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अहोई अष्टमी पूजा विधि 2017: जानिए किस विधि का प्रयोग करके कर सकते हैं अहोई माता को प्रसन्न

Ahoi Ashtami 2017 Puja, Vrat Vidhi: इस दिन व्रत करने वाली महिलाएं घर की दीवार पर अहोई का चित्र बनाती हैं। संतान की सलामती से जुड़े इस व्रत का बहुत महत्व है। भारत एक त्योहारों का देश है और इस बार अक्टूबर माह में सभी त्योहार आ रहे हैं।
Ahoi Ashtami 2017 Puja Vidhi: इस व्रत को हर महिला अपने बच्चे के स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए करती हैं।

भारत एक त्योहारों का देश है और इस बार अक्टूबर माह में सभी त्योहार आ रहे हैं। करवाचौथ के बाद अब सभी को दिवाली का इंतजार रहता है। लेकिन इससे पहले कार्तिक माह की अष्टमी के दिन आता अहोई अष्टमी का व्रत। उत्तर भारत में ज्यादा इस व्रत का प्रचलन है। इस द‍िन अहोई माता की पूजा की जाती है। इस दिन माताएं अपने बच्चों की लंबी उम्र के लिए निर्जला व्रत रखती हैं। उत्तर भारत में और विशेष रूप से राजस्थान में महिलाएं बड़ी निष्ठा के साथ इस व्रत को करती हैं। इस दिन व्रत करने वाली महिलाएं घर की दीवार पर अहोई का चित्र बनाती हैं। संतान की सलामती से जुड़े इस व्रत का बहुत महत्व है। इस व्रत को हर महिला अपने बच्चे के स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए करती हैं। कुछ महिलाएं इस व्रत को संतान की प्राप्ति के लिए भी करती हैं। अहोई माता की पूजा से माता प्रसन्न होकर संतान की लंबी आयु और समृद्धि का वरदान देती हैं और जो दंपती निसंतान होते हैं उन्हें माता संतान का वरदान देती हैं।

अहोई अष्टमी पूजा विधि-
व्रत के दिन प्रात: उठकर स्नान किया जाता है और पूजा के समय ही संकल्प लिया जाता है कि “हे अहोई माता, मैं अपने पुत्र की लम्बी आयु एवं सुखमय जीवन हेतू अहोई व्रत कर रही हूं। अहोई माता मेरे पुत्रों को दीर्घायु, स्वस्थ एवं सुखी रखें।” अनहोनी से बचाने वाली माता देवी पार्वती हैं इसलिए इस व्रत में माता पर्वती की पूजा की जाती है। अहोई माता की पूजा के लिए गेरु से दिवार पर अहोई माता का चित्र बनाया जाता है और साथ ही स्याहू और उसके सात पुत्रों का चित्र भी निर्मित किया जाता है। अहोई माता के सामने चावल की कटोरी, मूली, सिंघाड़े रखा जाता है और दीपक जला कर कथा का पाठ किया जाता है। कथा कहते और सुनते समय चावल हाथ में लिए जाते हैं और पूजा के बाद उन्हें साड़ी/ सूट के दुप्पटे में बांध लिया जाता है।

सुबह पूजा करते समय लोटे में पानी और उसके ऊपर करवे में पानी रखते हैं। ध्यान रहे कि वही करवा लें जो करवाचौथ में इस्तेमाल किया हुआ होना चाहिए। इस करवे का पानी दिवाली के दिन पूरे घर में भी छिड़का जाता है। शाम के समय में सुबह बनाए गए चित्रों की पूजा की जाती है। पके खाने में चौदह पूरी और आठ पूड़ियों का भोग अहोई माता को लगाया जाता है। उस दिन बयाना निकाला जाता है| बायने में चौदह पूरी या मठरी या काजू होते हैं। लोटे का पानी शाम को चावल के साथ तारों को आर्ध किया जाता है। अहोई पूजा में एक अन्य विधान यह भी है कि चांदी की अहोई बनाई जाती है जिसे स्याहू कहते हैं। इस स्याहू की पूजा रोली, अक्षत, दूध व भात से की जाती है। पूजा चाहे आप जिस विधि से करें लेकिन दोनों में ही पूजा के लिए एक कलश में जल भर कर रख लें। पूजा के बाद अहोई माता की कथा सुने और सुनाएं। पूजा के पश्चात घर के बड़ों का आर्शीवाद लिया जाता है और इसके बाद व्रत खोला जाता है।

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