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क्या है पुरानी साड़ियों पर नए रंग का संदेश!

रंग-बिरंगी, जरीदार, फूलों वाली साड़ियों से पटी घरों की बालकनी, छतों के मुंडेर और पार्कों की रेलिंग।
Author नई दिल्ली | April 22, 2017 01:28 am
(File Pic)

रंग-बिरंगी, जरीदार, फूलों वाली साड़ियों से पटी घरों की बालकनी, छतों के मुंडेर और पार्कों की रेलिंग। यह दृश्य है दक्षिणी नगर निगम के विष्णु गार्डन के ख्याला ब्लॉक ए का। जहां इन रंगीन लेकिन पुरानी साड़ियों पर नयापन चढ़ा कर बेचने के कारोबार में लगे फारुख, शाह आलम, नेनुआ खान, रमजान खान और उनके जैसे कई अन्य लोग राजनीतिक परिदृश्य में ऐसे सूक्ष्म बदलाव का संकेत देते नजर आए जिसकी नब्ज अभी घाघ राजनीतिज्ञों की पकड़ से दूर है।
विष्णु गार्डन यानी वार्ड संख्या-007 में भी अन्य वार्डों की तरह चुनावी हलचल है, जहां 6 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। लेकिन मुख्यत: मुकाबला त्रिकोणीय ही है, लेकिन इन सबके बीच जो एक नयापन दिखा वह है मुसलिम अल्पसंख्यकों के बीच भाजपा उम्मीदवार के प्रति रुझान, जिसके ठोस कारण तो स्पष्ट नजर नहीं आए लेकिन मायने कई निकाले जा सकते हैं।

ख्याला ब्लॉक ए में यहां-वहां सुखाने के लिए फैलाई गई रंगीन साड़ियों ने ध्यान खींचा। फिर तो चुनावी सरगर्मी का रुख इन साड़ियों की कहानी के साथ उभरता चला गया। रफ्फू, कढ़ाई, धुलाई और प्रेस के माध्यम से पुरानी साड़ियों में नई जान डालने वालों से बात-चीत कर पता चला वहां की राजनीति में भी एक नई जान डालने की कोशिश चल रही है। विष्णु गार्डन वार्ड में शाम नगर, डीडीए कालोनी, चांद नगर, रवि नगर, ख्याला ब्लॉक ए और बी और कुछ अन्य क्षेत्र आते हैं। यहां भाजपा से सतपाल खरवाल जिन्हें स्थानीय सतपाल सिंह पाली कह बुलाते हैं, कांग्रेस से धनवंती चंदेला जिनका चंदेला परिवार यहां के वार्ड और विधानसभा क्षेत्र में वर्षों से राज करते आए हैं और आम आदमी पार्टी से सुखपाल सिंह चुनावी दौड़ में हैं। अन्य जगहों की तरह भी यहां सड़क, पानी, सामुदायिक शौचालय जैसे स्थानीय मुद्दे हैं, लेकिन मुख्य असर उम्मीदवारों और पार्टी की छवि का है।

सबसे पहले मुलाकात हुई दो किशोरों, फारुख और शाह आलम, से जो बारहवीं पास हैं, लेकिन खुद को वोटर बताया। इन दोनों का परिवार साड़ियों के इस कारोबार में है। शाह आलम से उसके पिता से मुलाकात करवाने की बात कही तो उसने कहा आज साड़ियों की गोदाम में चुनाव को लेकर बैठक है और उसके पिता लोगों को इसके लिए इकट्ठा करने निकले हैं। फारुख ने कहा वह तो नोटा का बटन दबाएगा लेकिन शाह आलम के पिता भाजपा के समर्थन में हैं। उसने बतलाया कि कैसे लगभग तीन साल पहले वर्तमान पार्षद मेघराज चंदेला ने इलाके के मस्जिद के बाहर फुटपाथ पर वजूखाना को तुड़वाने की कवायद की जिससे मुसलिम उनसे नाराज हैं। बात फिर साड़ियों पर आ गई, बकौल फारुख पुरानी साड़ियां घोड़ा मंदिर (रघुबीर नगर) से 20 से 50 रुपए के दाम पर खरीदी जाती हैं और नया रूप देकर 40, 50, 60 रुपए तक में फेरीवालों को बेचा जाता है। दिल्ली-एनसीआर में लगने वाले साप्ताहिक हाटों के अलावा असम, कोलकाता, लुधियाना, नागपुर और देश के ग्रामीण इलाकों में जाती है। बकौल फारुख ख्याला में अलग-अलग समुदायों के 30 से 40 फीसद परिवार इस काम में लगे हैं। कुछ परिवार कारीगर रखते हैं, कुछ खुद करते हैं और कुछ आउटसोर्स करते हैं।

उत्तर प्रदेश से लगभग 20 साल पहले आजीविका की तलाश में आए नेनुआ खान ने भी यही साड़ियों का काम अपनाया और ख्याला जेजे कालोनी में अपना घर ले लिया। तीन बच्चों के पिता खान ने बताया अब धंधा बहुत मंदा है, बच्चों को इसमें नहीं आने देंगे। उन्होंने भी संकेत दिया कि भाजपा उम्मीदवार पाली के प्रति इस बार उनके क्षेत्र में रुझान बन रहा है। वहीं पास में रमजान खान का गोदाम मिला जहां साड़ियों के काम में कई कारीगर लगे दिखे। 20 सालों से इस कारोबार में लगे रमजान ने कहा कि पाली की छवि अच्छी है, रजौरी विधानसभा उपचुनाव में सिरसा को जिताने में भी उनके समुदाय के लोगों का हाथ रहा है। रमजान के एक साथी ने कहा कि लहर मोदी की है, लेकिन छवि पाली की है। मुसलिम अल्पसंख्यकों का भाजपा उम्मीदवार के प्रति इस रुझान के सवाल पर रमजान ने कहा कि सोच में खुलापन आ रहा है, पहले हमारे वोट 100 फीसद चंदेला को जाते थे, लेकिन लगातार जीत ने अंहकार पैदा कर दिया है। कांग्रेस के उम्मीदवार से नाराज इन चंद अल्पसंख्यकों ने आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार की वकालत नहीं की। रमजान ने कहा कि आप तो तीसरे नंबर पर है, हम तो सिरसा के साथ थे।

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