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अभाव का परिदृश्य

आज बौद्धिकता की आड़ में ऐसी फिल्में खो रही हैं। बौद्धिक फिल्में बच्चों को तेजी से बड़ा कर रही हैं। यह हमारी चिंता का विषय होना चाहिए।
Author March 26, 2017 07:03 am
‘दंगल’ ने बॉक्स ऑफिस पर कई रिकॉर्ड्स तोड़े हैं। ( Photo Source: Twitter)

रवनीत कौर

मुख्यधारा की व्यावसायिक फिल्मों के मुकाबले हिंदी सिनेमा में बच्चों के लिए बनी फिल्मों की संख्या बहुत कम है। हालांकि हर साल कुछ फिल्में बच्चों के लिए बनाई जाती हैं। प्रगतिशील और व्यावसायिक दोनों तरह के फिल्मकार बच्चों को विशेष पात्रों में ढाल कर फिल्मों को मनोरंजक, रोचक और भावना प्रधान बनाने में सफल रहे। वी शांताराम की ‘अमर ज्योति’ (1936) और ‘दुनिया न माने’ (1937) इसका उदाहरण हैं। ऐसी ढेरों पारिवारिक और सामाजिक फिल्में चालीस से साठ के दशक में बनीं, जिनमें बाल कलाकारों को जगह मिली। हनी इरानी जैसे बाल कलाकार घर-घर में लोकप्रिय हुए। कुछ फिल्मकरों ने पटकथा में प्रयोग कर नए ढंग की फिल्में बनार्इं, जिनमें ‘जागृति’, ‘बूट पॉलिश’, ‘काबुलीवाला’, ‘दोस्ती’ हैं। राष्ट्र निर्माण, राष्ट्रवाद, चरित्र निर्माण जैसी परिकल्पना इन फिल्मों में थी।

हिंदी सिनेमा के फिल्मकारों ने जहां एक ओर जिज्ञासा, उल्लास और उम्मीद जैसे भावों से सराबोर बचपन को परदे पर उतारा, वहीं दूसरी ओर हताशा, झुंझलाहट और उलझन भरे बचपन के द्वंद्वों को अनेक कहानियों में दर्शाया है। बच्चों पर बनी इन फिल्मों में दर्शक सामाजिक रिश्ते, मानवता और आध्यात्मिकता को बच्चों के नजरिए से देखते, सुनते और समझते हैं। 1954 में बनी ‘चिल्ड्रेंस फिल्म सोसायटी’ ने अच्छी फिल्मों को बढ़ावा देना और पुरस्कृत करना शुरू कर दिया। तब कई बेहतरीन फिल्मकार, प्रोड्यूसर और वितरक भी सामने आए और बच्चों पर बनने वाली फिल्मों को प्रोत्साहन मिला। इसमें दूरदर्शन की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है, जिसने बच्चों पर बनी फिल्मों को देश के उन इलाकों में पहुंचाया, जहां सिनेमा हॉल की पहुंच नहीं थी।

बच्चों पर बनी फिल्मों में मुख्य भूमिका बच्चों की होनी चाहिए- यह धारणा तभी बनी, जो आज तक कायम है। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार की सूची में लगभग सभी फिल्में इस विचार से मेल खाती हैं। हालांकि जरूरी नहीं कि बच्चे केवल बच्चों पर बनी फिल्में देखना पसंद करते हैं। सिनेमा के इतिहास में एक दौर ऐसा रहा है कि चालीस और पचास के दशक की स्टंट और फैंटेसी फिल्में साठ के दशक में छोटे सिनेमा घरों में री-रिलीज होती रही हैं। मध्यवर्ग के बच्चों के लिए निकट के सिनेमाघरों में कम दर की टिकट लेकर देखना मनोरंजन का एक महत्त्वपूर्ण साधन था।
जादू, तिलस्म, शैतान की जान तोते में, हवाई महल, उड़ने वाला कालीन, तलबारबाजी आदि से भरपूर ये फिल्में तकनीकी दृष्टि से भी दूसरी व्यावसायिक फिल्मों से अलग और दिलचस्प सिनेमेटोग्राफी का इस्तेमाल कर रही थीं।

आज भी ‘हातिमताई’, ‘मिस्टर इंडिया’, ‘अजूबा’, ‘कोई मिल गया’, ‘टार्जन: वंडर कार’ को कल्ट फिल्म कहा जा सकता है। शायद यही वजह रही हो कि चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी ने भी ढेरों फिल्में खेल-तमाशा, जादू, नौटंकी, किस्सों पर आधारित बनाई हैं। ‘मुझसे दोस्ती करोगे’ हमें उसी परंपरा की याद दिलाती है। अब फैंटेसी फिल्मों की जगह एनिमेटेड फिल्में लेने लगी हैं। जबसे मल्टीफ्लेक्स का जमाना आया है और विदेशी फिल्में तेजी से इनमें प्रदर्शित हो रही हैं, बच्चों की फिल्मों को जगह बनाना मुश्किल हुआ है। बड़े बजट की फिल्मों के आगे ये टिक नहीं पा रही हैं। जब हमारे यहां साठ-सत्तर के दशक में साहित्य, पौराणिक कथाएं और शिक्षाप्रद फिल्मों को बच्चों के लिए प्रोड्यूस किया जा रहा था, वहां दूसरी ओर यूरोपीय सिनेमा में बच्चों को ध्यान में रख कर उनके आंतरिक मुद्दों पर फिल्में बनाई जा रही थीं। ‘फ्रेंच न्यू वेब मूवमेंट’ के चलते चार सौ ब्लोज जैसी वास्तविक फिल्म दुनिया भर में फिल्मकारों के लिए बाइबल बन चुकी थी।

शेखर कपूर की ‘मासूम’ आगे चल कर उन ऊंचाइयों को छू सकी। बहरहाल, हमारे यहां एक उपविधा, जिसमें बच्चों की मनोवैज्ञानिक समस्याओं को कुछ हद तक नई कहानियों में समेटा गया, वह रही बच्चे और जानवरों की दोस्ती। ‘राजू और गंगाराम’, ‘सफेद हाथी’, ‘अंकुर’, ‘मैना और कबूतर’, ‘हलो’ फिल्में प्रमुख रहीं। इन फिल्मों की कामयाबी के पीछे मानवता और आपसी भाईचारा जैसे संदेश मुख्य रहे। इस शैली में भी समय के साथ दूसरी उपविधा की तरह बदलाव आया। जहां पहले ‘जागृति’ जैसी फिल्मों में बच्चे सामाजिक कार्यों को सामूहिक ढंग से करते नजर आते थे, वहां अब बच्चे खुद चिंतन और अध्ययन का विषय बनते जा रहे हैं। पटकथाओं का रुझान इस तरफ ज्यादा होता है कि वह बच्चों को समकालीन मुद्दों से ज्यादा जोड़े। अब हम ‘दंगल’ जैसी फिल्मों को ‘इकबाल’ से ज्यादा प्राथमिकता देने को मजबूर हैं, क्योंकि ‘दंगल’ पितृसत्ता को चुनौती देने में सक्षम है।

फिल्मों की अंतर्वस्तु से लेकर अवार्ड तक जाने वाली सीढ़ी कभी-कभी पूर्वनिश्चित-सी लगने लगी है। क्या यह बच्चों के लिए सही और लाभदायक है? एफटीआई से प्रशिक्षिण पाकर कई फिल्मकारों ने जब बच्चों की फिल्में बनाई, तो उनकी शैली में सिनेमाई साहित्य की छाप नजर आई। लेकिन बच्चों के लिए बौद्धिक फिल्में बनाते हुए यह ध्यान रखना होगा कि कहीं अवार्ड पाने की चाह में हम बुनियादी मनोरंजन से समझौता न कर लें। जरूरी नहीं कि केवल चुनिंदा रूपांकनों को बुद्धिमता और परिपक्व का आधार मानें और उसी पर विस्तार करें। भारतीय फिल्मकार कई फिल्म आंदोलनों से प्रभावित रहे। पहले इटैलियन नवयथार्थवाद, फ्रेंच न्यूवेब, फिर इरानी सिनेमा। सिनेमा की कई कहानियों को हमारे समाज की संरचनाओं में ढालना फिल्मकारों के लिए आसान रहा। न केवल सीधे-सीधे रीमेक ‘बम-बम बोले’ की तरह आए, बल्कि प्रेरणा लिए ‘तारे जमीं पर’, ‘तहान’ आदि भी सफल रहीं।

इन सबके बीच विशाल भारद्वाज की ‘ब्लू अम्ब्रेला’ अलग खड़ी है। रस्किन बांड की कहानी पर आधारित यह फिल्म गहरी समझ से इस्तेमाल सिनेमेटोग्राफी, साउंड और कथा को खींच क्षितिज तक ले जाती है। यों इस फिल्म में बच्चों के परिप्रेक्ष्य से मजेदार प्रसंग कम हैं, जिसकी वजह से बड़ों की फिल्म लगती है। लेकिन स्वार्थ, ईष्या, द्वेष जैसे भावों को दिखा कर उन्हें ब्च्चों की चाह से जोड़ फिल्मकार ने बच्चों की फिल्मों को नया विस्तार दिया और उसे सशक्त कर अलग खांचे में रखे जाने को बाध्य किया है। आज बौद्धिकता की आड़ में ऐसी फिल्में खो रही हैं। बौद्धिक फिल्में बच्चों को तेजी से बड़ा कर रही हैं। यह हमारी चिंता का विषय होना चाहिए। अंतर्वस्तु की दृष्टि से देखें तो बुधिया सिंह पर बनी फिल्म ‘दुरंतो’, ‘दंगल’ से हल्की नहीं है। लेकिन ‘दुरंतो’ पुरस्कार तक सीमित रही, जबकि ‘दंगल’ व्यावसायिक रूप से सर्वाधिक हिट फिल्म की श्रेणी में आ गई। समस्याओं की दृष्टि से देखें, तो जो समस्याएं पचास के दशक में मौजूद थीं, आज भी हैं। हिंदी सिनेमा विदेशी फिल्मों की भोंडी नकल करने में लगा है, जबकि जरूरत इस बात की है कि बच्चों की समस्याओं को फिल्म की भाषा में ढालें और उनकी कल्पनात्मक दुनिया को जगाएं। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है।

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