December 04, 2016

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नोएडा: प्राधिकरण की कमाऊ योजनाओं पर ग्रहण!

चुनावों को ध्यान में रखकर निकाली गर्इं ‘कैश रिच’ योजनाओं पर पड़ सकता है नोटबंदी का असर ।

Author November 21, 2016 04:37 am
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

500 और 1 हजार रुपए के नोट बंद होने के फरमान से नोएडा प्राधिकरण की कई कमाऊ (कैश रिच) योजनाओं पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। नोएडा- ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेस वे पर 2100 वर्गमीटर से बड़े औद्योगिक भूखंडों का साक्षात्कार के जरिए और ग्रुप हाउसिंग के बड़े भूखंडों को बिल्डरों को आबंटित किए जाने वाले मलाईदार काम शामिल हैं। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी के नोटबंदी के एलान होने से पहले ही प्राधिकरण ने दोनों योजनाओं पर काम कर लिया था। सूत्रों के मुताबिक, भूखंड लेने के इच्छुक भी इसके लिए तैयार थे लेकिन एकाएक 500 व 1 हजार रुपए के नोटबंदी के फैसले ने पूरा पासा पलट दिया है।

औद्योगिक या बिल्डर भूखंड ही नहीं बल्कि किसानों के भूखंडों पर भी मोदी के फैसले का बड़ा असर पड़ा है। सालों से कोटे के 5 फीसद भूखंडों का इतंजार कर रहे किसानों के भूखंडों के भाव भी बड़े नोटबंदी के फैसले से औंधे मुंह गिरने के आसार बन गए हैं। प्रॉपर्टी जानकारों के मुताबिक, बड़ी संख्या में किसानों ने नक्शा 11 (अर्जित जमीन के सापेक्ष मिलने वाले भूखंड का पत्र) के आधार पर कई सालों पहले ही निवेशकों के साथ सौदा कर लिया था। पहले से मंदी की मार झेल रहा प्रॉपर्टी कारोबार बड़े नोटबंदी के फैसले से और ज्यादा नीचे आ गया है। खरीदार पूरी तरह से गायब हो जाने से किसान और निवेशक दोनों फंस गए हैं। काफी मामलों में तो कई साल पहले नक्शा 11 पर किसान को रकम देकर भूखंड लेने वाले निवेशक की रकम तक पूरी होने की कम ही उम्मीद है।

उल्लेखनीय है कि उप्र की सत्ताधारी सपा सरकार ने भले ही पिछले साढ़े चार साल के दौरान नोएडा में छोटे रिहायशी या औद्योगिक भूखंडों की योजना नहीं निकाली। वहीं चुनाव से कुछ समय पहले ऐसी योजनाएं निकाले जाने को लेकर राजनीतिक स्तर पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने का दौर शुरू हो गया था। आरोप-प्रत्यारोपों का यह दौर 8 नवंबर को मोदी के बड़े नोटबंदी के एलान के बाद बंद हो चुका है। उप्र में 2017 में चुनाव प्रस्तावित हैं। इसे लेकर दिसंबर 2016 या जनवरी 2017 तक चुनाव आचार संहिता लगने की उम्मीद है। सूत्रों के मुताबिक, चुनाव आचार संहिता लागू होने से कुछ समय पहले एकाएक प्राधिकरण ने साक्षात्कार के जरिए छोटे औद्योगिक व रियल एस्टेट सेक्टर में बहुत बड़े ग्रुप हाउसिंग भूखंड बिल्डरों को आबंटित करने की योजना एक खास मकदस के तहत निकाली थी। प्राधिकरण की इन योजनाओं को चंद दिनों के भीतर अमलीजामा पहनाने के लिए ही 4 एसीईओ स्तर के अधिकारी पिछले दिनों ही तैनात किए गए हैं। जबकि डेढ़ महीने पहले तक केवल एक एसीईओ अधिकारी ही यहां मौजूद थे। जानकारों के मुताबिक, किसान कैटिगरी के भूखंड और 5 फीसद भूखंडों के लिए कई सालों से संघर्ष समितियों के जरिए आंदोलन चलाया जा रहा था। चुनावी मुहाने तक पहुंचने पर एकाएक किसान भूखंड आबंटित करने की भी दो वजहें हैं। पहली यह कि चुनावों से पहले किसानों के बीच यह संदेश पहुंचाया जा सके कि सरकार किसान हितैषी है। दूसरा यह कि औद्योगिक या बिल्डर भूखंड आबंटित करने की योजना का किसान विरोध ना करें।

उद्यमियों की संस्था नोएडा एंटरप्रिन्योर्स असोसिएशन (एनईए) के अध्यक्ष विपिन मल्हन ने बताया कि छोटे औद्योगिक भूखंड आबंटित करने की उद्यमी कई सालों से मांग कर रहे थे। सरकार ने चुनाव से कुछ दिनों पहले यह योजना निकाली है। बड़े नोटबंद होने के असर के अलावा चुनाव से पहले आनन-फानन में योजना में भूखंड पाने वाले उद्यमी अगली सरकार के स्तर से जांच की संभावना को लेकर डरे हुए हैं। इसे लेकर उद्यमियों में उत्साह नहीं है। दूसरी तरफ सूत्रों के मुताबिक, भूखंड लेने के इच्छुक लोग पहले से तैयार थे, मामला तो बड़े नोट बंद होने के फैसले से पलटा है। आबंटन कीमत पर तो अभी भी उद्यमी या उद्योग लगाने वाले भूखंड लेने को तैयार हैं। असल मामला उसके अलावा की रकम का है, जहां पेच फंसा हुआ है। बिल्डर भूखंडों पर इसी को लेकर गतिरोध बना हुआ है। सेक्टर-40 में प्रॉपर्टी जानकार कुलदीप पांडे के मुताबिक, स्टांप शुल्क (सर्कल रेट) को तुरंत कम कर बाजार भाव के समानांतर करने की जरूरत है। ऐसा नहीं होने पर रकम फंसाए निवेशकों के अलावा किसानों के सामने भी बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। महंगे सर्कल रेट की वजह से खरीदारी ठप पड़ जाएगी।

 

 

 

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First Published on November 21, 2016 4:37 am

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