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बंगाल चुनाव : आसार अच्छे नहीं पहले चरण के

बंगाल में सिंगुर के बाद सालबनी के धक्के से राज्य में बड़े उद्योगों की संभावनाएं खत्म होने से हताश-नाराज लोगों की तादाद बढ़ी है।
Author कोलकाता | April 3, 2016 00:36 am
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी नियामतपुर (पबंगाल) में रैली को संबोधित करते हुए। (पीटीआई फोटो)

शारदा चिटफंड घोटाला और नारद स्टिंग ऑपरेशन से भ्रष्टाचार के आरोपों को झेल रही तृणमूल कांग्रेस फ्लाईओवर हादसे की वजह से एक नई मुसीबत में फंस गई है। माओवादी असर वाले जंगलमहल इलाके में, जहां विधानसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान परसों ही होना है, शनिवार शाम प्रचार थम गया। प्रचार में इस हादसे को भी एक भ्रष्टाचार की देन के रूप में विपक्ष ने लोगों के सामने रखा है। इन मुद्दों का मतदान में कोई असर नहीं पड़ेगा, ऐसा सत्तारूढ़ दल के नेताओं-समर्थकों के अलावा कोई कह नहीं सकता। राज्य में विकास की गंगा-जमुना बहा देने, जंगलमहल, पहाड़, चाय बगानों, समतल को हंसते देखने का दावा करने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी परेशान हैं, सारे बुरे अंजाम के लिए पिछली सरकार को कोसने से लोगबाग ऊब से गए हैं। उनकी लोकप्रियता की जांच की घड़ी आ गई है।

पिछले चुनाव में जिस जंगलमहल में यानी वनांचल में उनकी पार्टी को भारी कामयाबी मिली थी, उसी अंचल की 49 सीटों पर पहले चरण का मतदान दो किस्तों, चार और 11 अप्रैल को होने जा रहा है। पहली किस्त की 18 सीटों के लिए चुनाव प्रचार शनिवार की शाम को खत्म हुआ है। इन सीटों में पश्चिम मेदिनीपुर की छह, पुरूलिया की नौ और बांकुड़ा जिले की तीन सीटें हैं। बाकी की 31 सीटों पर मतदान 11 अप्रैल को होना है। इसी इलाके में सालबनी है, जहां जिंदल ग्रुप ने इस्पात कारखाना लगाने में दिलचस्पी दिखाई थी और बाद में उसे ठंडे बस्ते में डाल बहुत सारे लोगों को निराश कर दिया। इसकी एक बड़ी वजह तृणमूल नेताओं का हर मामले में अनपेक्षित हस्तक्षेप बताया जाता है।

बंगाल में सिंगुर के बाद सालबनी के धक्के से राज्य में बड़े उद्योगों की संभावनाएं खत्म होने से हताश-नाराज लोगों की तादाद बढ़ी है। बांग्ला चैनलों की रपटें बता रही हैं कि कम से कम जंगलमहल तो हंस नहीं रहा। ऐसे चेहरे, ढूंढे नहीं मिल रहे। राशन की दूकानों से दो रुपए की दर से चावल-गेहूं तो जरूर मिल रहे हैं, पर सिर्फ इससे ही तो बात बनती नहीं। आलू-दाल-तेल खेल बिगाड़ने के लिए काफी हैं। रोजगार के अवसर गायब होते जा रहे हैं। मनरेगा तक ढंग से अमल में नहीं है।

ऐसे में कोई कैसे हंसे। हंसने वाली सूरत तो सत्ताधारी दल के पक्ष तक में नहीं दिखती। अंदरूनी कलह कम नहीं। भ्रष्टाचार, दबंगई, महिलाओं समेत समाज में बढ़ती असुरक्षा की भावना चैन के लुटेरे साबित हो रहे हैं। और कल के साथी कांग्रेस का कांटा भी चुभने वाला ही है। पिछले चुनाव में कांग्रेस के साथ तृणमूल का गठजोड़ था। कांग्रेस ने 68 सीटें लड़ कर 42 सीटें जीती थी। अबकी वह वाममोर्चे के साथ समझौता कर चुनाव लड़ रही है। लोकतंत्र की बहाली के लिए उसने सालों के बैरी से हाथ मिलाया है। तृणमूल का साथ एसयूसीआइ ने भी छोड़ दिया है। परोक्ष रूप से मददगार रही भाजपा भी अपनी ताकत बढ़ाने की कोशिश में है।

इस इलाके में सत्ताधारी दल के पक्ष में एक बात जरूर जाती है, वह यह है कि जंगलमहल में हिंसा की वारदातें कम हुई हंै। लेकिन विपक्ष यह आरोप लगाने से नहीं चूकता कि इसके पीछे तो इस दल की ही शह रही है। ‘दिन में तृणमूली, रात में नक्सली’ यह धारणा बन गई थी। तब, जब नक्सलियों का जोर था वहां। तब ज्यादातर वारदातों में वामदलों के नेता-कार्यकर्ता हिंसा के शिकार हुए थे। उन दिनों तब के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की कार को उड़ाने की साजिश भी रची गई थी। राज्य के सबसे संवेदनशील माने जाने वाले इस अंचल का मंजर पहले जैसा अब नहीं।

घरों से खदेड़े गए लोग, लूटपाट का शिकार बने परिवार, जुर्माना अदा करने वाले और झूठे मुकदमों में फंसाए गए लोग गुस्से से भरे हुए बताए जाते हैं। इस बार सुरक्षा के कड़े इंतजाम भी किए गए हैं। चुनाव आयोग सख्ती बरतने को तत्पर है। राजनीति के जानकारों की माने तो दीदी पर दया दिखाने को तैयार नहीं है अधिकांश मतदाता। हालांकि तृणमूल नेताओं का दावा है कि मीडिया के एक हिस्से के दुष्प्रचारों, विपक्ष की साजिशों से प्रभावित नहीं होने वाले हैं मतदाता। लेकिन वोटदाता के मन को घटनाओं-दुर्घटनाओं, अपने जीवनानुभव से भी तो सबक मिलता ही है। कौन जाने कितना मन बदल गया हो उनका।

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