ताज़ा खबर
 

विष्णु मोहन की रिपोर्टः चुनाव पूर्व तैयारियों में ही लड़खड़ाने लगा हाथी

उत्तर प्रदेश में एक बार फिर सत्तानशीं होने का मंसूबा रख रही बहुजन समाज पार्टी चुनावी तैयारियों से पहले ही लड़खड़ाने लगी है। चौतरफा दुश्वारियां झेल रही बसपा को एक ही समय अंदरूनी व बाहरी परेशानियों से दो-चार होना पड़ रहा है।
Author नई दिल्ली | August 20, 2016 04:54 am
बासपा प्रमुख मायावती

उत्तर प्रदेश में एक बार फिर सत्तानशीं होने का मंसूबा रख रही बहुजन समाज पार्टी चुनावी तैयारियों से पहले ही लड़खड़ाने लगी है। चौतरफा दुश्वारियां झेल रही बसपा को एक ही समय अंदरूनी व बाहरी परेशानियों से दो-चार होना पड़ रहा है। पार्टी पर जहां एक तरफ विरोधी दलों के हमले तेज होते जा रहे हैं वहीं उसे अंदरूनी विद्रोह का भी सामना करना पड़ रहा है। बसपा जिस सोशल इंजीनियरिंग के बूते दो बार सत्ता हासिल करने में कामयाब रही, इस बार वही निशाने पर है। पार्टी में पनप रहा असंतोष इसे और कमजोर बना रहा है। इस दिक्कत को दूर करने के लिए पार्टी प्रमुख मायावती यूपी के प्रदेश अध्यक्ष को बदलने पर भी विचार कर रही हैं। माना जा रहा है कि इस बाबत जल्द ही फैसला आ सकता है। ऐसे में मायावती के करीबी माने जाने वाले पूर्व मंत्री लालजी वर्मा की फिर ताजपोशी हो सकती है।

सोशल इंजीनियरिंग के दम पर 2007 में पूर्ण बहुमत से यूपी में सत्ता पाने में कामयाब होने वाली बहुजन समाज पार्टी को 2012 के चुनाव में मुंह की खानी पड़ी थी। उस चुनाव में बसपा के जातीय समीकरणों के पिटने के बाद से ही मायावती ने खुद को एक तरह से सक्रिय राजनीति से दूर रखते हुए अपना जनाधार मजबूत करना शुरू कर दिया था। मायावती ने अपना सारा ध्यान पार्टी के काडर वोट पर केंद्रित कर दिया था। इसके साथ ही उन्होंने यूपी छोड़ दिल्ली को अपना ठिकाना बना लिया था। पार्टी की लाइन-लेंथ दुरुस्त करने के साथ ही उनकी राजनीतिक गतिविधियां दिल्ली में बैठ कर कानून-व्यवस्था को लेकर यूपी सरकार पर हमला बोलने और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के इस्तीफे की मांग तक सीमित रह गई थी।

सत्ता जाने के बाद अपनी कमियों को दूर करने का संकेत देने वाली मायावती फिर चूक गईं। उनके दिल्ली प्रवास के दौरान सवर्ण कोटे के एक राज्यसभा सदस्य की ही बसपा मुखिया तक पहुंच बनी रही। ऐसे में पार्टी के अन्य दिग्गज नेताओं के सामने पार्टी पर इस नेता का एकाधिकार होने का संदेश भी गया। राजनैतिक बिसात पर गोटियां बिछाने में लगी मायावती को उनके चंद करीबियों ने भी इसका एहसास नहीं होने दिया। दूसरी तरफ मायावती ने यूपी में चुनाव नजदीक देखते हुए ग्राउंड लेवेल पर यथास्थिति का आकलन किए बगैर ही प्रत्याशियों का चयन शुरू कर दिया। कई जगहों पर पार्टी के लिए अरसे से काम करने वालों के बजाए जमीन के धंधे से जुड़े कारोबारियों को तरजीह दे दी गई। उनकी इस कार्यप्रणाली से पार्टी के अंदर असंतोष फैलना शुरू हुआ जिसका सिलसिला अभी थमता नजर नहीं आ रहा। यही असंतोष पिछले दिनों पार्टी में बगावत के सुर में बाहर आया। बसपा नेत्री समेत पार्टी के चंद वफादार नेताओं कोे अब यह डर सता रहा है कि कहीं काडर वोट इससे प्रभावित न हो जाए। पहले ही पार्टी के कुछ दिग्गज नेता मायावती पर गंभीर आरोप लगाकर पार्टी से किनारा कर चुके हैं। पार्टी को सबसे तगड़ा झटका उसके राष्ट्रीय महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्य की बगावत से लगा।

पार्टी नेतृत्व इस नफे-नुकसान का आकलन करने में लगा ही था कि पूर्व मंत्री आरके चौधरी ने भी स्वामी प्रसाद मौर्य की तरह ही मायावती पर टिकट बेचने का आरोप लगाते हुए बगावत कर दी। उन्होंने साफ कह दिया था कि मायावती दलाल नेताओं के चंगुल में घिर चुकी हैं। बगावत करने वाले नेता इसके साथ यह भी दावा कर चुके हैं कि कई और नेता बसपा से किनारा करने को तैयार बैठे हैं। बड़े नेताओं की बगावत के साथ ओबीसी वोट के पार्टी के बाहर जाने के आसार पैदा हो गए। यह संकेत भी सामने आ चुके हैं कि असंतोष की चिंगारी अंदर तक पैठ कर चुकी है।

ऐसे में मायावती ने अब मुसलिम वोट बैंक पर ध्यान केंद्रित किया है। मुसलिम वोटबैंक में सेंध लगाने के इरादे के ही पिछले दिनों उन्होंने कांग्रेस के तीन व सपा के एक मुस्लिम विधायक को बसपा में शामिल किया। पार्टी के भरोसेमंद सूत्रों की मानें तो अभी कुछ आौर मुसलिम नेताओं को बसपा में शामिल किया जाने की तैयारी है, जिसे लेकर सियासी पैंतरेबाजी जोरों पर है।

सूत्रों का कहना है कि अपने बिखरते वोट बैंक को समेटने के लिए मायावती ने फिर मुस्लिम वोटबैंक के साथ ही पार्टी के काडर वोट के साथ अति पिछड़े व पिछड़े वर्ग के वोटबैंक पर ध्यान केंद्रित कर दिया है। इसके लिए संगठन स्तर पर जल्द ही बड़े फेरबदल करे जा सकते हैं। सूत्रों की मानें तो मायावती का पहला कदम यूपी के प्रदेश अध्यक्ष को बदलने का हो सकता है। इसके साथ ही अपनों को एकबार फिर अपनों को जोड़ने की कवायद के तहत विभिन्न वजहों से तहत पार्टी से निकाले गए छोटे-बड़े नेताओं को वापस लाए जाने की योजना है। इनमें विद्रोहियों को शामिल नहीं किया जाएगा।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग