December 02, 2016

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सपा विवाद: लिहाज का परदा हटा और सरेआम हुए इल्जाम

भतीजे से भुनभुनाए शिवपाल सिंह यादव ने कसम खाकर अखिलेश पर आरोप लगा दिए कि वे दूसरी पार्टी बनाने की बात कर रहे थे।

समाजवादी पार्टी के भीतर वर्चस्‍व की लड़ाई छिड़ी नजर आती है।

सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने हमेशा राजनीति और निजी जीवन में शब्दों की मर्यादा और अभिव्यक्ति की परिधि का सम्मान किया,
लेकिन उन्हीं के सामने एक महीने में उनके गढ़े गए सारे सिद्धांत ताक पर रख दिए गए। उनके भाइयों में एक-दूसरे को भ्रष्ट ठहराने की होड़ शुरू हुई तो ‘बाहरी चाचा’ को उनके पुत्र ने दलाल तक ठहरा दिया।

भतीजे से भुनभुनाए शिवपाल सिंह यादव ने कसम खाकर अखिलेश पर आरोप लगा दिए कि वे दूसरी पार्टी बनाने की बात कर रहे थे। भाई ने भतीजे पर उस पिता के सामने आरोप लगाए जो हमेशा से इस बात की नजीर पेश करते रहे कि उनके परिवार में कभी कोई विवाद हुआ ही नहीं। लेकिन अजब शै है राजनीति। इसमें सब जायज है। भले ही आरोपों को बल देने के लिए शपथ का सहारा ही क्यों न लेना पड़े। इसके लिए भले ही परदेदारी को एक ही पल में त्याग देना हो, वह भी मंजूर है। समाजवादियों ने उत्तर प्रदेश में सत्ता की जंग में चाणक्य के राजनीतिक सिद्धांत नए सिरे से गढ़ डाले।
यह सब सरेआम हुआ नेताजी के सामने। वे चुपचाप देखते रहे। उन्होंने देखा कि किस तरह शिवपाल ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को उन्हीं के सामने झूठा ठहराया। वह भी उनसे माइक छीनकर। राजनीति में सब जायज है। कार्यकर्ताओं के सामने अपने मुख्यमंत्री पर झूठा होने का आरोप लगाना भी जायज है। राजनीति है, इसमें नेताजी के पारंपरिक मर्यादाओं के सिद्धांतों से समझौता भी करना पड़े तो कोई हर्ज नहीं। उनके सामने उनके सिद्धांतों का हरण भी चलता है।

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समाजवादी पार्टी के गठन के पच्चीस सालों में क्या-क्या हुआ? जो परदे में ढका-छिपा था, वह भी यादव परिवार के आपसी झगड़े में सार्वजनिक हो गया। वर्ष 2003 में मुलायम सिंह यादव को सरकार बनाने में किसने मदद की? इस पर से भी परदा उठा और आय से अधिक संपत्ति के मामले में जेल जाने से किसने बचाया, यह भी जनता जान गई। ऐन विधानसभा चुनाव के पहले यादव सिंह से समाजवादी पार्टी के किस नेता की सांठगांठ थी, इस पर से भी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल सिंह यादव ने परदा उठाया तो अक्षय ने यह भी आरोप मढ़ दिया शिवपाल पर कि वे अखिलेश के स्थान पर खुद मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। राजनीति है, इसलिए सब जायज है।

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव में जाने की तैयारी में जोर-शेर से जुटे अखिलेश अपने कार्यकाल में हुए विकास के एजंडे को जनता के बीच गिनाना चाहते थे। लेकिन वे ऐसा कर पाते, उसके पहले पार्टी के वरिष्ठ नेता एक दूसरे के न जाने कौन-कौन से कृत्य जनता के बीच गिना गए। आरोपों की लंबी फेहरिश्त देखते ही देखते तैयार हो गई। समाजवादी नेताओं के आरोपों की इस फेहरिश्त में विपक्षी दलों के ऐसे तमाम आरोप भी छिपे थे, जिनको आधार बनाकर वे आगामी विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को घेरने की तैयारी कर रहे थे। अब यादव परिवार के बीच छिड़े आपसी मान-मर्दन के युद्ध में विपक्ष के तमाम आरोप सार्वजनिक हो गए। ऐसे में समाजवादियों से अधिक चिंता की लकीरें विपक्षी दलों पर हैं। वे इस बात को लेकर चिंतित हैं कि आखिर अब किन मुद्दों पर वे अखिलेश सरकार को घेरें।

फिलहाल समाजवादी पार्टी के नेताओं के बीच छिड़ी आपसी जंग में पार्टी और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष ने सर्वाधिक खोया है। ढाई दशक की कड़ी मेहनत पर मुलायम ने अपनी आंखों के सामने पानी फिरते देखा है। ऐसे में देखने वाली बात यह होगी कि अब यादव परिवार अपने नेता के सम्मान में खामोश रहने का धैर्य कैसे बटोर पाता है? नेताजी और उनकी पार्टी का भविष्य अब उनके नेताओं के इस धैर्य पर ही बहुत हद तक आकर टिक गया है।

 

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First Published on October 25, 2016 2:18 am

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