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वो तो तुमसे जुड़ना चाहते हैं पर क्या तुम उनमें अंगीकार होना चाहते हो?

जब हम एक दूसरे को देखते हैं तो मेरे तुम्हारे बीच में एक रेखा खिंच जाती है। यदि तुम और मैं एक लकीर में नहीं हैं तो एक दूसरे को देख नहीं सकेंगे।
भक्ति मार्ग अपने भावों की, अनुभूतियों की टेक्निकल व्याख्या नहीं कर पाता। वो तो बस उस रस में डूब जाना चाहता है।

सुनना और देखना दो अलग-अलग प्रक्रिया हैं। सुनने और देखनें मे यही बड़ा फर्क है। तुम किसी धुन को कहीं भी रहकर सुन सकते हो। उसके समक्ष तुम्हारी उपस्थिति अनिवार्य नहीं है। पर देखने के साथ यह बात नहीं है। देखने की क्रिया समक्ष ही सम्भव है। यह क्रिया सीधी होती है। एक लकीर में। मैं आपको देख रहा हूं, आप मुझे, इसके लिए सीधा होना या समक्ष होना जरूरी है, अनिवार्य है।

जब हम एक दूसरे को देखते हैं तो मेरे तुम्हारे बीच में एक रेखा खिंच जाती है। यदि तुम और मैं एक लकीर में नहीं हैं तो एक दूसरे को देख नहीं सकेंगे। इसलिए अंतर्दृष्टि को भी जागृत करने के लिए सीधा देखना पड़ता है। ध्यान में तुम आज्ञाचक्र से सीधे देखते हो, तीसरे तिल की ओर। पर महाध्वनि के साथ ऐसा नहीं है। महाशब्द कर्व्ड है, घूमे हुये हैं। सर्क्युलर हैं, गोलाकार। वह स्ट्रेट नहीं हैं, पंक्तिबद्ध नहीं हैं। धुन या नाद झूम के आती है, घूम के आती है, गोलाई में, और तुम्हारी जीवात्मा उनका केंद्र है, सेंटर। इसीलिए शब्दों में भींगने के बाद यदि स्वयं पर नियंत्रण न हो तो व्यक्ति झूमने लगता है, नाचने लगता है। उसका जीवन नृत्य बन जाता है। इसलिये भक्ति मार्ग में लोग थिरक उठते हैं।

भक्ति मार्ग अपने भावों की, अनुभूतियों की टेक्निकल व्याख्या नहीं कर पाता। वो तो बस उस रस में डूब जाना चाहता है। पर शब्दयोग उस महानाद की टेक्नॉलजी भी समझता है, और महाआनन्द में सराबोर भी कर देता है। इसलिये भजन में तुम अंतर्कर्ण यानि भीतर के कानों से सुनने में तुम ध्यान की तरह सीधे नहीं सुनते। बस, ज़ोर देकर, ऊपर चढ़कर उन महाशब्दों के आने की प्रतीक्षा करते हो। उतरने का इंतज़ार करते हो। तुम उन शब्दों को आमंत्रित नहीं कर सकते। उन्हें अपने पास बुलाने का कोई विधान नहीं है।

वेब डिवाइस के पास आती हैं। डिवाइस चाहे तो भी वेब के पास नहीं पहुंच सकता। बस डिवाइस को सेटिंग में परिवर्तन करके उपलब्ध रहना है। अपने लॉक यानि ताले से बाहर निकल कर उन तरंगों को उतरने की अनुमति भर देना है। बस, डिवाइस कनेक्ट हो जायेगा। इसी तरह से वो महानाद ही तुम्हें खींचता है। तुम उन्हें नहीं खींच सकते। तुम यहां सत्संग में बैठे ही उन ध्वनियों की मौज से, उस महावाणी इच्छा से। तुम मुझसे जुड़े ही हो उनकी कृपा से। तुम जहां भी हो, तुम और तुम्हारी जीवात्मा सदा सर्वदा उन महाशब्द का लक्ष्य है। समूचे ब्रह्मांड का केंद्र है। आजमा के तो देखो..। श्रवण करके तो देखो..। तुम्हे लगेगा कि वह शब्द वर्तुल में तुम्हारी ओर ही मुखातिब हैं..। आकृष्ट है। तुम्हें ही सम्बोधित कर रहे हैं। वो तो तुमसे जुड़ना चाहते हैं..। तुम्हे खुद से जोड़ना चाहते हैं..। पर क्या तुम उसमें अंगीकार होना चाहते हो।

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