December 09, 2016

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31 अक्तूर फिल्म रिव्यू: बत्तीस वर्ष बाद त्रासदी की फिर से याद

31 अक्तूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके दो सुरक्षाकर्मियों ने कर दी थी और उसके बाद दिल्ली में सिख विरोधी दंगे शुरू हो गए थे।

निर्देशक- शिवाजी लोटन पाटिल

कलाकार- सोहा अली खान, वीर दास, विनीत शर्मा, दीपराज राणा, नागेश भोंसले

1984 में दिल्ली में हुए सिख विरोधी दंगों पर आधारित ‘31 अक्तूबर’ अपनी कई कमजोरियों और तकनीकी खामियों के बावजूद दिल को छूती है। 31 अक्तूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके दो सुरक्षाकर्मियों ने कर दी थी और उसके बाद दिल्ली में सिख विरोधी दंगे शुरू हो गए थे। आज उस घटना के 32 साल बीत चुके हैं। लेकिन त्रासदियां तारीख से नहीं नापी जातीं और हमेशा लोगों की याद में बनी रहती हैं। इसलिए अस्वाभाविक नहीं है कि 1984 के उस वाकये पर आज फिल्म बने। ‘31 अक्तूबर’ में वीर दास और सोहा अली खान ने देविंदर सिंह और तेजिंदर कौर नाम के ऐसे सिख दंपति की भूमिका निभाई है जो उन दंगों में फंस गया था और जिसे उनके हिंदू दोस्तों ने उनके यहां से निकाल कर अपने यहां रखा। फिल्म एक दंगाई वक्त में लोगों के भीतर बढ़ते उन्माद और उससे भड़की हिंसा को दिखाती है। और ये भी कि ऐसे वक्त में किस तरह पुलिस और प्रशासन भी उन्मादी मानसिकता के शिकार हो जाते हैं।

फिल्म 31 अक्तूबर 1984 की सुबह दिल्ली के तिलक नगर इलाके में शुरू होती है जब देविंदर सिंह अपने दो बच्चों को स्कूल भेजने की तैयारी कर रहा होता है और उसकी पत्नी तेजिंदर उसकी मदद करती है। जब देविंदर आॅफिस पहुंचता है तो माहौल बदल चुका है क्योंकि इंदिरा गांधी की हत्या हो चुकी है और सिखों को खिलाफ कुछ लोग

द्वेष भड़काने में लगे हैं। रात होते-होते देविंदर और उसका पूरा परिवार भय के साए में आ जाता है। उन्हें बचाने तीन हिंदू अपनी जान पर खेलते हुए निकलते हैं और इसमें एक की जान चली जाती है। फिल्म एक उन्मादी वक्त में कई तरह के हादसे दिखाती है। जैसे किस तरह आपका सगा आपकी आंखों के सामने मारा जाता है और आप रो भी नहीं सकते क्योंकि डर है कि आपको भी पहचान के आधार पर मार न दिया जाए। तेजिंदर का अपना बहनोई उसकी आंखों के सामने मारा जाता है लेकिन अगर वह उसे बचाने की कोशिश करती तो खुद भी मारी जाती। वह किसी तरह रुलाई को पी जाती है। इस तरह की कुछ और घटनाएं हैं जो ये दिखाती हैं कि सामहिक जुनून के समय आदमी किस तरह मानवीय रिश्ते भूल जाता है। पर कुछ ऐसे भी होते हैं जो उन रिश्तों याद रखते हैं। दोनो पक्ष फिल्म में हैं। बेहतर होता फिल्म की गुणवत्ता प्रोडक्शन के स्तर पर और अच्छी होती। लेकिन ये याद रखने की बात है ये फिल्म किसी एक निजी प्रयास से बनी है किसी फिल्म निर्माण कंपनी के बैनर तहत नहीं। ये व्यावसायिक सफलता के लिए बनाई ही नहीं गई है।

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First Published on October 24, 2016 2:24 pm

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