February 19, 2017

ताज़ा खबर

 

रविवारीय स्तम्भ

उड़ने न पाए थे कि गिरफ्तार हुए

प्रगतिशील लेखक संगठन इतने पस्त हिम्मत, टूटे-बिखरे और दिग्भ्रमित शायद कभी नहीं थे। आगाज के दिनों में प्रगतिशील आंदोलन की व्यापकता की तुलना भक्ति...

मौजूदा दौर में लेखक संगठन

स्वीकार करना होगा कि राजनीतिक दलों की वोट बैंक की राजनीति की बाध्यता के चलते अपनी प्राथमिकताएं और व्यूहरचना होती है।

लेखक संघों की हकीकत

जब संगठन में ही शक्ति है, तब लेखकों का भी संगठन क्यों नहीं होना चाहिए? होना चाहिए, तभी तो 1936 में ह्यप्रगतिशील लेखक संघ...

बाखबर: न पीऊंगा न पीने दूंगा

तमिल राजनीति ने अभिव्यक्ति की आजादी के हामी एंकरों, रिपोर्टरों तक को विभाजित कर दिया! लगभग हर बाइट शशिकला को खलनायिका बनाती रही।

वक्त की नब्ज़: शशिकला वाया सियासी कला

सुप्रीम कोर्ट ने उनको पिछले सप्ताह जेल न भेज दिया होता आय से अधिक संपत्ति के मामले में दोषी पाने के बाद, तो मुमकिन...

हाशिये का सौंदर्यबोध

इस त्रासदी का विरोध वर्ण-व्यवस्था के जन्म के साथ ही शुरू हो गया था। इस प्रतिरोध में चार्वाक-लोकायत से लेकर आजीवक, जैन, बौद्ध जैसे...

दूसरी नज़र: अन्नाद्रमुक का उत्थान और पतन

सुप्रीम कोर्ट के सामने आए मामले में, जयललिता और अन्य पर, 1991-96 के कार्यकाल के दौरान आय से अधिक संपत्ति जमा करने के आरोप...

किसका भारंगम

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय दुनिया का अकेला ऐसा शिक्षण संस्थान है, जो जनता के टैक्स से सरकारी अनुदान पर चलता है, लेकिन उसे न तो...

भारत रंग महोत्सव: एक पुनर्विचार

भारत रंग महोत्सव जिसे हम भारंगम के नाम से भी जानते हैं, उसकी शुरुआत 1999 में हुई थी।

तीरंदाज: विचारों के टकराव में बिखरती दुनिया

वास्तव में आज हमारे आपके सामने और पूरी दुनिया के सामने एक भयावह स्थिति मुंह बाए खड़ी है।

बाखबर: दिव्य वचनामृतम्

पूरे सप्ताह अपनी रैलियों में पीएमजी दहाड़ते दिखे हैं। उनके भक्त अब भी मोदी मोदी चिल्लाते दिखे हैं, लेकिन कुछ कम मात्रा में! भीड़...

वक्त की नब्ज: साहसिक कदम की जरूरत

मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने विदेशी दौरों में कई बार कहा कि वे भारत को ऐसा देश बनाना चाहते हैं, जिसे नौजवानों...

दूसरी नज़र: सिकुड़न का बजट

यूपीए-1 के दौरान हमने विकास के लिए आर्थिक वृद्धि दर को बढ़ाया, जो कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार (1999-2004) के समय औसतन 5.9 फीसद...

‘हंस’ के संपादक संजय सहाय का इंटरव्यू, कहा- क्रांति का औजार नहीं साहित्य

साहित्य और समाज के संबंध पर विमर्श सदियों पुराना है। इस बार बारादरी के मेहमान प्रतिष्ठत साहित्यिक पत्रिका ‘हंस’ के संपादक संजय सहाय से...

बिसरती देसी ज्ञान परंपरा

वैश्वीकरण और सूचना क्रांति के इस युग में बैलगाड़ी की पैरवी करना निहायत पिछड़ापन माना जा सकता है।

बाखबर, सुधीश पचौरी का कॉलम: बजट का शेर और बब्बर शेर

बसंती मूड में वे सीरियसली समझाते रहे कि बजट किस तरह गांव, गरीब और विकास के लिए प्रतिश्रुत है! विपक्ष ने बिलकुल नहीं टोका...

वक्त की नब्ज कॉलम में तवलीन सिंह का लेख: बदहाली के गांव

नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में मनरेगा जैसी योजनाओं को बेकार बताया, लेकिन उसके बाद इन्हीं योजनाओं पर फिर से निवेश...

दूसरी नजर: किसी तरह पार लगी बजट की नैया

बजट का दिन आया और गया। अधिकतर लोगों को न तो आंकड़े याद रहेंगे न वाकचातुर्य भरे पद और शेरो-शायरी।

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