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Film Review प्यार का पंचनामा 2: पुरुषवाद की आधुनिकता

Pyaar Ka Punchnama 2 review- ये फिल्म प्यार का पंचनामा' का स्वीक्वेल है और उसी की तरह युवा वर्ग की मानसिकता को लेकर बनाई गई है। इसमें तीन दोस्त हैं- अंशुल यानी गोगो (कार्तिक आर्यन), सिद्धार्थ यानी चौका (सनी सिंह) और तरुण यानी ठाकुर (ओंकार कपूर), तीनों इकट्टे यानी एक ही फ्लैट में रहते हैं मौज मस्ती और पाटिर्यां करते रहते हैं।
Movie Review- प्यार का पंचनामा 2

प्यार का पंचनामा 2

निर्देशक- लव रंजन

कलाकार-कार्तिक आर्यन, सोनाली सहगल, नुसरत भरूचा, इशिता शर्मा, सनी सिंह निज्जर, ओंकार कपूर

ये फिल्म प्यार का पंचनामा’ का स्वीक्वेल है और उसी की तरह युवा वर्ग की मानसिकता को लेकर बनाई गई है। इसमें तीन दोस्त हैं- अंशुल यानी गोगो (कार्तिक आर्यन), सिद्धार्थ यानी चौका (सनी सिंह) और तरुण यानी ठाकुर (ओंकार कपूर), तीनों इकट्टे यानी एक ही फ्लैट में रहते हैं मौज मस्ती और पाटिर्यां करते रहते हैं।

धीर धीरे तीनों की जिंदगी में लड़कियां आती हैं। अंशुल को मिलती है चीकू जिसका असल नाम रुचिका है। सनी की जिंदगी में सुप्रिया (सोनाली) आती है और तरुण की दिलरूबा बनती है कुसम (इशिता)। तीनों लड़के अपनी अपनी गर्लफ्रंड के साथ डेटिंग-शेटिंग शुरू कर देते हैं, उनको डिनर पर ले जाते हैं और पाटिर्ओं में भी।

पर ये क्या? तीनों को लगने लगता है उनकी गर्लफ्रेड उनके ऊपर हावी भी होती जा रही है और पूरी तरह उनसे प्यार नहीं करती। अंशुल को देखता कि चीकू एक तरफ तो उससे प्यार करने की कसमें खाती हैं लेकिन अपने फ्लैट में एक और लड़के को रखे हुए है। सिद्धार्थ को लगता है कि सुप्रिया शादी किसी और से करना चाहती है और उसका इस्तेमाल सिर्फ घर का राशन लाने में करती हैं और तरुण पाता है कि कुसुम उसके क्रेडिट कार्ड से पैसे निकाल चुकी है और बहुत ही ज्यादा मनी माइंडेड है। और जब शक इतना बढ़ जाए तो प्यार का तो पोस्टमार्टम हो ही जाएगा। है कि नहीं।

जिस ढंग से लड़कियों को पूरी फिल्म में दिखाया गया है उससे लगता है कि निर्देशक पर पुरुषवादी सोच हावी है और उसका मानना है कि आज कल की लड़कियां बॉयफ्रेंड इसलिए रखती हैं कि वे घर का काम कर सकें औ? उनकी मम्मी पापा के काम में हाथ बटा सकें। यानी लड़कियों को ज्यादा कैरियरिस्ट और अवसरवादी दिखाया गया है और लड़कों को असली रोमाटिंक छवि का।यानी आज की गर्लफ्रेंड अपने बॉयफ्रेंड का सिर्फ फायदा उठाती हैं।

इस वैचारिक पहलु को छोड़ दिया जाए तो ये फिल्म आज के जमाने के युवा वर्ग की भाषा और लाईफस्टाल अपने खास अंदाज में पेश करती हैं। इसमें एक जगह अशुंल का स्पीच है, जो लंबा है और ल़ड़कियों के प्रति खुन्नस ले भरा भी, अपनी नाटकीयता के कारण रोचक भी हैं। अगर आप फेमिनिस्ट सोत वालियों को पसंद नहीं करते तो फिल्म अच्छी लगेगी।

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