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सदियों पुरानी ढोल-दमाऊं कला विलुप्ति के कगार पर

ढोल-दमाऊं के हुनरबाज इस कला के क्षेत्र में रोजगार के अवसर न के बराबर होने की वजह से खासे परेशान है। और इसीलिए इन हुनरबाजों की अगली पीढ़ी ढोल-दमाऊं की कला को अपनाने को तैयार नहीं है।
पाकिस्तानी चायवाले के बाद सामने आई चाइनीज ढोलवाली (Photo Source: Youtube)

उत्तराखंड की सदियों पुरानी ढोल-दमाऊं कला अब विलुप्त होने के कगार पर है। सामाजिक और सरकारी उपेक्षा के कारण यह कला दम तोड़ रही है। उत्तराखंड की पर्वतीय क्षेत्र की संस्कृति में विभिन्न अवसरों पर ताल और सुर में ढोल और दमाऊं का वादन किया जाता है। उत्तराखंड की पर्वतीय संस्कृति पर पाश्चात्य देशों की संस्कृति का खासा असर पड़ा है। इसलिए आधुनिकता के दौर में पहाड़ के ही अधिकतर लोग ढोल-दमाऊं को भूलते जा रहे हैं और नई पीढ़ी इसे बजाना नहीं चाहती है। ढोल-दमाऊं के हुनरबाज इस कला के क्षेत्र में रोजगार के अवसर न के बराबर होने की वजह से खासे परेशान है। और इसीलिए इन हुनरबाजों की अगली पीढ़ी ढोल-दमाऊं की कला को अपनाने को तैयार नहीं है।

दरअसल, ढोल-दमाऊं वादन से दो वक्त की रोटी का भी इसके हुनरबाज बन्दोबस्त नहीं कर पाते हैं। इस वजह से साल-दर-साल ढोल-दमाऊं वादकों की तादाद तेजी से कम होती जा रही है। टिहरी के प्रकाशदास कहते हैं कि ढोल-दमाऊं की लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए इस कला को रोजगार से जोड़ा जाना चाहिए ताकि नई पीढ़ी इस कला से जुड़ी रहे। उनका कहना है कि उनके बच्चे उनसे सवाल करते हैं कि ढोल-दमाऊं बजाकर उन्हें आज तक क्या मिला? सरकार ने क्या दिया? इसलिए मेरे बच्चे इस कला से विमुख हो रहे हैं।

उत्तरकाशी के टिपरी गांव के 55 साल के वैशाखू का कहना है कि ढोल-दमाऊं बजाना हमारा खानदानी काम है, परन्तु हमें इस कला को जीवित रखने के लिए आर्थिक तंगी के साथ-साथ सामाजिक उपेक्षा का दंश भी झेलना पड़ता है। क्योंकि ढोल-दमाऊं कला से जुडेÞ उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों मे जितने भी परिवार हैं, वे सब दलित वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। हमें शादी-ब्याहों और अन्य धार्मिक उत्सवों में बुलाया तो जाता है परंतु हमारे साथ उपेक्षित व्यवहार भी किया जाता है। राज्य सरकार की तरफ से हमें कोई अनुदान नहीं मिलता है। ढोल-दमाऊं वादकों ने राज्य सरकार से इस कला से जुडेÞ लोगों को पेंशन देने और सूबे के हर विकास खंड में ढोल-दमाऊं शिक्षण संस्थान खोलने की मांग की है। पूरे राज्य में चार हजार से ज्यादा ढोल-दमाऊं वादक हैं, जो आज भुखमरी के कगार पर है और इस पुश्तैनी कला को जीवित रखने के लिए संघर्षरत हैं।

 
ढोल-दमाऊं कला को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार ने कई अहम कदम उठाए हैं। साठ साल की उम्र पार कर चुके ढोल-दमाऊं वादकों को पेंशन पांच हजार रुपए सालाना देने का राज्य सरकार ने निर्णय लिया है। जिन ढोल-दमाऊं वादकों के परिवार की मासिक आय दो हजार रुपए से कम हैं, उन्हें निशुल्क वाद्य यंत्र दिए जाएंगे।
-सतपाल महाराज, पर्र्यटन और संस्कृति मंत्री

ढोल-दमाऊं कला को बढ़ावा देने के लिए सूबे के ढोल-दमाऊं वादकों की चार दिन की कार्यशाला हरिद्वार में हुई थी, जिसमें पूरे प्रदेश के 1300 से ज्यादा वादकों ने हिस्सा लिया था। इसमें ढोल-दमाऊं कला को प्रोत्साहित करने का कार्य किया गया और ‘नमो नाद’ नाम की एक नई धुन बनाई गई और पूरे कार्यक्रम का वीडियो फ्रांस के संस्कृति विभाग को भेजा गया है। फ्रांस का संस्कृति विभाग इस कला पर विशेष शोध का कार्य कर रहा है और जल्दी ही विदेशों की धरती पर उत्तराखंड के ढोल-दमाऊं की गूंज होगी।
-वीना भट्ट, निदेशक, उत्तराखंड संस्कृति विभाग
मैं देवताओं की खुशी के लिए ढोल बजाता हूं। ढोल-दमाऊं वादन से पूरे साल दो-ढाई हजार रुपए की कमाई ही हो पाती है। इस कारण उन्हें परिवार के भरण-पोषण के लिए मजदूरी भी करनी पड़ती है।
-खेमचंद, उत्तरकाशी
(50 साल से बजा रहे ढोल-दमाऊं)

पूरे साल चार-पांच कार्यक्रम ही ढोल-दमाऊं
बजाने के मिल पाते हैं। ऐसे में उनके परिवार
का गुजारा नहीं हो पाता है।
-सतीश चंद
पौड़ी गढ़वाल के पाबो गांव निवासी

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