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अपने गढ़ में अजित सिंह ने दिखाए तेवर

परोक्ष रूप से हर किसी ने सांप्रदायिक आधार पर कोई बंटवारा नहीं होने के लिए आगाह भी किया।
Author बड़ौत | October 5, 2016 03:44 am
अजीत सिंह और रालोद महासचिव जयंत चौधरी (दाएं)। (फाइल फोटो)

राष्ट्रीय लोक दल के अध्यक्ष अजित सिंह ने मंगलवार को अपने गढ़ में अपनी खोई ताकत को फिर जुटाने के संकेत दिए। किसान मजदूर स्वाभिमान रैली के बहाने एक तरफ उन्होंने खासी भीड़ जुटाई और जताया कि उनकी सियासी हैसियत चुकी नहीं है। दूसरी तरफ नीतीश कुमार, शरद यादव, केसी त्यागी और दलित नेता आरके चौधरी को अपनी रैली में शामिल कर संकेत दिया कि उनकी राष्ट्रीय राजनीति में प्रासंगिकता है। उनकी पार्टी ने इस रैली के जरिए अजित के बेटे जयंत चौधरी को सूबे के मुख्यमंत्री पद के दावेदार के तौर पर भी पेश कर दिया। जनता वैदिक कालेज के मैदान पर करीब 20 हजार समर्थकों का जुटना उतनी अहमियत नहीं रखता जितनी इस भीड़ में मुसलमानों की बड़ी तादाद में मौजूदगी। तीन साल पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हिंदू-मुसलमान दंगे हुए थे जिसका फायदा लोकसभा चुनाव में भाजपा को मिला था। अजित को इन दंगों से काफी नुकसान हुआ था। जाट – मुसलमान गठजोड़ बिखर गया था। नतीजतन 2009 में पांच लोकसभा सीट जीतने वाले अजित की पार्टी का 2014 में सूपड़ा साफ हो गया था। इतना ही नहीं अजित खुद बागपत के अपने गढ़ में भाजपा के सत्यपाल सिंह के मुकाबले तीसरे नंबर पर पहुंच गए थे।

दरअसल भाजपा, बसपा और सपा से अगले विधान सभा चुनाव के संदर्भ में तालमेल की कोई संभावना न देख अजित ने अब नीतीश कुमार बाकी पेज 8 पर उङ्मल्ल३्र४ी ३ङ्म स्रँी 8
से हाथ मिलाया है। यों जद (एकी) का यूपी में खास असर नहीं है, पर नीतीश की कुर्मी बिरादरी के मतदाता खूब हैं जो अभी सपा, बसपा और भाजपा में बंटे हैं। नीतीश ने भी खुद को चौधरी चरण सिंह का अनुयायी बताकर लोगों से अजित के हाथ मजबूत करने का आग्रह किया। ऐसी ही अपील शरद यादव और केसी त्यागी ने भी की। सबने लोगों से कहा कि अजित को हराने की भूल वे आइंंदा कतई न करें। साथ ही किसान जातियों की एकता बनाए रखें। परोक्ष रूप से हर किसी ने सांप्रदायिक आधार पर कोई बंटवारा नहीं होने के लिए आगाह भी किया।

2012 के विधानसभा चुनाव में भी अजित को बसपा के कारण घाटा हुआ था। फिर भी वे नौ सीटें पा गए थे। 2014 से पहले भी अजित को 1998 में बागपत में भाजपा के सोमपाल ने हरा दिया था। लेकिन इस हार के बाद अगले चुनाव में 1999 में वे सहानुभूति वोट के कारण खासे अंतर से जीत गए थे। केंद्र में चार बार मंत्री रह चुके अजित ने मंगलवार को रैली के जरिए साबित किया कि इलाके के लोग उन्हें चाहते हैं। दरअसल इलाके में चौधरी चरण सिंह की धाक थी। अजित को उनका पुत्र होने का लाभ मिला। अब जयंत चौधरी अपने दादा की विरासत पर दावा जता रहे हैं।

अजित ने अब अपनी पार्टी में गैर जाट नेताओं को भी तवज्जो दी है। कांग्रेस के पुराने नेता पूर्व विधायक राजेंद्र शर्मा, सैनी बिरादरी के बड़े नेता तारा चंद शस्त्री , त्रिलोक त्यागी, मुकेश जैन और मसूद अहमद जैसे नेताओं के साथ आने से रालोद अब केवल जाटों की पार्टी नहीं है। रैली में आए कई बुजुर्गों और नौजवानों का कहना था कि वे अब अजित सिंह को कमजोर नहीं पड़ने देंगे। रैली में जयंत चौधरी ने किसानों की दुर्दश ा का जिक्र किया तो शरद यादव , नीतीश और अजित सभी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर झूठे वादे कर किसानों का बेवकूफ बनाने का आरोप लगाया। साथ ही उत्तर प्रदेश की सपा सरकार को गुंडों, बदमाशों और माफिया की पैरोकार बताया। गन्ना किसानों के हितों को चीनी मिल मालिकों के हाथों गिरवी रखने वाले अखिलेश यादव को चुनाव में सबक सिखाने की भी अपील की।

 

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