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दमकल के कायदों को ठेंगा दिखा रहे 20 बड़े अस्पताल

महज एक सप्ताह के भीतर हुई इन दोनों घटनाओं ने बंगाल के अस्पतालों में अग्निरोधक उपायों को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। राहत की बात यह रही कि इन दोनों मामलों में जान का कोई नुकसान नहीं हुआ।
प्रतीकात्मक तस्वीर

महज एक सप्ताह के भीतर हुई इन दोनों घटनाओं ने बंगाल के अस्पतालों में अग्निरोधक उपायों को एक बार फिर कठघरे में खड़ा कर दिया है। राहत की बात यह रही कि इन दोनों मामलों में जान का कोई नुकसान नहीं हुआ। लेकिन वर्ष 2011 में निजी क्षेत्र के एएमआरआई अस्पताल की भयावह आग के इतने साल बीतने के बावजूद आग से सुरक्षा के मामले में अस्पताल प्रबंधन और सरकार की उदासीनता समझ से परे है। अकेले बीते साल सरकारी अस्पतालों में आग लगने की कम से कम सात घटनाएं हुई थीं। उनमें से मुर्शिदाबाद मेडिकल कॉलेज अस्पताल में लगी आग में दो मरीजों और एक नर्स की दम घुटने से मौत हो गई थी। इतनी भयावह आग के बावजूद सूबे के 20 बड़े अस्पताल दमकल विभाग के अनापत्ति प्रमाण पत्र के बिना चल रहे हैं।

हर बार आग लगने की घटना के बाद कुछ समय तक सरकार व प्रशासन सक्रिय रहता है, लेकिन बाद में फिर सबकुछ उसी ढर्रे पर चलने लगता है। लगता है सरकार ने एएमआरआई अस्पताल की 2011 की घटना से कोई सबक नहीं सीखा है। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी उसी साल सत्ता में आई थीं। इस आग ने कोलकाता ही नहीं बंगाल के तमाम अस्पतालों में आग से बचाव के उपायों पर सवालिया निशान लगा दिया था। एएमआरआई की घटना के बाद फायर ब्रिगेड के पांच सदस्यों को लेकर एक सुरक्षा जांच और निगरानी समिति बनाई गई थी। इसकी सिफारिशों पर भी अमल नहीं हुआ। कर्र्मचारियों की कमी की दुहाई देकर अब अस्पतालों की निगरानी का काम भी ठप है। उस घटना के बाद सरकार ने अग्निशमन के आधुनिकीकरण का भी दावा किया था। उसके तहत नए उपकरण खरीदे जाने थे, लेकिन अब तक इस दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हुई है। एएमआरआई मामले में आरोप पत्र दायर होने के डेढ़ साल बाद इस मामले की सुनवाई शुरू हुई जो अभी चल रही है। लंबे अरसे तक बंद रहने के बाद वह अस्पताल दोबारा खुल गया है।

आखिर सरकारी अस्पतालों में आग लगने की घटनाओं पर अंकुश क्यों नहीं लगाया जा सका है? यहां स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी कहते हैं कि ज्यादातर सरकारी अस्पतालों की इमारतें काफी पुरानी हैं। समय-समय पर उनका विस्तार और मरम्मत का छोटा-मोटा काम तो होता रहता है। लेकिन बिजली की वायरिंग बिना किसी योजना के की गई है। ऐसे में शार्ट सर्किट से आग लगने का खतरा हमेशा मंडराता रहता है।बीते साल मुर्शिदाबाद मेडिकल कॉलेज, बर्दवान के कटवा सबडिवीजनल अस्पताल और महानगर के सरकारी शंभुनाथ पंडित अस्पताल में वातानुकूलित इकाई में शार्ट सर्किट से ही आग लगी थी। हाल में हावड़ा जिले में आग लगने की घटनाएं बढ़ने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने विभागीय मंत्री शोभन चटर्जी को अग्निरोधक उपायों की अनदेखी करने वाले तमाम निजी अस्पतालों व संस्थानों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का निर्देश दिया है। उसके बाद बीते सप्ताह से इलाके में एक विशेष टीम ऐसे अस्पतालों और परिसरों की जांच कर रही है। दमकल मंत्री शोभन चटर्जी कहते हैं कि दोषी संस्थानों के लाइसेंस रद्द कर दिए जाएंगे।

विडंबना यह है कि पूरे राज्य में आग लगने की घटनाओं में वृद्धि के बावजूद फायर ब्रिगेड विभाग कर्मचारियों की भारी कमी से जूझ रहा है। विभागीय सूत्रों का दावा है कि कर्मचारियों के 47 फीसदी पद खाली हैं। उनका कहना है कि नए लोगों की नियुक्ति की बजाय सरकार ठेके पर कमर्चारियों को रख रही है, लेकिन ऐसे लोगों के पास आग से निपटने का कोई समुचित प्रशिक्षण नहीं होता है। नतीजतन आग लगने की बड़ी घटना होने पर मुश्किलें बढ़ जाती हैं। लेकिन मंत्री का दावा है कि जल्दी ही सरकार इन खाली पदों को भरने की कवायद शुरू करेगी। हालांकि लाख टके का सवाल तो यही है कि इस मामले में सरकारी दावे क्या कभी हकीकत में बदल सकेंगे ?

एक गैर सरकारी संगठन में काम करने वाले सुबीर प्रामाणिक अस्पतालों में आग की घटनाओं की तुलना ठहरे पानी में पत्थर फेंकने से करते हैं। प्रामाणिक की बातों में दम है। वास्तव में हर साल अस्पतालों में आग लगने की घटनाएं नहीं दोहराई जातीं। इसे समझने के लिए एक मिसाल ही काफी है। बीते साल के आखिरी दिनों में महज दो महीने के भीतर अस्पताल एसएसकेएम में दो बार आग लगी थी। तब अचानक पूरी सरकार सक्रिय हो उठी थी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से लेकर तमाम आला अधिकारियों ने दौरा कर अग्निरोधी उपायों के आधुनिकीकरणो का एलान किया था। लेकिन इस अस्पताल परिसर का दौरा करने पर यह साफ है कि कोई खास बदलाव नहीं आया है।

 

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