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…तो क्‍या ”महाभारत” में छल से मारा गया था अश्‍वत्‍थामा? जान‍िए महान योद्धा के अंतिम पलों की कहानी

महाभारत में गुरू द्रोणाचार्य पांडवों के खिलाफ लड़ रहे थे।
अश्वत्थामा गुरू द्रोणाचार्य के बेटे थे। (सांकेतिक फोटो)

धर्म ग्रंथ महाभारत में कई रोचक कहानियां हैं। इन्हीं कहानियों में से एक कहानी है दुर्योधन के प्राण त्यागने की। दुर्योधन की मौत के बारें में कई कहानियां कही गई हैं। कुछ कहानियों में भीम से युद्ध करते हुए दुर्योधन की मौत हो गई थी तो वहीं महाभारत के सौप्तिक पर्व के अनुसार दुर्योधन ने अपने प्राण अश्वत्थामा के सामने त्यागे थे। अश्वत्थामा गुरू द्रोणाचार्य के बेटे थे।

गुरू द्रोणाचार्य महाभारत में पांडवों के खिलाफ युद्ध कर रहे थे। उनके तीरों का पांडव सेना के लिए मुकाबला करना मुश्क्लि हो रहा था। तभी श्री कृष्ण ने ये अफवाह फैला दी की अश्वत्थामा मारा गया। गुरू द्रोणाचार्य को इस बात पर यकीन नहीं हुआ और उन्होंने अपना रथ युधिष्ठिर की ओर किया। क्योंकि युधिष्ठिर कभी झूठ नहीं बोलते थे। युधिष्ठिर से जब गुरू द्रोणाचार्य से पूछा तो उन्होंने कहा- ”अश्वत्थामा मारा गया…” इतना कहते ही ढ़ोल नगाड़े बजने लगे और गुरू द्रोणाचार्य पूरी बात नहीं सुन पाए। इसके बाद गुरू द्रोणाचार्य ने हथियार त्याग दिए और समाधि ले ली। समाधि लेते ही उनकी हत्या कर दी गई।

जब अपने पिता की मौत की खबर अश्वत्थामा को मिली तो उन्हें बहुत गुस्सा आया और उन्होंने पांडवों का मारने की ठान ली। युद्ध में जब उसने दुर्योधन के मरने की खबर सुनी तो उसका गुस्सा ओर बढ़ गया। युद्ध समाप्त होते-होते कौरवों की लगभग सारी सेना खत्म हो चुकी थी। केवल कृपाचार्य, कृतवर्मा और अश्वत्थामा बचे थे। युद्ध के बाद ये लोग वन की ओर चले गए। अश्वत्थामा आराम करना नहीं चाहते थे। लेकिन कृपाचार्य और कृतवर्मा के समझाने पर वो पेड़ के नीचे बैठ गए। तभी अश्वत्थामा ने देखा की एक उल्लू ने घोंसले में सोए कौओं पर हमला कर दिया और सारे कौओं की मौत हो गई।

इसको देखकर अश्वत्थामा ने पांडवों को मारने की योजना बनाई। अश्वत्थामा के साथ कृतवर्मा और कृपाचार्य भी चल दिए। पांडवों की छावनी में पहुंचकर अश्वत्थामा ने हमला कर दिया और पांच की हत्या कर दी। अश्वत्थामा को लगा कि ये पांडव पुत्र हैं। लेकिन वो पांचली के पुत्र थे। इस बात से अंजान अश्वत्थामा खुशी मनाने लगा। खुशी मनाते हुए वो दुर्योध के पास पहुंचा। युद्ध स्थल पर दुर्योधन मरणासन्न स्थिति में पड़ा हुआ था।

तीनों ने दुर्योधन को ये खबर सुनाई तो दुर्योधन बहुत खुश हुआ। दुर्योधन ने कहा कि जो काम हम सब मिलकर नहीं कर पाए वो काम तुमने कर दिया। ये कहकर दुर्योधन ने प्राण त्याग दिए।

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