January 18, 2017

ताज़ा खबर

 

रविवारीय स्तम्भ

लोकप्रियता के मौजूदा मरहले

आज फिल्मों की लोकप्रियता का पैमाना आमूल-चूल बदल गया है। ताजा पैमाना ‘सौ करोड़’ वाला है।

सिनेमा की सामाजिक प्रतिबद्धता

किताबों की तुलना में सिनेमा विचारों के संचार का ज्यादा सशक्त माध्यम है। इसका उदाहरण हम विज्ञान के नए दर्शन के संचार से देख...

देशभक्ति: एक जली हुई रोटी

क्या इसी सेना की असलियत छिपाने के लिए भक्त दनदनाते रहते थे कि सेना पर सवाल न करें, क्या इसीलिए सवाल न करें! सवाल...

तीरंदाज: अज्ञान का विज्ञान

वैज्ञानिक तथ्यों को वैज्ञानिक तरीके से काटा नहीं जा सकता था, इसलिए सिगरेट निमार्ताओं ने कुछ अलग ही सोचा।

गुरबत, गरीबनवाज और खैरात

गरीबी तब समाप्त होती है किसी देश में जब उससे लड़ने के औजार गरीबों के हाथों में दिए जाते हैं। औजारों की फेहरिस्त लंबी...

‘स्लो डाउन इंडिया’ के लिए तैयार रहें

आर्थिक वृद्धि के चार इंजन हैं: सरकारी खर्च, निजी खपत, निजी निवेश और निर्यात।

बदलती पुस्तक संस्कृति : संवाद का विस्तार और तकनीक

हली बार लिखा पीले पड़ गए कागजों वाला ‘ग्रंथ’ ‘पांडुलिपि’ कहलाया- भावी ग्रंथों, किताबों का ‘प्रोटोटाइप’।

बदलती पुस्तक संस्कृति : किताब की जगह

संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन के बाद अंगरेजी पुस्तकों के प्रकाशन में भारत का दुनिया में तीसरा स्थान है।

बदलती पुस्तक संस्कृति : संकट का सिरा

बचपन के साहित्यिक संस्कार के कारण ही पहले विभिन्न पेशों से जुड़े लोगों का साहित्य से ताउम्र रिश्ता बरकरार रहता था। आज साहित्य मुख्य...

दूसरी नज़र : रिजर्व बैंक की स्वायत्तता किधर

वर्ष 1929 में दुनिया ने महामंदी के रूप में एक अप्रत्याशित आर्थिक संकट झेला था।

वक़्त की नब्ज़ : उम्मीद की सूरत

पर्यटन ने कई देशों को गुरबत से निकाल कर अमीर बना दिया है। सो, अगर हमारे शासकों ने बहुत पहले से विदेशी पर्यटकों को...

बाख़बर : मेरी दोस्ती मेरा प्यार

चैनलों को बंगलुरू का पातक नजर आता है, लेकिन ऐन दिल्ली में पुराने नोट लौटाने आई उस औरत की कहानी एक मिनट से ज्यादा...

समाज : संदेह में जीता समय

आज कितनी अपराधग्रस्त होती जा रही है। अपराधी देह और निरपराध देह में बंट गया है समाज।

जनसत्ता बिरादरी: केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री संतोष गंगवार से बातचीत

नोटबंदी के फैसले को लेकर तरह-तरह के सवाल उठे हैं। कहा गया कि सरकार ने यह फैसला बिना किसी तैयारी के कर डाला। मगर...

बाखबर: सोलह के सर बिग ब्रदर

जीवन हो पारदर्शी पारदर्शी पारदर्शी पारदर्शी पारदर्शी पारदर्शी पारदर्शी पारदर्शीइतना पारदर्शी कि बिग ब्रदर की नजर से कुछ न बचे!

तीरंदाज: नएपन की तलाश

संपूर्ण क्रांति आई और चली गई। साए में भी धूप लगने लगी, दीवारें पर्दे की तरह हिलती रहीं और लोग पेट और पीठ के...

वक्त की नब्ज: नया साल, पुरानी चुनौतियां

नए साल के पहले दिन एक ही भविष्यवाणी की जा सकती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लंबे राजनीतिक जीवन का यह सबसे महत्त्वपूर्ण...

दूसरी नज़र कॉलम: क्या 2017 खुशनुमा साल होगा?

हमें खुश होना चाहिए कि भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर, सरकार के मुताबिक, 2014 और 2015 में 7.4 फीसद रही।

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