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नोटबंदी से न बढ़ा राजस्व न मिली राहत, सरकारी परियोजना से टूट रहा है लोगों का भरोसा

भूखंड रद्द होने के बाद वहां पर बुकिंग कराने वालों की रकम से प्राधिकरण अपना कोई सरोकार नहीं मानता है, जबकि 8-10 साल पहले तक नोएडा, ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के इलाकों में भूखंड आबंटित कराने वालों पर लोगों का सरकारी परियोजनाओं जैसा भरोसा था, जो अब पूरी तरह से टूट चुका है।
Author नोएडा | March 8, 2017 04:43 am
नया रियल एस्‍टेट बिल एक साथ पूरा लागू नहीं किया जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि पूरे कानून को एक साथ लागू करने से कई तकनीकी दिक्कतें होंगी।

नोटबंदी के वास्तविक असर को सरकारी राजस्व बढ़ाने या आम आदमी को राहत देने वाला बनाने के लिए सर्कल दर 30 फीसद कम करने को जरूरी बताया गया है। ऐसा होने पर बाजार भाव और सर्कल दर अंतर खत्म होगा। ऐसा न केवल प्रॉपर्टी या रियल एस्टेट कारोबारियों का मानना है, बल्कि नोएडा और ग्रेटर नोएडा के सब रजिस्ट्रार कार्यालयों में रजिस्ट्री कराने वाले भी एक स्वर में कालेधन पर अंकुश लगाने के लिए सर्कल दर में कमी को जरूरी बता रहे हैं।
दूसरी तरफ, स्टांप विभाग के सरकारी अफसरों ने सर्कल दर में कमी करने से पूरी तरह से इनकार किया है। उनका तर्क है कि जिन इलाकों के भूखंडों को दशकों पहले आबंटित किया जा चुका है, वहां भी हर साल प्राधिकरण आबंटन कीमत बढ़ा रहा है। आबंटन भाव बढ़ने की वजह से स्टांप विभाग को उसी के सापेक्ष स्टांप ड्यूटी बढ़ानी पड़ती है। उल्लेखनीय है कि हरियाणा में पिछले साल सर्कल दर में कमी भी हुई थी। सेक्टर-33 स्थित एडवोकेट्स एंड डीड राइटर्स एसोसिएशन के महासचिव एलसी शर्मा के मुताबिक, संपत्ति बाजार पर नोटबंदी का असर केवल यह हुआ है कि बिक्री पूरी तरह से थम गई है। 50 दिनों की नोटबंदी के दौरान लोगों के पास 20 हजार रुपए की पंजीकरण राशि तक नहीं थी, जिसके कारण खरीद-फरोख्त पूरी तरह से ठप रही।

नोटबंदी के बाद सर्कल दर तो उतनी ही रही है, जबकि वास्तविक बाजार भाव में कुछ कमी जरूर आई है। खासतौर पर वाणिज्यिक संपत्ति का आबंटन और सर्कल दर पहले से ही बाजार भाव से इतनी ज्यादा है कि वहां पर नोटबंदी से पहले भी बिक्री थमी हुई थी। प्राधिकरण की कई वाणिज्यिक योजनाएं भी इसी वजह से पूरी तरह से फेल साबित हुई हैं। वास्तविकता को नजरअंदाज कर सरकारी अफसरों ने अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए स्थानांतरण शुल्क (ट्रांसफर चार्ज) में तब्दीली कर दी है। भूखंडों की बिक्री कम होने से स्थानांतरण शुल्क कम कर दिया गया है, जबकि फ्लैटों की बिक्री को ध्यान में रखते हुए उनका स्थानांतरण शुल्क बढ़ा दिया गया है। आम लोगों को ठगने में सरकारी मशीनरी ने बिल्डर कंपनियों का पूरा साथ दिया है। जहां किसानों को 5 फीसद भूखंड आबंटित करने से पहले पूर्ण भुगतान के अलावा विकास शुल्क भी जमा कराने का नियम है, वहीं बिल्डरों को महज 5-10 फीसद लेकर भूखंड आबंटित कर लोगों को ठगने की पूरी छूट दी जा रही है। कितनी जमीन आबंटित हुई और वहां कितने फ्लैट बनने हैं? इन दोनों ही सवालों को बिल्डर अपने हिसाब से बदल लेते हैं। कई सालों तक आंख मूंदकर बैठने के बाद जब बिल्डर काफी लोगों की बुकिंग कर चुका होता है, तब प्राधिकरण भुगतान नहीं करने की बात कहकर भूखंड रद्द करने का तुगलकी फरमान जारी कर देता है।

 

 

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