहित्यिक गौरव का मान रखने में ‘तद्भव’ ने अपनी एक प्रभावी भूमिका का निर्वहन किया है। दिल्ली के बाहर के साहित्यिक केंद्रों के उजाड़ के बीच ये चंद नखलिस्तान हैं। दिल्ली के साहित्यिक राजधानी बनने का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव इसका प्रकाशन की मंडी बनना है। आजादी के पहले जहां एक भी बड़ा हिंदी प्रकाशन दिल्ली केंद्रित नहीं था, वहीं आज एक भी महत्त्वपूर्ण प्रकाशन ऐसा नहीं है, जो दिल्ली के बाहर का हो। इसका सर्वाधिक खमियाजा लेखकों को भुगतना पड़ रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि साहित्यिक पुस्तकों के प्रकाशन में निर्णायक भूमिका लेखकों की न होकर, प्रकाशकों की है। दिल्ली से बाहर स्तरीय प्रकाशक न होने के कारण गैर-दिल्ली के लेखकों को अपनी पुस्तकों के प्रकाशन के लिए बरसों इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में यह सचमुच विडंबनापूर्ण है कि प्रेमचंद, यशपाल, अश्क, नागार्जुन, श्रीपत राय, अमृत राय से लेकर जैनेंद्र तक जिन लेखकों ने अपने प्रकाशन गृह खोले वे एक-एक कर या तो बंद हो गए या निष्प्रभावी होते गए और जो पुस्तक बेचने का धंधा करते थे, वे पुस्तक संसार के नियामक।

एक समय था जब लखनऊ के दुलारेलाल भार्गव के प्रकाशनगृह गंगा पुस्तक माला में नौकरी करके भी प्रेमचंद, निराला, शिवपूजन सहाय आदि लेखकीय स्वाभिमान बनाए रख सकते थे, एक समय आज है जब पुस्तक छपवाने के लिए लेखक को प्रकाशक का मुखापेक्षी होकर अपने स्वाभिमान की रक्षा करना किसी संघर्ष से कम नहीं है। दिल्ली के साहित्यिक राजधानी बनने और पारंपरिक सहित्यिक केंद्रों के उजड़ने का एक संताप यह भी है।

 

 

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