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कुंडली में चंद्रमा की स्थिति से हैं परेशान तो आज शाम जरूर करें एकादशी का व्रत

एकादशी के दिन उपवास करने से माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु का आशीर्वाद मिलता है।
सांकेतिक फोटो

हिंदू कैलेण्डर में हर 11 वीं तिथि को एकादशी उपवास किया जाता है। एक माह में दो एकादशी व्रत होते हैं जिसमें से एक शुक्ल पक्ष के समय और दूसरा कृष्ण पक्ष के समय होता है। भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए उनके भक्त एकादशी व्रत रखते हैं। आज शाम से अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी का समय शुरू हो रहा है। आज (15 सितंबर 2017) शुक्रवार शाम 6.30 से 16 सितंबर शनिवार को शाम 4.30 तक एकादशी रहेगी। एकादशी के दिन उपवास रखा जाता है। इस दिन उपवास करने से माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु का आशीर्वाद मिलता है। एकादशी के दिन श्रद्धालु कठोर उपवास रखते हैं और अगले दिन सूर्योदय के बाद ही उपवास समाप्त करते हैं। एकादशी उपवास के समय सभी तरह के अन्न का भोजन करना वर्जित होता है। एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहा जाता है।

शास्त्रों में बताया गया है कि एकादशी वाले दिन प्रातः काल ही उठकर स्नान करना चाहिए। पूरे दिन व्रत रखकर शाम्म के समय भगवान की पुन: पूजन करने के बाद फल ग्रहण कर सकते हैं। रात को सोने से पहले भगवान का भजन करना शुभ होता है। अगले दिन यानि द्वादशी की तिथि को ब्राह्मणों को भोजन करवाएं। आपको बता दें कि द्वादशी के दिन सूर्योदय के बाद पारण करना चाहिए। अगर इसके बाद पारण की विधि की जाती है तो वो पाप के समान होता है। एकादशी व्रत करने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। इस दिन दिया जला के विष्णु सहस्त्र नाम पढ़ें। विष्णु सहस्त्र नाम नहीं हो तो 10 माला गुरुमंत्र का जप कर लें। अगर घर में झगडे होते हों, तो विष्णु सहस्त्र नाम पढ़ें तो घर के झगड़े भी शांत होंगे।

हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को चंद्रमा से जोड़ा गया है। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ एकादशी का व्रत रखकर केवल फलाहार का ही सेवन करता है तो उसके कुंडली में चंद्रमा की स्थिति जितनी भी खराब हो सुधर जाती है। जिसका अर्थ होता है की आपके शरीर में चंद्र तत्व सुधरने लगे हैं। ये भी माना जाता है कि चंद्र में सुधार होने के बाद ही शुक्र भी सुधरता है और शुक्र के सुधरने पर बुध भी सही स्थिति में आ जाते हैं। मुख्य तौर पर इस व्रत को रखने का उद्देश्य चंद्रमा की स्थिति ठीक करना और उन्हें जागृत करना है। लेकिन इस व्रत में नारायण की पूजा का भी विशेष महत्व होता है।

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