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मरीजों के बोझ के बीच अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है दून अस्पताल

। लंबे अरसे तक दून अस्पताल उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल, हिमाचल प्रदेश और पश्चिम उत्तरप्रदेश के लोगों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं का एक अहम केंद्र बना रहा।
दून अस्पताल को दून मेडिकल कॉलेज बनाने से पहले राज्य सरकार को कम से कम 500 बिस्तरों वाला एक नया राजकीय अस्पताल अलग से बनाना चाहिए था।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में 84 साल पहले स्थापित दून अस्पताल अपने अस्तित्व को बचाने की आखिरी लड़ाई लड़ रहा है। लंबे अरसे तक दून अस्पताल उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल, हिमाचल प्रदेश और पश्चिम उत्तरप्रदेश के लोगों के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं का एक अहम केंद्र बना रहा। सवा साल पहले उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार ने दून अस्पताल को दून मेडिकल कॉलेज में तब्दील कर दिया, जबकि राज्य सरकार ने दून अस्पताल के विकल्प के रूप में कोई दूसरा राजकीय जिला अस्पताल नहीं खोला।  दून अस्पताल अब तक देहरादून का जिला राजकीय अस्पताल था। फिलहाल दून मेडिकल कॉलेज में ही जिला राजकीय दून अस्पताल चल रहा है। इससे स्थानीय लोगों के साथ-साथ अस्पताल में तैनात चिकित्सकों को भी भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। ऊपर से राज्य सरकार ने पिछले दिनों दून अस्पताल के कई चिकित्सकों के तबादले पर्वतीय इलाकों में कर दिए हैं। उनकी जगह अभी तक नए चिकित्सक नहीं आ पाए हैं।

मेडिकल कॉलेज बनने से समस्या बढ़ी
दून अस्पताल को दून मेडिकल कॉलेज बनाने से पहले राज्य सरकार को कम से कम 500 बिस्तरों वाला एक नया राजकीय अस्पताल अलग से बनाना चाहिए था। परंतु राज्य सरकार ने बिना सोचे समझे दून अस्पताल को मेडिकल कॉलेज में बदल दिया। उत्तराखंड की पिछली हरीश रावत सरकार के जल्दबाजी में लिए गए इस फैसले के कारण देहरादून के लोगों को सस्ते में इलाज कराने के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है। देहरादून में ले-देकर सरकारी दून अस्पताल तथा उसकी एक शाखा के रूप में कोरोनेशन अस्पताल है। जिस अस्पताल को 2010 में तब की भाजपा सरकार ने निजी अस्पतालों को पीपी मोड में दे दिया है। इससे यहां भी इलाज महंगा हो गया है।

लाइलाज बीमारी
यहां वार्डों की स्थिति बहुत खराब है। चिकित्सकों की कमी के अलावा स्टाफ नर्सों, पेरामेडिकल स्टाफ, लैब, एमआरआई, डायलेसिस, एक्स-रे, ब्लड बैंक, आॅपरेशन थियेटर टैक्निशियनों और फिजियोथैरेपिस्ट की भारी कमी है। साथ ही न्यूरो सर्जरी, हार्ट सर्जरी, एन्ज्योग्राफी, लीवर, किडनी, कैंसर के इलाज की सुविधाएं नहीं है। दून अस्पताल के मेडिकल कॉलेज बनने के बाद यहां वार्डों में बिस्तरों की संख्या साढेÞ चार सौ से घटाकर तीन सौ कर दी गई है क्योंकि मेडिकल कॉलेज खोलने के लिए शुरुआत में कॉलेज में इंडियन मेडिकल कांउसिल के नियमानुसार तीन बिस्तरों का होना जरूरी है। इसीलिए साढेÞ चार सौ बिस्तरों के दून को तीन बिस्तर वाले अस्पताल में बदल दिया गया।

मरीजों की तादाद बढ़ी
केंद्र और राज्य सरकारों ने बीपीएल स्वास्थ्य योजनाओं के अलावा प्रधानमंत्री तथा मुख्यमंत्री स्वास्थ्य बीमा योजना शुरू की है। लिहाजा दून अस्पताल में मरीजों की तादाद पहले से कई गुना बढ़ी है। दून अस्पताल में रोजाना साढेÞ तीन हजार से लेकर साढेÞ चार हजार तक मरीज इलाज कराने के लिए आते हैं। हालत यह है कि यहां पर आपातकालीन चिकित्सा केंद्र में प्रभारी चिकित्सक का पद तक सृजित नहीं किया गया है। इससे इस आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं भगवान भरोसे चल रही है।

दून अस्पताल का इतिहास

दून अस्पताल की स्थापना 1933 में ब्रिटिश सरकार ने की थी। तब अंग्रेजों ने अपने और वीवीआइपी इलाज के लिए कोरोनेशन अस्पताल भी खोला था। दून अस्पताल में आम आदमी का इलाज होता था। उसी तरह टीबी के मरीजों के लिए दून अस्पताल के साथ-साथ रैफल सेनिटोरियम की स्थापना की गई थी। परंतु दून अस्पताल सरकारी उपेक्षा के कारण खुद ही बीमार पड़ गया।

01. देहरादून में स्थित दून अस्पताल।
02. देहरादून में स्थित दून अस्पताल।
03. देहरादून के दून अस्पताल इलाज कराते मरीज।
04. डाक्टर प्रदीप भारती गुप्ता, प्रिंसीपल और डीन, दून मेडिकल कॉलेज।

 

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