December 11, 2016

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नोट पाबंदी के चलते चुनाव की तैयारी में लगी पार्टियों के लिए मुश्किल

राजनीतिक दलों ने पिछले तीन लोकसभा चुनाव के दौरान कुल 2,356 करोड़ रुपए बतौर चंदा एकत्र करने की घोषणा की थी।

Author लखनऊ | November 10, 2016 02:20 am
मुलायम सिंह यादव और मायावती ।

केंद्र सरकार द्वारा 500 और 1000 रुपए के नोटों का चलन बंद किए जाने का असर उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही राजनीतिक पार्टियों की तैयारियों पर भी पड़ सकता है। हालांकि सभी पार्टियां केंद्र सरकार के इस कदम से खुद पर पड़ने वाले असर के मुद्दे पर खामोश हैं, लेकिन चुनावों के लिए पार्टियों द्वारा चंदा एकत्र किए जाने के अब तक के तौर-तरीकों से यह सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि बड़े नोटों का चलन बंद किए जाने से उन पर क्या असर पड़ेगा। चुनाव में नकदी के चलन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले तीन लोकसभा चुनावों के दौरान पार्टियों ने जहां 1299.53 करोड़ रुपए चेक इत्यादि के जरिए एकत्र किया, वहीं 1,039 करोड़ नकदी के रूप में इकट्ठा किए।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफार्म्स (एडीआर) ने राजनीतिक दलों के आयकर रिटर्न के विश्लेषण में पाया कि राजनीतिक दलों ने पिछले तीन लोकसभा चुनाव के दौरान कुल 2,356 करोड़ रुपए बतौर चंदा एकत्र करने की घोषणा की थी। इसमें से 44 फीसद रकम नकदी के रूप में इकट्ठा की गई थी। हालांकि राजनीतिक दलों ने चुनाव आयोग के दिशानिर्देशों के मुताबिक नकदी के रूप में जमा चंदे की रकम घोषित की लेकिन चुनाव के दौरान पुलिस द्वारा भारी मात्रा में नकदी पकड़ी जाने से यह संकेत मिलते हैं कि प्रचार अभियान के दौरान काले धन का भी इस्तेमाल किया गया। 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान आयोग ने 330 करोड़ रुपए की बेनामी नकदी पकड़ी थी।

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अर्थशास्त्री प्रोफेसर एसपी तिवारी ने बताया कि काले धन को सामने लाने की सरकार की मुहिम तब तक फलदायी नहीं होगी, जब तक राजनीतिक दलों को नकदी के तौर पर चंदा एकत्र करने की इजाजत मिलती रहेगी। राजनीतिक दल काले धन के लेन-देन के प्रमुख स्रोत हैं। आयकर रिटर्न्स के विश्लेषण से पता लगता है कि पिछले तीन लोकसभा चुनाव के दौरान चंदे के तौर पर जो भी नकदी एकत्र की गई, उनमें से 90 फीसद से ज्यादा हिस्से के दाताओं के नाम का खुलासा नहीं किया गया।

एक राजनेता ने कहा कि पांच सौ रुपए और एक हजार रुपए के नोटों का चलन एकाएक बंद किए जाने के बाद पैदा सूरते हाल से राजनीतिक दलों को काफी परेशानी होगी, लेकिन इससे सभी दलों के लिए समान मौके बनेंगे।

 

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First Published on November 10, 2016 2:20 am

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