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जानिए, महाभारत में दुशासन वध की कहानी

युद्ध के दौरान भीम ने दुःशासन की बांह को शरीर से उखाड़कर दिया और फिर उसकी छाती चीरकर रक्त निकाल दिया।
सांकेतिक फोटो

धर्म शास्त्र महाभारत के अनुसार कौरवों की एक सभा में दुर्योधन के छोटे भाई दुःशासन ने द्रौपदी का चीरहरण किया। दुःशासन की इस गलत हरकत के बाद द्रौपदी ने प्रतिज्ञा की कि वो तब तक अपने केश नहीं बांधेगी जब तक अपने बालों को दुःशासन की छाती के रक्त से ना धो लें। भीम ने दौपदी की इच्छा को पूरा करने का वादा किया। युद्ध के दौरान भीम ने दुःशासन की बांह को शरीर से उखाड़कर दिया और फिर उसकी छाती चीरकर रक्त निकाल दिया।

रक्तों को अपने हाथों में लेकर भीम दौपदी के पास पहुंचे और दुःशासन की छाती का खून दौपदी को दिया, जिसके बाद उन्होंने रक्त को अपने बालों पर लगाया और प्रतिज्ञा पूरी की। कहा जाता है कि युद्ध शुरु होने के पहले दिन से ही दौपदी दुशासन के वध का इंतजार कर रही थी।

युद्ध खत्म होने के बाद सभी पांडव धृतराष्ट्र से मिलने गए। दुर्योधन को मौत से धृतराष्ट्र दुखी थे, यही कारण था कि वो भीम को मारना चाहते थे। धृतराष्ट्र ने भीम को गले लगाने की इच्छा जताई। लेकिन श्रीकृष्ण इस बात को जानते थे कि धृतराष्ट्र के इरादे ठीक नहीं हैं। इसलिए श्री कृष्ण के कहने पर लोहे की प्रतिमा को आगे कर दिया गया। धृतराष्ट्र ने भीम समझकर लोहे की प्रतिमा के टुकड़े- टुकड़े कर दिए। धृतराष्ट्र को लगा कि उन्होंने भीम का वध कर दिया है। इसलिए वो दुखी हुए।

कुछ देर के बाद जब धृतराष्ट्र शांत हुए तो श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया कि भीम अभी जीवित है और उन्होंने लोहे की प्रतिमा को नष्ट किया है। श्री कृष्ण की यह बात सुनकर धृतराष्ट्र को शांति हुई। कहा जाता है कि दुर्योधन के वध के बाद युद्ध खत्म हो गया और युधिष्ठिर को राजा बना दिया गया। कई सालों तक धृतराष्ट्र और गांधारी पांडवों के साथ रहे। नकुल, सहदेव और अर्जुन ने सदा धृतराष्ट्र को सम्मान दिया। ये तीनों इनकी सेवा करते रहते थे।

लेकिन कुछ साल बाद साथ रहने के बाद कुछ ऐसा हुआ जिसके कारण धृतराष्ट्र और गांधारी ने जंगल में जाने का फैसला किया। राजा धृतराष्ट्र की आज्ञा लेकर धृतराष्ट्र और गांधारी जंगल जाने लगे तो विदुर, संजय व कुंती ने भी साथ चलने का फैसला किया। धृतराष्ट्र ने मनाने की कोशिश की। लेकिन कुंती ने बात नहीं मानी और सभी लोग वन में चले गए।

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