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वरुण के भाषणों में केंद्र सरकार की उपलब्धियों का कोई जिक्र नहीं, खुद की तलाश रहे हैं राजनीतिक जमीन

अमित शाह ने वरुण की पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री पद और कायर्कारिणी से छुट्टी की थी। नरेंद्र मोदी के उभार के साथ ही वरुण की मुश्किलें शुरू हो गईं ।
Author सुल्तानपुर | October 19, 2016 20:02 pm
भाजपा सांसद वरुण गांधी।

राज खन्ना

पार्टी द्वारा हाशिये पर डाले गए सुल्तानपुर के सांसद वरुण गांधी अपनी पार्टी और सरकार की ओर से बेपरवाह है। उनके भाषणों में केंद्र सरकार की उपलब्धियों का कोई जिक्र नहीं है। कार्यक्रमों में प्रधानमन्त्री मोदी के नाम, तस्वीरोंऔर नारों के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। वरुण अपनी अलग राजनीतिक जमीन बनाने में जुटे हुए हैं। साल भर के भीतर उ.प्र.के विभिन्न जिलों में पांच हजार बेघर गरीबों को पक्के मकान मुहैय्या करने का उन्होंने वादा किया है। इस कड़ी में मंगलवार को उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र के बेलमोहन, सैतापुर सराय, मल्हीपुर,खरगूपुर पदारथपुर और मठिया बहादुर पुर गाँवो के 28 गरीबों को अपने वेतन से निर्मित पक्के मकानों की चाभियां सौंपी। इन मकानों के साथ शौचालय भी बनाये गए हैं। उन्नीस सड़कों का भी उन्होंने लोकार्पण किया। वरुण ने यह भी जानकारी दी कि मई 2015 से किसानो को कर्जा मुक्त करने के अभियान में अब तक 3360 किसानो के बकाये की लगभग 18 करोड़ की धनराशि जमा कराई जा चुकी है। यह काम आगे भी जारी रहेगा।

2009 में वरुण गांधी ने पीलीभीत से अपनी संसदीय पारी प्रारम्भ की थी। गोमती नदी वहां से शुरू होती है और लंबा रास्ता पार करसुलतानपुर से आगे बढ़ती है। वरुण ने वहां का सांसद रहते ही 2010 में ही अगले चुनाव के लिए सुल्तानपुर को चुन लिया था। इस बीच गोमती न जाने कितना पानी बहा ले गई और इसी के साथ उग्र दिखने वाले वरुण भी सुल्तानपुर पहुँचते तक बदले बदले थे। पीलीभीत चुनाव में वे अपनी पारिवारिक विरासत से उलट उग्र हिंदुत्व के पैरोकार के रूप में उभरे थे। अपने भड़काऊ भाषणों के लिए उन्हें तब जेल भी जाना पड़ा था। 2010 की सुल्तानपुर की पहली सभा में दमकल की गाड़ियां देख उन्होंने कहा था कि इनकी क्या जरूरत है?”मैं आग लगाने नहीं बुझाने आया हूँ।” मंगलवार को अपने निर्वाचन क्षेत्र के कार्यक्रमों में वरुण अपनी उसी सोच को आगे बढ़ाते दिखे। उ.प्र. विधानसभा चुनाव की तेज होती दस्तक के बीच एक बार फिर राम मंदिर की गूँज सुनाई पड़नी शुरू हुई है। केंद्र और प्रान्त की सरकारें अपने अंदाज में राम का नाम याद दिला रही हैं। पर वरुण ने राम मन्दिर के सवाल पर कुछ बोलने से इंकार कर दिया।अपने भाषणों में उन्होंने कहा कि सत्तर फीसदी युवा जाति-धर्म की राजनीति से ऊबा हुआ है। आज की राजनीति सिर्फ सत्ता परिवर्तन के इर्द गिर्द घूमती है, जबकि उनका मकसद व्यवस्था परिवर्तन है।

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वरुण को उनके समर्थक अर्से से उ.प्र. के भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश करते रहे हैं। इलाहाबाद में पार्टी की राष्ट्रीय कायर्कारिणी की बैठक के मौके पर उत्साही समथर्कों ने शहर को उनकी होर्डिंग्स से पाट दिया था। वरुण को इसके लिए पार्टी नेतृत्व की नाराजगी का भी सामना करना पड़ा था ।मंगलवार को अमहट हवाई पट्टी ने एक बार फिर हमारा सी एम् कैसा हो, वरुण जैसा हो,के नारे लगे। पर इस नारे से वरुण खुश की जगह नाराज हुए। उन्होंने नारे बन्द करने को कहा। अगस्त 2014 में अमित शाह ने वरुण की पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री पद और कायर्कारिणी से छुट्टी की थी। सच तो यह है कि नरेंद्र मोदी के उभार के साथ ही वरुण की मुश्किलें शुरू हो गईं ।

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा मोदी लहर पर भले सवार थी लेकिन वरुण ने अपने सुल्तानपुर के चुनाव प्रचार में उनके नाम से परहेज ही रखा।वरुण ने सुल्तानपुर को अपने पिता की कमर्भूमि बताते हुए उससे अपने को जोड़ा था। बेशक स्व. संजय गांधी सुल्तानपुर में सक्रिय रहे लेकिन अपने दोनों 1977 और 1980 के चुनाव अमेठी से लड़े थे। 1984 में मेनका गान्धी ने अमेठी की पति की विरासत को हासिल करने के लिए स्व.राजीव गांधी से असफल लड़ाई लड़ी थी।वरुण के सुल्तानपुर से जुड़ने को एक पड़ाव के रूप में देखा गया था।माना गया था कि निशाने पर अमेठी है।लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।चुनाव में और उसके बाद भी भी वरुण ने अमेठी की ओर कभी भी रुख नहीं किया।वरुण बाकी उ.प्र. में अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए घूमते रहे हैं।उनके परिवार की समझी जाने वाली अमेठी को जीतने की नाकाम कोशिश स्मृति ईरानी ने 2014 में की थी।हार के बाद भी स्मृति अमेठी में डटी हैं और वहां से गांधी परिवार को बेदखल करने के हौसले पर कायम हैं।वरुण जीत कर भी हाशिये पर हैं।इसका उनके क्षेत्र के लोगों को अहसास है। पार्टी के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता भी इस हकीकत से वाकिफ हैं। इसलिए टिकट के दावेदार खास तौर पर चौकन्ने हैं। शायद इसीलिए वे उनके बहुत नजदीक आते नहीं नजर आना चाहते।

 

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