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न तो गोरखालैंड की राह आसान और न ही अमन की

ज्योति बसु सरकार के रवैए की वजह से गोरखालैंड का आंदोलन हिंसक हो गया था। कोई दो साल तक चले हिंसा और आगजनी के उस दौर में लगभग डेढ़ हजार लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा था और करोड़ों की संपत्ति स्वाहा हो गई थी।
गोरखालैंड आंदोलन: जीजेएम कार्यकर्तां पर आंसू गैस छोड़ती पुलिस। (फोटो-पीटीआई)

पश्चिम बंगाल के दार्र्जीलिंग पर्वर्तीय क्षेत्र में बीते लगभग तीन दशक के दौरान चौथी बार बेहद गंभीरता से अलग गोरखालैंड राज्य की मांग उठी है। इलाके में दो सप्ताह से भी लंबे अरसे से बेमियादी बंद चल रहा है। कोई 10-12 दिनों से इंटरनेट सेवाएं ठप हैं और लोकल केबल के जरिए आने वाले न्यूज चैनलों पर पाबंदी है। स्कूल व होटल खाली हैं और बाजार बंद। शुरुआती हिंसा और उग्र तेवर के बाद गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के आंदोलनकारियों ने अब लोकतांत्रिक आंदोलन की राह पकड़ ली है। अबकी मोर्चा के रुख, आंदोलन में स्थानीय लोगों की भागीदारी और राज्य सरकार व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के रुख को देखते हुए लगता है कि न तो अलग गोरखालैंड की राह आसान राह है और न ही इलाके में शांति बहाल होने की। वर्ष 1986 में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) के प्रमुख सुभाष घीसिंग ने जब अलग गोरखालैंड की मांग में हिंसक आंदोलन छेड़ा था तब उन्होंने स्थानीय लोगों की भावनाओं में विस्फोट कर दिया था। उनके उस आंदोलन को शुरुआती दौर में स्वत:स्फूर्त समर्थन मिला था। यही वजह है कि घीसिंग ने केंद्र व राज्य सरकार को अपने इशारे पर नचाया। जीएनएलएफ की कुछ रणनीतिक गलतियों और तत्कालीन ज्योति बसु सरकार के रवैए की वजह से घीसिंग का वह आंदोलन हिंसक हो गया था। मोटे अनुमान के मुताबिक कोई दो साल तक चले हिंसा और आगजनी के उस दौर में लगभग डेढ़ हजार लोगों को जान से हाथ धोना पड़ा था और करोड़ों की संपत्ति स्वाहा हो गई थी।

अलग राज्य की यह मांग दरअसल लंबे अरसे तक इलाके पर राज करने वाले राजनीतिक दलों के लिए रामबाण का काम करती रही है। पहले जीएनएलएफ के नेता सुभाष घीसिंग ने भी गोरखालैंड की मांग का यही इस्तेमाल किया था और अब उनके चेले विमल गुरुंग भी अपने गुरु की राह पर ही चल रहे हैं। जीएनएलएफ हो या फिर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा, अलग गोरखालैंड का मुद्दा गोरखा मोर्चा के लिए हमेशा वजूद की लड़ाई रही है। पहले सुभाष घीसिंग से राज्य सरकार जब भी पैसों के हिसाब-किताब की बात करती थी, वे अलग गोरखालैंड का मुद्दा उठा देते थे। गुरुंग ने यह कला अपने गुरु घीसिंग से ही सीखी है। अपने कामकाज की शैली और एकछत्र राज पर सवाल उठते ही गुरुंग भी अलग गोरखालैंड की मांग उठाते रहे हैं। अबकी गोरखा मोर्चा के अलावा छह अन्य क्षेत्रीय पार्टियों ने भी अलग गोरखालैंड के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया है। भाजपा की पर्वर्तीय शाखा भी इनमें शामिल है। तृणमूल कांग्रेस का सहयोगी और गोरखा मोर्चा का कट्टर दुश्मन रहा जीएनएलएफ भी तृणमूल से नाता तोड़ कर मोर्चा के साथ वजूद की इस लड़ाई में शामिल हो गया है।
गोरखा मोर्चा के तीन साल लंबे आंदोलन के बाद वर्ष 2011 में सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने पहाड़ की समस्या पर ध्यान दिया और केंद्र, राज्य व गोरखा मोर्चा के बीच तितरफा बैठकों के कई दौर के बाद गोरखालैंड टेरीटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) का गठन किया गया। तत्कालीन तौर पर इस समस्या को खत्म करने के लिए जीटीए करार में यह बात भी जोड़ दी गई कि अगर मोर्चा इससे संतुष्ट नहीं रहता है तो वह दोबारा गोरखालैंड की मांग उठा सकता है। इसी प्रावधान को हथियार बना कर मोर्चा के नेता गाहे-बगाहे अलग राज्य की मांग उठाते रहे हैं। वर्ष 2013 में तेलंगाना के गठन के बाद भी इलाके में अलग राज्य की मांग जोरदार तरीके से उठी थी। तब विमल गुरुंग ने जीटीए से इस्तीफा दे दिया था और ममता सरकार से तमाम रिश्ते तोड़ लिए थे।

अब पांच साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद अगले महीने जीटीए के चुनाव होने थे। ममता बनर्जी का आरोप है कि जीटीए को करोड़ों की रकम देने के बावजूद इलाके में विकास के नाम पर कोई काम नहीं हुआ है। राज्य सरकार जीटीए के खर्चों का स्पेशल आॅडिट भी करा रही है। आॅडिट करने वाली टीम को करोड़ों रुपए के खर्च का कोई हिसाब नहीं मिल रहा है। ममता का आरोप है कि इन घपलों पर परदा डालने और जीटीए हाथ से निकलने के डर से ही गोरखा मोर्चा ने एक बार फिर गोरखालैंड का पारंपरिक दांव चलाया है।
राजनीतिक प्रेक्षकों का कहना है कि पर्वतीय इलाके में तृणमूल कांग्रेस के बढ़ते असर की काट और अपना वजूद बचाने के लिए ही मोर्चा ने फिर गोरखालैंड का नारा बुलंद किया है। विमल गुरुंग समेत मोर्चे के तमाम सदस्यों ने जीटीए से इस्तीफा दे दिया है। मोर्चा ने जीटीए के लिए हुए तितरफा करार की प्रतियां भी फूंक दी हैं। इलाके में हिंसा तो थम गई है लेकिन गतिरोध कायम है। मौजूदा हालात में मोर्चा की जिद के बावजूद महज दो जिलों और चार नगरपालिकाओं को लेकर अलग गोरखालैंड राज्य के गठन की राह आसान नहीं है। वह भी कालिम्पोंग को तो बीते दिनों ही सबडिवीजन से जिले का दर्जा दिया गया है। दूसरी ओर, फिलहाल दूर-दूर तक इलाके में शांति बहाल होने के भी कोई आसार नहीं है। नतीजतन जहां इलाके में अर्थव्यवस्था की रीढ़ समझे जाने वाले पर्यटन उद्योग की कमर टूट रही है वहीं दुनिया भर में मशहूर दार्जीलिंग चाय के पत्तों की हरियाली भी मुरझाने लगी है।

सुभाष घीसिंग और विमल गुरुंग

अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में हुए गोरखालैंड आंदोलन के बाद राज्य की तत्कालीन वाममोर्चा सरकार ने सुभाष घीसिंग के साथ एक समझौते के तहत दार्जीलिंग गोरखा पर्वतीय परिषद का गठन किया था। घीसिंग वर्ष 2008 तक इसके अध्यक्ष रहे लेकिन इस दौरान जहां कोलकाता में वाममोर्चा सरकार अपने अंतिम दिन गिनने लगी थी वहीं पवर्तीय इलाके में घीसिंग की लोकप्रियता भी गिरने लगी थी। दूसरी ओर, वर्ष 2007 से ही पहाड़ियों में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के बैनर तले एक नई क्षेत्रीय ताकत का उदय होने लगा था। विमल गुरुंग की अगुवाई में मोर्चा ने नए सिरे से अलग गोरखालैंड की मांग में आंदोलन शुरू कर दिया। साल भर बाद मोर्चा ने इलाके में अपनी पकड़ इतनी मजबूत बना ली कि दो दशकों तक पहाड़ियों के बेताज बादशाह रहे सुभाष घीसिंग को दार्जीलिंग छोड़ना पड़ा। मोर्चा ने उनको दार्जीलिंग छोड़ने का फरमान सुनाया था। बाद के वर्षों में जीवन के आखिरी दिनों तक घीसिंग जलपाईगुड़ी जिले में एक सरकारी गेस्ट हाउस में लगभग गुमनामी में दिन काटते रहे।

 

 

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  1. M
    manish agrawal
    Jun 28, 2017 at 8:02 am
    क्यों नहीं बनेगा गोरखालैंड ? हरयाणा, छत्तीसगढ़, झारखंड, तेलंगाना, उत्तराखंड इत्यादि ढेरों नए राज्य बने, आज़ादी के बाद ! फिर गोरखालैंड क्यों नहीं ?
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    Reply
    सबरंग