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उत्तराखंड: अनमोल भित्ति चित्रकला विलुप्ति के कगार पर

19 वीं शताब्दी तथा 20 वीं शताब्दी के शुरू में देहरादून और हरिद्वार में भित्ति चित्रकला अपने योवन पर थी। इन दोनों शहरों में राजा-महाराजाओं की ओर से बनाई गर्ई बड़ी-बड़ी हवेलियों में भित्ति चित्र बड़ी तादाद में बनाए जाते थे।
उत्तराखंड में एक जमाने में समृद्ध भित्ति चित्रकला अब लुप्त हो रही है।

उत्तराखंड में एक जमाने में समृद्ध भित्ति चित्रकला अब लुप्त हो रही है। 19 वीं शताब्दी तथा 20 वीं शताब्दी के शुरू में देहरादून और हरिद्वार में भित्ति चित्रकला अपने योवन पर थी। इन दोनों शहरों में राजा-महाराजाओं की ओर से बनाई गर्ई बड़ी-बड़ी हवेलियों में भित्ति चित्र बड़ी तादाद में बनाए जाते थे। भित्ति चित्रकला के माध्यम से चित्रकारों ने रामायण और महाभारत काल के समय की घटनाओं तथा सुर-असुर संग्राम को हवेलियों में बड़ी खूबसूरती से उकेरा था। पुराने मंदिरों और गुरुद्वारों में भी भित्ति चित्र बनाए गए है। रखरखाव न होने से हवेलियां खंडहर बन गई है और उनमें बने अधिकांश भित्ति चित्र भी मिट गए हैं। इन भित्ति चित्रों और प्राचीन हवेलियों को बचाने के लिए केंद्र और राज्य सरकार का पुरातत्व विभाग और कला के संरक्षण के नाम पर दुकानदारी करने वाली गैर सरकारी संस्थाएं कभी आगे नहीं आईं। कनखल में पटियाला हाउस, कलसिया हाउस और मंगलावांदी की हवेलियां खंडहर बन चुकी हैं। इनमें बने अधिकांश भित्ति चित्र मिट गए हैं। पंचायती नया उदासीन अखाड़ा में बने विशाल द्वार में बने भित्ति चित्रों को मिटाकर उनकी जगह कोटा के पत्थरों को लगा दिया गया है। वहीं देहरादून में गुरुराम राय के दरबार की दीवारों तथा गर्भ-गृह, कनखल में भारामल की हवेली के दरवाजे, लढ़ौरा राजघराने के कनखल राजघाट स्थित राधाकृष्ण मन्दिर, सतीघाट स्थित गुरुअमर दास गुरुद्वारा, दरभंगा नरेश राजा कामेश्वर सिंह के महल दरभंगा हाउस के काली और शिव मंदिर तथा पंचायती निर्मल अखाड़ा, श्री पंचायती उदासीन बड़ा अखाड़ा समेत कुछ अन्य स्थानों में ही भित्ति चित्र कला थोड़ी बहुत बची है। इस कला को संरक्षित करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार की तरफ से कोई पहल नहीं हुई है।

1986 में जब जाने-माने चित्रकार डॉ प्रमोद कुमार जोशी ने भित्ति चित्रों पर शोध कार्य किया था। तब कनखल की विभिन्न इमारतों भित्ति चित्रों की तादाद दो हजार के आस पास थी। यह अब घटकर दो-ढाई सौ ही रह गई है।19 वीं शताब्दी के आखिर तथा 20 वीं शताब्दी के शुरू में अपनी हरिद्वार यात्रा के दौरान चित्रकारों ने तीर्थ पुरोहितों की बहियों में अपनी कला के चिह्न छोड़े। भित्ति चित्रों के कलाकारों के लिए यह कला ही उनके जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी थीं। इन्होंने बहियों में अपने परिचय के साथ काली कलम से चित्र भी उकेरे। कनखल क्षेत्र में प्राप्त भित्ति चित्रों में कुछ स्थानों पर राजस्थानी शैली का भी प्रभाव देखा जाता है। खासतौर से राधा कृष्ण मंदिर राजघाट में चित्रित चित्र जयपुर व अलवर शैली के हैं। राम मुसव्वर, जानकी दास के साथी कलाकार थे। इन कलाकारों ने इंदौर, जयपुर व पुष्कर क्षेत्र में भी भित्ति चित्रण कार्य किया। कनखल क्षेत्र की भित्ति चित्रण परंपरा के अध्ययन से ज्ञात होता है कि भित्ति चित्रों के चित्रण में कुछ स्थानों में लोक तत्व भी शामिल हैं। इसमें स्थानीय लोक परंपरा का प्रभाव है।  डॉक्टर जोशी के शोध के मुताबिक भित्ति चित्र बनाने के लिए कलाकार गोंद में हिरोंजी, पीली मिट्टी, सिंगरफ, फूलों और नील को मिलाकर महीनों तक खरल में घोटकर रंग बनाते थे। यह रंग इतने पक्के होते हैं कि आज 200साल बाद भी ये रंग फीके नहीं पड़े हैं। कनखल निवासी डॉ जोशी ने कनखल हरिद्वार और उत्तराखंड के भित्ति चित्रों पर गहरा अध्ययन किया है। डॉ जोशी पहले और अकेले ऐसे चित्रकार है जिन्होंने कनखल क्षेत्र में भित्ति चित्रों पर शोध कार्य किया है। उन्हें 1987 में मेरठ विश्वविद्यालय से कनखल क्षेत्र में प्राप्त भित्ति चित्र विषय पर पीएचडी की उपाधि दी गई।
कहां, किसने बनवाए भित्ति चित्र

लंढ़ौरा :1810 में लंढ़ौरा रियासत की रानी धर्म कौर ने दक्षेश्वर महादेव के मन्दिर का निर्माण करवाया था। जो समृद्ध चित्रकारी से सम्पन्न था।
सतीघाट : 1819 में सतीघाट स्थित पटियाला हाउस का निर्माण पटियाला के राजा कर्म सिंह महाराज ने करवाया था। पटियाला हाउस भित्ति चित्रों की दीवारों में उत्कृष्ट भित्ति चित्रकारी का एक अहम संग्रहालय सा बना हुआ था। अब इसकी दीवारों में बने भित्ति चित्र भी इतिहास बन चुके हैं।
कनखल : भित्ति चित्रण के कार्य से सम्पन्न हवेली मंगला बांदी की हवेली भी है जो महाराजा रणजीत सिंह की प्रमुख बांदी थी। मंगला बांदी हवेली का निर्माण मेरठ के इकड़ी गांव के खुशाल सिंह ने करवाया था। यह इमारत भित्ति चित्रों से पटी हुई थी। कनखल में ऊंचे-ऊंचे भवन, हवेलियां विभिन्न अखाड़े और मठ मंदिर सेठ-साहूकारों, राजा-महाराजों द्वारा ही बनवाए गए थे। ये सभी इमारतें भित्ति चित्रकारी से समृद्ध रहीं।

-लाला भारामल के कई भवनों में भित्ति चित्रकारी बनी हुई थी। जिनका कुछ हिस्सा ही आज बचा है। लाला भारामल जलंधर के थे, जो नजीबाबाद के नबाब नजीबुद्दौला रोहेला के खजांची थे। लाला भारामल की हवेलियां सन 19 वीं सदी के शुरू में निर्मित हुई थी।
-भित्ति चित्रण परंपरा का अंतिम चित्रण कार्य उदासीन पंचायती बड़ा अखाड़ा राजघाट, कनखल तथा रामलीला चौक कनखल के समीप किरपी देवी के मकान मेंं हुआ था। भित्ति चित्रों को दीवारों पर उकेरने का काम ज्वालापुर के मुसव्वर अब्दुल हमीद शाह किया था। शाह सिद्धहस्त चित्रकार थे। तब कनखल की भित्ति चित्रण परंपरा अपने अंतिम दौर में थी।
-भवनों पर अंकित भित्ति चित्रों में कुछ चित्र फिरंगी अफसरों के भी देखे जा सकते है। इन हवेलियों और मंदिरों में बने चित्रों में राम-रावण युद्ध, भगवान विष्णु और कृष्ण की लीलाओं और शिव पार्वती विवाह, रामदरबार, हनुमान लीला के प्रसंगों के अलावा राजा महाराजाओं की शाही सवारी, हाथी, शेर और गेंदे और गुड़हल के फूल भित्ति चित्रकला के माध्यम से बनाए गए हैं।

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