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बंगाल: बड़ी संख्या में नवजातों की होती है मौत, नहीं बनती खबर

कोलकाता स्थित विधान चंद्र राय शिशु अस्पताल पूर्वी भारत में बच्चों का सबसे बड़ा सरकारी रेफरल अस्पताल है। हर साल यहां भी बड़ी संख्या में नवजातों की मौत हो जाती है।
दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती डेंगू से पीड़ित मरीज। (फाइल फोटो पीटीआई)

नवजात शिशुओं की मौत के मुद्दे पर फिलहाल भले गोरखपुर का बाबा राघवदास अस्पताल सुखिर्यों में हो, लेकिन इस मामले में पश्चिम बंगाल के अस्पताल भी कम बदनाम नहीं हैं। कोलकाता स्थित विधान चंद्र राय शिशु अस्पताल पूर्वी भारत में बच्चों का सबसे बड़ा सरकारी रेफरल अस्पताल है। हर साल यहां भी बड़ी संख्या में नवजातों की मौत हो जाती है। ज्यादातर मामलों में तो यह खबर भी नहीं बनती। हो-हल्ला तब होता है जब मौतों की संख्या अचानक बढ़ जाती है। इसके अलावा मुर्शिदाबाद और बदर्वान मेडिकल कॉलेज अस्पतालों से भी नवजातों की मौत की खबरें अक्सर आती रहती हैं। इनसे साफ है कि इस राज्य में भी खासकर शिशुओं के इलाज के मामले में सरकारी ढांचा बदहाली का शिकार है।
डेढ़ हजार मरीज रोजाना बीसी राय शिशु अस्पताल में राज्य के विभिन्न हिस्सों से रोजाना कोई डेढ़ हजार लोग आते हैं, लेकिन डॉक्टरों और बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण अक्सर उनका सही इलाज नहीं हो पाता।

वीरभूम से अपने सात साल के बेटे को लेकर यहां आए अभिजित सरकार कहते हैं कि हमें अपने गांव से यहां तक पहुंचने में छह घंटे से ज्यादा का समय लगा। लेकिन चार घंटे तक कतार में खड़े होने के बाद डॉक्टर ने मेरे बेटे की जांच का काम महज दो मिनट में निपटा दिया। मुर्शिदाबाद के शंकर राय का भी यही आरोप है। नवजातों की मौत पर अस्पताल प्रबंधन की स्थायी दलील यह है कि विभिन्न संक्रामक बीमारियों से पीड़ित बच्चों को जब दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों से यहां लाया जाता है तो उनकी हालत बेहद नाजुक होती है। कोई छह साल पहले 24 घंटे के दौरान 40 से ज्यादा नवजातों की मौत के बाद राज्य सरकार ने इस घटना की जांच के लिए जो विशेषज्ञ समिति गठित की थी उसने भी अपनी रिपोर्ट में बुनियादी ढांचे को इसका जिम्मेदार ठहराते हुए कहा था कि अस्पताल पर जरूरत से ज्यादा दबाव है। खुद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जिनके जिम्मे स्वास्थ्य मंत्रालय भी है, ने भी तब अस्पताल का दौरा कर डॉक्टरों को क्लीनचिट दे दी थी।

अस्पताल बीमार
दरअसल, राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली अब कोई खबर नहीं है। वाममोर्चा के 34 साल लंबे शासनकाल में सरकारी अस्पतालों का ढांचा पूरी तरह भरभरा गया था। राज्य में सत्ता बदलने के बावजूद बीते छह साल में हालात में खास सुधार नहीं हुआ है।

दवा और बिस्तरों की कमी
राज्य के तमाम सरकारी अस्पतालों में दवाओं और बिस्तरों की भारी कमी है। कई अस्पतालों में करोड़ों के उपकरण बेकार पड़े हैं और मरीजों को मोटी रकम खर्च कर बाहर से टेस्ट कराने पड़ते हैं।

अफसरों का दावा
राज्य में स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारी सेवाओं में गड़बड़ी की बात तो मानते हैं, लेकिन वे यह याद दिलाने से भी नहीं चूकते कि पूरे देश में पश्चिम बंगाल ही ऐसा राज्य है जहां सबसे ज्यादा (70 फीसदी) लोग सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाते हैं। वे दावा करते हैं कि सेवाएं दूसरे राज्यों के मुकाबले बेहतर होने से ही इतनी भारी तादाद में लोग सरकारी अस्पतालों व स्वास्थ्य केंद्रों में इलाज कराने आते हैं। वैसे राज्य के आम लोगों का अनुभव और चिकित्सा विशेषज्ञों की राय इसके विपरीत है। उनके मुताबिक, मध्यम या औसत आय वाले व्यक्ति भी बीमारियों के इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों की बजाय निजी क्लीनिकों व नर्सिंग होमों को ही तरजीह देते हैं।

 

 

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