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रविवारीय स्तम्भ

मुक्तिबोध का तीसरा क्षण

मुश्किल यह है कि कविता लिख चुकने के अनंतर, उसी कविता में समाई किंतु उससे बृहत्तर, विशालतर कविता अपने स्वरूप का विकास करती हुई...

चर्चा- श्रम और संघर्ष का स्वर

मध्यकालीन अभिरुचि संपन्न और वाद के विमर्शवादी छोटे रास्ते से पैदा होने वाले चिंतकों-विचारकों के लिए मुक्तिबोध की कविताएं समस्या पैदा करती हैं।

बाखबर: यह छोड़ो वह छोड़ो

उपराष्ट्रपति चुनाव के नतीजे वाले दिन एक हिंदी चैनल पूरे दिन यह शीर्षक लगाए रहा: ‘कांग्रेस मुक्त भारत’! एंकर कहती थी कि राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति...

तीरंदाज- डोकलाम की बिसात

यह स्वाभाविक है कि लद्दाख में घुसपैठ की कोशिश के बाद वह डोकलाम जैसे संवेदनशील इलाके में अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश करेगा...

वक्त की नब्ज- शिक्षा की खोखली बुनियाद पर

आज हाल यह है कि हमारे बच्चे जब कुछ वर्ष पहले अंतरराष्ट्रीय पीसा स्पर्धा में भाग लेने गए तो इतना बुरा हाल रहा उनका...

दूसरी नज़र: सत्तरवें साल में अर्थव्यवस्था की हालत

कल्पना करें कि 1947 में देश के शासन की बागडोर थामना कितना बड़ा उत्तरदायित्व रहा होगा, जब 83 फीसद लोग निरक्षर थे, जन्म के...

अली अनवर: यह तो तख्तापलट जैसा हो गया!

किसान खुदकुशी कर रहे हैं, लव जेहाद चल रहा है। घर वापसी, गोरक्षा वगैरह के नाम पर उत्पात मचाया जा रहा है। इस सब...

न था, न है, न होगा

गजब की मिलीभगत लगी चैनलों की कि न चुनाव, न अभियान और रिजल्ट दे दिया नीतीश जी ने कि दो हजार उन्नीस में मोदी...

वक्त की नब्ज- भुलाने की कोशिश में दर्द बढ़ता गया

इस प्रयास में मैंने खुद जाकर मेरठ-मलियना के दंगे देखे। मुरादाबाद, भागलपुर और मुंबई के दंगों को भी मैंने अपनी आंखों से देखा है...

दूसरी नजर- जरूर होगा प्रतिकार का उभार

मैं ऐसे लोगों की गिनती कर रहा हूं जिन्होंने हथियार डाल दिए हैं। बुधवार, 26 जुलाई 2017 को यह नीतीश कुमार थे जिन्होंने अपनी...

बाजार में दुर्दशाग्रस्त अनुवाद

व्यापारिक क्षेत्र में अनुवाद ने जिस तरह पैर पसारे हैं, उसे एक सीमा तक ठीक कहा जा सकता है। भाषा की बोधगम्यता का परीक्षण...

विकास की बुनियाद में भाषांतरण

इसमें संदेह नहीं कि विश्व की सभ्यताओं और संस्कृतियों के विकास और परस्पर आदान-प्रदान में अनुवाद की विशेष भूमिका रही है। विभिन्न सभ्यताओं और...

सुबह विपक्ष नाराज होता है, दोपहर बाद सीरियस हो जाता है!

एआइबी की फुलफार्म इतनी गंदी है भाईसाब कि मैं टीवी पर बोल तक नहीं सकता। इनको हवा क्यों देते हो।

नाद का आनंद

इन्हीं के सम्मिश्रण से चराचर का उद्भव हुआ। इस सृष्टि के अभ्युदय के इस सिद्धांत से सभी सहमत हैं, चाहे वे ब्रह्मज्ञानी हों या...

वक्त की नब्ज- चुनौती भरे दिन

फर्क सिर्फ यह है कि उस साल सब कहते थे कि अटल बिहारी वाजपेयी किसी हाल में नहीं चुनाव हार सकते और इस बार...

दूसरी नजर: गरीब सपने न देखें

वर्ष 2005 में मैंने तथाकथित शिक्षा-ऋण नीति की पड़ताल शुरू की। मैंने पाया कि ये ऋण गरीबों को अमूमन नहीं मिल पाते थे। गरीबों...

फुंदनों की लीला

कोसने से बचाया तो उस आक्रमित बस के ड्राइवर सलीम शेख ने बचाया। वह सभी चैनलों का हीरो था। सब उसे सलाम करते थे।...

हरकत में बरकत

यूरोप के कई देश जैसे ब्रिटेन, फ्रांस, पुर्तगाल, स्पेन, जर्मनी और यहां तक कि बेल्जियम और आस्ट्रिया विश्व मंच पर अपना दबदबा तभी बना...

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