May 23, 2017

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रचनाकार का विपक्ष

साहित्यकार का विपक्ष क्या है? क्या सत्ता है? क्या कोई विचारधारा है? क्या कोई राजनीति है? क्या किसी भी प्रकार की निरंकुशता या तानाशाही है? विचारधारा को लेकर निर्मल वर्मा स्पष्ट कहते हैं कि साहित्यकार विचारधारा का दास न बने।

Author नई दिल्ली | March 12, 2017 04:58 am
प्रतीकात्मक चित्र।

समय साहित्यकार का सबसे नाजुक पक्ष या विपक्ष होता है। सर्जक न तो नीत्शे के मवेशी-समय में जीता है, न मनुष्य निर्मित यांत्रिक या भौतिक समय में। समय सर्जक का संवेदनात्मक रूपक है। उसकी रचना के तमाम बिंब, प्रतिबिंब उसके शब्द में उतर कर उसका अपना समय या विचार-समय बन जाते हैं। एक विचार और विवेक-संपन्न रचनाकार कई प्रकार के संघर्ष करता है। वह कभी अपने समय की विसंगतियों से टकरा कर विसंगति का विपक्ष बनता है, तो कभी विचार या विचारधारा से मुठभेड़ करता हुआ उसका विपक्ष बनता है। सत्ताएं तो संवेदनशील, तटस्थ निर्भीक और वाक्-प्रगल्भ सर्जक को सदा अपना प्रतिपक्ष ही नहीं, बल्कि विरोधी मानती रही हैं, जिसके प्रमाण हमें सोवियत रूस के समय में सखारोव, पास्तरनाक और सोल्झेनेत्शिन को नोबेल पुरस्कार से वंचित करने में मिलते हैं और इस क्रम में सोल्झेनेत्शिन को देश निकाला देना है।

भारत का सर्जक जितना अपने समय से लड़ता-जूझता, समझौता करते हुए जीता है उससे अधिक वह अतीत के मोह, पुरखों की स्मृतियों की छाया में भी जीता है। यह साहित्यकार के ईमान की विडंबना ही कही जाएगी कि जब वह राजा या सत्ता के पक्ष का लेखक होता है, तो चारण हो जाता है और जब वह किसी विचार या विचारधारा का पोषक होता है, तो वह प्रतिबद्धता का उच्चारण बन जाता है। जब वह स्वयं के स्वार्थ में केंद्रित होकर यश और धन का लोभी होता है, तो व्यक्तिवादी हो जाता है। क्या हमारे समय की अनेक विद्रूपताओं, विकलांगताओं और विवशताओं के बीच एक ईमानदार सर्जक शब्द के सत्य और उसकी अर्थ पवित्रता की रक्षा कर पाया है? क्या वह लाभ के विकल्पों में भटकता एक अस्थिर मन का ऐसा प्राणी नहीं बन गया है, जिसने अपनी आवाज का सच अपने ही गले में कैद कर लिया है?

सत्ता तो सदा साहित्यकार, पत्रकार और बौद्धिकों को अपना विपक्षी, बल्कि विरोधी तक मानती रही है। जब-जब सत्ता निरंकुश होती है, सत्ता साहित्य और साहित्यकार के नाम से डर कर सृजन अनुष्ठान रचती है और उसे ऐसे भक्त सर्जक, विवेचक, विचारक मिल जाते हंै, जो निरंकुशता के सत्ता प्रायोजित अनुशासन पर्व का कीर्तिगान करने लगते हैं। सत्ता की वाणी कभी विनम्र या अनुरोधात्मक नहीं होती। वह तो आदेशात्मक या निदेर्शात्मक होती है। हमने अपने को समय के विद्रूपों और विसंगतियों का प्रतिपक्ष बनने के बजाय उनका पक्षकार बना लिया है। इसलिए हम अखबार या मीडिया की ऐसी जबान में बोलते हैं, जो न तो जन-सत्य होता है, न सृजन-सत्य।हमारे समय में राजनीति के सत्य का बहिष्कार या तिरस्कार कर दिया गया है। शब्द का जिस कदर चीरहरण करके उसे राजनीतिक मंचों से नंगा किया जा रहा है, उससे लगता है कि शब्द या तो शब्दकोशों में मुर्दा लेटा रहे या अपने वे अर्थ अपना ले, जो नेता, मंत्री या राजनीतिक मंचों से पैदा किए जा रहे हैं। इस प्रकार कोशिश यह है कि एक सर्जक का पक्ष सत्ता हो और विपक्ष भी वह हो, जिसे सत्ता स्वीकार कर सके। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान शब्द की जो सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक शक्ति थी, उससे वह सत्ता भी डर गई थी, जिसके साम्राज्य में कभी सूर्यास्त नहीं होता था। सत्ता व्यक्ति से उतनी नहीं डरती, जितनी शब्द से डरती है।

साहित्यकार का विपक्ष क्या है? क्या सत्ता है? क्या कोई विचारधारा है? क्या कोई राजनीति है? क्या किसी भी प्रकार की निरंकुशता या तानाशाही है? विचारधारा को लेकर निर्मल वर्मा स्पष्ट कहते हैं कि साहित्यकार विचारधारा का दास न बने। दासता किसी भी प्रकार की हो, वह हमें अपने सृजन में स्वायत्त या स्वाधीन नहीं होने देती। इसी प्रकार प्राय: यह भी देखा गया है कि साहित्यकार अतीत के मोह से बंध कर भी अपने समय से भटक जाता है।  साहित्यकार का पक्ष या विपक्ष उसकी रचना है। उसका प्रतिपक्ष एक प्रकार का अदृश्य विपक्ष होता है, जो रचना में निहित होता है। ऐसा विपक्ष भौतिक या वाचिक न होकर शब्द के मौन में छिपे अर्थ का विपक्ष होता है। साहित्यकार बीच बाजार में खड़ा होकर जब यह कहता है कि ‘जो घर बाले आपनो, चले हमारे साथ’, तो भले यह कथन वाचिक और घोषित हो, मगर इसमें सामाजिक विद्रूपताओं, विसंगतियों, और विडंबनाओं को लेकर जो मौन विद्रोह है, वही सही विपक्ष है। विपक्ष केवल सत्ता या नीतियों के विरुद्ध नहीं होता, वह तो अंध आस्थाओं को लेकर जन के विरुद्ध भी होता है। जन की मुक्ति का विपक्ष जन को स्वयं के प्रति उत्तरदायी बनाने का विपक्ष होता है।

साहित्य शब्द की सत्ता है। साहित्य की संसद में सृजन या सर्जक सांसद की भूमिका में है, तो आलोचना उसका विपक्ष है। वह शब्द की निरंकुशता और अनर्थता के विरुद्ध खड़ा होता है, साथ ही ऐसा विरोध भी दर्ज करता है कि जो लोग गलत नीति-नियमों का पक्ष लेकर स्वयं को साहित्य का विचार प्रतिनिधि मानते हैं, उन्हें उनके ही अहंकार से परास्त किया जा सके। आज साहित्य की भूमि पर भूमिकाओं का भय है। राजनीतिक भूमिकाओं में साहित्यकार का शब्द ईमानदार नहीं रहा है। साहित्यकारों में जिस प्रकार सम्मानों, पुरस्कारों, अलंकारों, पदों और प्रभावों की होड़ है, उससे उनके शब्दों के अर्थ नीचे गिरे हैं। कोई बड़े से बड़ा विद्वान और स्थापित, प्रतिष्ठित और अनेक सम्मान-पुरस्कारों से लदा साहित्यकार अपने किसी भी समकालीन को समकक्ष न आने देने का विपक्ष रचता है और ऐसा विपक्ष कटु-निंदा बन कर उभरता है, न कि स्वस्थ आलोचना। वह रचना के सत्य के प्रति ईमानदार होकर काव्य न्याय नहीं करता, बल्कि मित्रता, चेहरे और भावी लाभों की आकांक्षा से अपने बेईमान निर्णय देकर बड़प्पन और निष्पक्षता की नैतिक डींग हांकता है। यश साहित्यकार का प्रथम प्रेम है, धन उसकी सर्वाेच्च प्राथमिकता है, पद उसका श्रेष्ठतम प्रभाव है। इसलिए वह जब भी सोचता है केवल अपने लिए सोचता है।

कुछ स्वघोषित महानता का स्वदेशी मॉडल बनने वाले साहित्यकार आलोचना का हिसंक प्रदर्शन कर अपनी विद्वत्ता का निंदा-शिल्प ही रचते रहते हैं। नए रचनाकारों को प्रेरित करना, मार्गदर्शन देना, अध्ययन के प्रति जिज्ञासु बनाना, रचना की बारीकियां समझाना बुरा नहीं होता, मगर एक ही झटके में यह कह देना कि तुम्हें कुछ नहीं आता, न भाषा, न कविता, न कहानी, न आलोचना आदि और यह सब न आना तुम्हारे भविष्य का खतरा है, यह कहां तक उचित है। ऐसे आत्मसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार क्या नई प्रतिभाओं को नष्ट करने के उत्तरदायी नहीं हैं? साहित्य का विपक्ष तो साहित्य उसी प्रकार है, जिस प्रकार विचार का विपक्ष, प्रति-विचार, सत्ता का विपक्ष राजनीतिक संवाद और नीति-नियम की निरंकुशता का विरोध। राजनीति में विपक्ष किसी भी सत्ता या लोकतंत्र की प्रथम आवश्यकता है। इसे जितना जन-प्रतिनिधि रचता है, उससे अधिक मीडिया, प्रेस और एक समय-चेतस साहित्यकार रचता है। साहित्यकार सभी प्रकार की विद्रूपताओं के विरुद्ध शस्त्र के बजाय शास्त्र या शब्द लेकर खड़ा होता है। वह शब्द की शक्ति को प्रामाणिक और प्रभावशाली बनाता है। खासकर हिंदी का साहित्यकार अगर अपने साहित्य को आलोचक या लोकमंगलकारी हस्तक्षेप बनाता है, तो भाषा की सार्थकता सिद्ध होती है, सृजन से समाज प्रेरित होता है और विचार की दुनिया व्यापक, सहिष्णु और उदात्त होती है। अब जरूरी हो गया है कि हम इतिहास, भूगोल, राजनीति के तिलिस्म से निकल कर शब्द के सत्य में अपना विपक्ष रचें, जिसे निर्मल वर्मा साहित्य का आत्मसत्य कहते हैं।
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First Published on March 12, 2017 4:58 am

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