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संक्रांति 2017: सत्तू खाकर मनाएं मेष संक्रांति

हिंदू संस्कृति में मेष संक्रांति का काफी महत्व है।
Author April 13, 2017 00:04 am
मेष संक्रांति।

गौरव मित्तल  

सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने के दिन को मेष संक्रांति के रूप में मनाया जाता है । उत्तर भारत में इसे ‘सतुआ संक्रांति’ के नाम से जाना जाता है । सोलर कैलेंडर को मानने वाले लोग इसी दिन से नव वर्ष का आरंभ मानते हैं…

प्रत्येक माह में एक संक्रांति आती है और सबका अपना एक अलग महत्व होता है। प्रत्येक माह की संक्रांति एक अलग नाम से जानी जाती है। जिस राशि में सूर्य प्रवेश करता है, उसी राशि के अनुसार प्रत्येक संक्रांति का नामकरण किया जाता है अर्थात् जब सूर्य मकर राशि में जाता है तो मकर संक्रांति होती है, मीन में जाता है तो मीन संक्रांति।

वैशाख माह में सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है इसलिए वैशाख माह की संक्रांति को मेष संक्रांति के नाम से जाना जाता है। हर बार संक्रांति नए पक्ष के आरंभ होने के अगले दिन मनाई जाती है। हिंदू संस्कृति में मेष संक्रांति का काफी महत्व है। इस दिन से खरमास की समाप्ति तथा मंगल कार्यों की शुरुआत हो जाती है। यह दिन सांस्कृतिक एकता का बीज विपनन करने का दिन है। आम के फल के सेवन की शुरुआत भी इसी दिन से करने की मान्यता है। साथ ही यह दिन पवित्र नदियों में स्नान एवं दान-पुण्य के लिये बड़ा अच्छा माना गया है । इस दिन स्नान पूजन के बाद सत्तू, जल से भरा घड़ा, ताड़ का पंखा इस विश्वास से दान किया जाता है कि अगले जन्म में गर्मी के समय उन्हें भी इन चीजों का सुख मिलेगा। मेष संक्रांति का यह पर्व उत्तर भारत में ‘सतुआ संक्रांति’ के नाम से जाना जाता है क्योंकि इस दिन जौ या चने का सत्तू खाने का रिवाज है। आज के दिन सात्विक चीजों का सेवन किया जाता है और भगवान को भी इन्हीं चीजों का भोग लगाया जाता है। इस दिन सत्यनारायण की पूजा का विधान है।

सोलर कैलेंडर को मानने वाले लोग मेष संक्रांति के दिन, यानि सूर्य के मेष राशि में प्रवेश करने के दिन को नव वर्ष आरंभ के रूप में मनाते हैं। बंगाल में इस दिन को ‘नाबा वैशाख’ या ‘पोइला वैशाख’, बिहार में ‘सतुआन’, केरल में ‘विशु’, असम में ‘बिहू’, पंजाब में ‘वैशाखी’, तमिलनाडु में ‘पुदुवर्षम’, उड़ीसा में ‘पाना संक्रांति’, तमिलनाडु में ‘पुथाण्डु’, मिथिलांचल में ‘सतुआनि’ और ‘जुड़ि शीतल’ के नाम से मनाया जाता है। बंगाल के लोग संक्रांति के एक दिन पहले ‘पांतो भात’ करते हैं, यानि रात में भात बनाकर रख देते हैं और सुबह उस भात में नमक मिर्च मिलाकर खाते हैं। वहां के लोग मानते हैं कि गर्मी में ‘पांतो भात’ खाने से तन शीतल और मन प्रसन्न रहता है। यहां के व्यापारी लोग इस दिन लाल रंग के वस्त्र में नया बही-खाता लपेटकर सुबह नहाने के बाद सबसे पहले मंदिर में जाकर भगवान के समक्ष प्रस्तुत होते हैं और वहां अपने व्यापार की समृद्धि के लिये भगवान से आशीर्वाद लेते हैं। सतुआ संक्रांति के दिन दोपहर के समय बांसा खाना खाने का भी रिवाज है। इस दिन घर में शाम से पहले चूल्हा-चैका नहीं किया जाता। ऐसा माना जाता है कि आज के दिन रसोई से जुड़ी सभी चीजों को आराम करने का मौका दिया जाता है। इस समय से गर्मी का आरंभ पूरी तरह से हो चुका होता है, इसीलिए आज के दिन ऐसी चीजों का सेवन किया जाता है जो गर्मी के लिहाज से फायदेमंद होती हैं।

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