December 09, 2016

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यहां से अब कहां जाएगी सपा, सत्ता के संघर्ष में पिस गई मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी

जो पिता और पुत्र के बीच की डोर को कड़ा कर रही है वह है बाहरियों का बढ़ता वर्चस्व।

(बाएं से दाएं) शिवपाल सिंह यादव, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव।

सियासत और संघर्ष एक दूसरे के पूरक हैं। बिना संघर्ष के सियासत नहीं हो सकती। लेकिन जब संघर्ष सियासी मुकाम हासिल करने के बाद रसूख के लिए हो तो उसका बड़ा खामियाजा उस राजनीतिक दल को भुगतना तय है जिसके नेताओं ने लंबे संघर्ष के बाद उसे उस मुकाम तक पहुंचाया, जहां सरकार बनती और चलती है। पांच साल तक बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सरकार के खिलाफ लगातार संघर्ष करने के बाद जिस समाजवादी पार्टी (सपा) ने पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ उत्तर प्रदेश में सरकार बनाई, आज विधायकों का वही बहुमत विभाजन के दरवाजे पर खड़ा है। इसके सूत्रधार भले ही अमर सिंह, प्रोफेसर राम गोपाल यादव, शिवपाल सिंह यादव हों या कोई और। लेकिन खमियाजा भुगतना पड़ रहा है उन मुलायम सिंह यादव को जिन्होंने पांच नवंबर 1991 को विरोधियों के लाख तानों के बावजूद उस दल का गठन किया जिसे आज समाजवादी पार्टी के नाम से पहचाना जाता है।

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यह वही सपा है जिसके नेता इस वक्त कुर्सी और रसूख के लिए आपस में जूझ रहे हैं। एक दूसरे को किसी भी स्तर पर जाकर लज्जित करने की हद तक। आपस में जूझते हुए इन नेताओं का कुनबा कब पार्टी के राष्टÑीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के दरवाजे तक पहुंचकर उन्हें और उनके परिवार को भी इस पूरे झगड़े में लपेट ले गया, पता ही नहीं चला। जिन मुलायम सिंह के प्रबल विरोधी भी उनके परिवार को लेकर कभी आरोप-प्रत्यारोप नहीं करते थे, राजनीति के निर्धारित नियमों का पूरा आदर किया जाता था, वो समाजवादी नेताओं के आपसी झगड़े में खंड-खंड बिखर गया। खुद को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का बेहद खास और करीबी बताने और जताने की ऐसी होड़ शुरू हुई जिसमें पिसा सिर्फ वह शख्स जिसे पूरी सपा नेताजी के नाम से पुकारती है।
सियासत की शतरंजी बिसात के चौंसठ खाने गिनने का सलीका और तहजीब बहुतों  को सिखा कर भारतीय राजनीति में स्थापित करने वाले मुलायम सिंह यादव अपने ही परिवार के झगड़े में बुरी तरह उलझ गए। उनकी इस उलझन का कारण बना वह एक फैसला जिसके लिए उस बाहरी को जिम्मेदार ठहराया गया जिसे अमर सिंह कहते हैं। अखिलेश को कहना पड़ा, मैं अब उन्हें अंकल नहीं कहूंगा, वे बाहरी हैं और रविवार को सपा के इसी नौजवान के मुंह से इस बाहरी के लिए नई शब्दावली निकली जिसे ‘दलाल’ कहा जाता है। उस अमर सिंह के लिए अखिलेश ने ऐसा शब्द बोला जिसके आने पर उनके आदर में सदैव वे खड़े हो जाते थे। सच सियासत में मुकाम हासिल करने के बाद का संघर्ष बेहद कष्टकर होता है। पीड़ा देता है।

सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और अपने पिता मुलायम सिंह यादव के लिए अखिलेश यादव का न ही आदर कम हुआ है और न ही सम्मान। पांच विक्रमादित्य मार्ग पर जहां पिता और पुत्र साथ रहते हैं, वहां मुलायम की मौजूदगी में शायद ही कभी हुआ हो कि अखिलेश बिना उनसे मिले घर के बाहर निकले हों। मुख्यमंत्री रहते हुए भी और जब वे राजनीति में नहीं थे उस वक्त भी। नेताजी की किसी बात को आज तक अखिलेश ने नहीं टाला। यह भी सर्वविदित है। लेकिन लौटकर फिर वही बात, सत्ता का संघर्ष बहुत निष्ठुर होता है। मुलायम सिंह यादव ने जिस तरह अखिलेश को अपनी राजनीति विरासत सौंपी, उससे उनकी मंशा साफ है। राजनीति में आने के पूर्व से लेकर मुख्यमंत्री बनने और साढ़े चार साल तक उत्तर प्रदेश की सरकार चलाने तक नेताजी की हर बात को आदेश मानकर बिना कुछ सोचे पूरा करने से अखिलेश के मन्तव्य भी स्पष्ट हैं कि उनके ह्रदय में आखिर कितने गहरे तक समाये हुए हैं उनके पिता। बस एक बात जो पिता और पुत्र के बीच की डोर को कड़ा कर रही है वह है बाहरियों का बढ़ता वर्चस्व। इन बाहरियों के चलते नेताजी और अखिलेश के बीच संवाद तो हुआ लेकिन उसमें पिता की सलाह से अधिक स्थान आदेशों ने ले ली।

फिलहाल सपा अपने गठन की 25वीं सालगिरह मनाने के पहले ही आपसी विवाद की गिरफ्त में आ चुकी है। इस विवाद के बाद भले ही कोई हल निकले लेकिन पिता और बेटे के रिश्ते को बांधने वाली डोर कमजोर जरूर पड़ी है। यही कमजोरी ऐन विधानसभा चुनाव के पहले उस समाजवादी पार्टी को भी बहुत गहरे तक कमजोर कर चुकी है जिसके साढ़े चार साल उन मुद्दों को लेकर गुजरे जिसे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव विकास कहते हैं। मुख्यमंत्री के विकास का एजंडा पारिवारिक विवाद की भेंट चढ़ चुका है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि अब ऐसे कौन से मुद्दे होंगे जिनसे नेताजी और अखिलेश सपा कार्यकर्ताओं को एक रहने का मंत्र दे पाएंगे।

 

 

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First Published on October 24, 2016 1:27 am

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