ताज़ा खबर
 

हरकत में बरकत

यूरोप के कई देश जैसे ब्रिटेन, फ्रांस, पुर्तगाल, स्पेन, जर्मनी और यहां तक कि बेल्जियम और आस्ट्रिया विश्व मंच पर अपना दबदबा तभी बना पाए थे, जब वहां के लोगों ने शारीरिक साहस किया। उन्होंने घर का सुख त्याग कर लंबी-लंबी यात्राएं की और नई दुनिया तलाश ली थी।
प्रतीकात्मक चित्र।

मशहूर चित्रकार पाब्लो पिकासो ने कभी कहा था कि कल के लिए वही काम छोड़ना चाहिए, जिसे हम जिंदा रहते पूरा नहीं करना चाहते हैं।  यह बात सच है कि हम बहुत सारी चीजें कल पर इसलिए टालते रहते हैं, क्योंकि उनके प्रति हम पूरी तरह से समर्पित नहीं होते हैं। पिकासो एक महान कलाकार थे और वे अपनी विधा को लेकर इस कदर बेचैन हो जाते थे कि सोना, खाना-पीना तक टाल देते थे। जो वे नहीं टालते थे, वह था उनका काम, जिसे वे जिंदा रहते पूरा करने को आतुर थे। पर साथ ही उनके व्यक्तिगत जीवन के तमाम ऐसे किस्से हैं, जिनसे साफ जाहिर होता है कि बहुत से कामों को वे टालते रहे। उन्हें अपने जीवन काल में उन कामों को पूरा करने में रुचि ही नहीं थी।  वैसे सामान्य रूप से काम टालना आलस का लक्षण है। अमूमन हम काम यह कह कर आगे खिसका देते हैं कि आज मूड नहीं है, कल देखेंगे। हमारा आज का आलस बहुत सारे महत्त्वपूर्ण कार्यों को कल तक पंहुचा देता है और कल कभी नहीं आता।  आलस मानसिक होता है और शारीरिक भी। स्टैंडफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन के अनुसार छियालीस देशों में से भारतवासी उनतालीसवे नंबर पर आते हैं, जो कि चलने-फिरने से परहेज करते हैं। इसके अनुसार एक आम हिंदुस्तानी औसतन 4297 कदम रोज चलता है, जबकि चीन के लोग 6880 कदम चलते हैं। चीन में ही हांगकांग में रहने वाले अन्य चीनियों से ज्यादा चलते हैं और इसीलिए एक दिन में वे सब काम निपटा लेते हैं, जो हम लोग कल के लिए छोड़ते रहते हैं।

चलने-चलाने का सर्वेक्षण स्मार्ट फोन डाटा पर हुआ है और इसीलिए हम कह सकते हैं कि वह भारत की वास्तविक तस्वीर नहीं दिखता, जिसमें देश का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण है, जहां पर लोग सिर्फ पानी के लिए रोज कई किलोमीटर पैदल चलते हैं। पर यह कह देने से यूनिवर्सिटी के सर्वेक्षण को नकारा नहीं जा सकता है। भारत या चीन में अधिकतर स्मार्ट फोन उपभोक्ता वे लोग हैं, जो कि शहरों में रहते हैं और आर्थिक रूप से संपन्न हैं। दूसरे शब्दों में, स्मार्ट फोन उपभोक्ता औसत से ज्यादा सफल व्यक्ति हैं। वे प्रोडक्टिव हैं और अपने कार्यक्षेत्र में उपलब्धियां हासिल करना चाहते हैं। ऐसे में अगर कोई कम आलस करता है, तो औसतन वह कई और काम कर लेगा, जिसको ज्यादा आलसी व्यक्ति नहीं कर पाता है। उसके लिए हर काम जरूरी है और तुरंत होना है, जबकि आलसी व्यक्ति अपने शारीरिक ढीलेपन की वजह से आज के कामों में छंटनी कर के वह सिर्फ वही काम करेगा, जिसमें उसे कम से कम हाथ-पैर हिलाने हों। चीन का औसत देख कर हम समझ सकते हैं कि वह इतनी जल्दी तरक्की क्यों कर गया। विश्व की बड़ी से बड़ी कंपनी और यहां तक कि कई देश आज चीन के मोहताज हैं। चीनी श्रमिक और उद्योगपति वैश्विक बाजार में अपना डंका बजा चुके हैं। उनका प्रभाव इतना ज्यादा है कि दुनिया की राजनीति भी उनके इर्द-गिर्द सिमट गई है।
वास्तव में चपल देह ही चपल बुद्धि को पोषित करती है। चीन का ही उदाहरण फिर लेते हैं। बीस साल पहले अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीनी वैज्ञानिक न के बराबर थे। उनका शोध साहित्य कहीं भी प्रकाशित नहीं होता था। पर पिछले कई सालों में व्यापक फेर-बदल हुआ है। अमेरिकी हार्ट एसोसिएशन के जर्नल में ही उनका योगदान लगभग अस्सी प्रतिशत बढ़ा है। अन्य वैज्ञानिक जर्नलों में भी ऐसी ही स्थिति है।

कहने का मतलब यह नहीं है कि सिर्फ ज्यादा चलने-फिरने से हर तरीके की तरक्की हो जाती है। पर अगर हम इतिहास पर नजर डालें तो इसमें कोई शक नहीं रहता है कि जो लोग या राष्ट्र सक्रिय हो जाते हैं, वे आगे बढ़ने लगते हैं। रोमन साम्राज्य को देखें या फिर मिस्र की सभ्यता को ले लें। दोनों तभी आगे बढ़े थे, जब वहां के लोग शारीरिक श्रम से परहेज नहीं करते थे। दोनों साम्राज्य शिखर तक पहुंचे और फिर खत्म इसीलिए हो गए, क्योंकि संपन्नता ने उन्हें आलसी बना दिया था। रोम में तो एक समय ऐसा भी आया कि रोम निवासी चार कदम भी चलने को राजी नहीं होते थे। घोड़े पर बैठना भी उनको दुष्कर लगता था। पालकी की सवारी उनका लाइफ स्टाइल बन गई थी। यूरोप के कई देश जैसे ब्रिटेन, फ्रांस, पुर्तगाल, स्पेन, जर्मनी और यहां तक कि बेल्जियम और आस्ट्रिया विश्व मंच पर अपना दबदबा तभी बना पाए थे, जब वहां के लोगों ने शारीरिक साहस किया था। उन्होंने घर का सुख त्याग कर लंबी-लंबी यात्राएं की और नई दुनिया तलाश ली थी। चीन की पुरानी संस्कृति भी इसी नीव पर टिकी हुई थी और उसके जाते ही ध्वस्त हो गई थी। अफीम की वजह से आलस का शिकार चीन कई सदी तक रहा है। लोग परिस्थितियों की वजह से आलसी हो जाते हैं या फिर इसका उल्टा है, कहना मुश्किल है। आलस एक मानसिक स्थिति है, जिसके निर्माण में परिवार और समाज में माहौल की यकीनन बड़ी भूमिका है। दूसरों की फुर्ती को देख कर हम भी फुर्तीले होने के चेष्टा करते हैं, पर अगर वही लोग हाथ पर हाथ रखे बैठे हों, तो हम भी उस दस्ते में शामिल हो जाते हैं। जन्मजात कोई भी आलसी नहीं होता है- हाथ-पैर हिलाना मानव स्वभाव है। पर आगे चल कर इस स्वभाव पर हमारा सामाजिक परिवेश गहरा असर डालता है। शारीरिक श्रम का तिरस्कार करके समाज अपनी ही कब्र खोद लेता है।

हिंदुस्तान में भी कुछ ऐसा ही हुआ है। शताब्दियों से हम श्रम त्याग करके ‘ध्यानमग्न’ हैं। भारत तभी तक सोने की चिड़िया कहा जाता था, जब तक उसके नायक साहसिक श्रम करते थे। उनके बल पर ही व्यापार से लेकर विज्ञान और ऐश्वर्य से लेकर त्याग तक के सौर मंडल पर यश भारती लिखी गई थी। उसके बाद शारीरिक और मानसिक आलस ने हमें आ घेरा। जैसा है वैसे में ही काम चला लेंगे की मानसिकता, जिसमें ‘सब चलता है’ ने हमें घेर रखा है। मसला सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक हो या फिर साहित्यिक, सब मुद्दों पर हमारी कल्पना शिथिल हो चुकी है। बहुत सोच-समझ लेते हैं, पर फिर भी वही ढाक के तीन पात ही रह जाते हैं। इस मानसिक आलस से हमें निकलना है और यह तभी हो पाएगा, जब हम तुरंत अपने पैरों को मशक्कत देने लगेंगे।

 

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

First Published on July 16, 2017 4:25 am

  1. No Comments.
सबरंग